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उज़रा बट्ट, अभिनय और पृथ्वी थिएटर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान की मशहूर रंगकर्मी उज़रा बट्ट ने अपने रंगकर्म जीवन का अहम हिस्सा पृथ्वी थिएटर में ही गुज़ारा. पृथ्वीराज कपूर की शार्गिदगी में उन्होंने रंगमंच और अभिनय की बारीकियां सीखीं. 89 बरस की उज़रा बड़ी शिद्दत से पृथ्वीराज कपूर को याद करते हुए कहती हैं, "पृथ्वीराज साहब का संवाद अदायगी के तरीके पर ख़ासा ज़ोर रहता था और वो हर कलाकार से यह अपेक्षा रखते थे कि डायलॉग ऐसे बोलो कि वो ख़ुद-ब-ख़ुद रोल की शक्ल अख़्तियार कर ले." वो बताती हैं, "पृथ्वीराज कहते थे कि जब तुम्हें कोई रोल मिले तो उसे पहले चबाओ, चबाकर निगल जाओ और निगलकर भूल जाओ." उज़रा के मुताबिक पृथ्वीराज कपूर के कहने का मायने यह था कि आपके अवचेतन में जो रोल दर्ज हो जाता है वही आपको असल में एक बेहतर कलाकार बनाने में मदद करता है. पृथ्वी थिएटर में बिताए दिन, वो दौर और उस दौरान हासिल किए गए अनुभव को याद करती उज़रा काफी भावुक हो जाती हैं. वो कहती हैं, "पृथ्वी थिएटर की तालीम से ही मैं इस बात को समझ पायी कि लेखक तो लाइनें लिख देता है, अपनी समझ से एक रोल आपको देता है, आप उसे किस तरह जज़्ब कर रहे हैं, किस तरह उसे महसूस कर रहे हैं और किन भावों के साथ उसे ज़ाहिर करते हैं, इसी से बात बनती है." पृथ्वी की परख वर्ष 1917 में देहरादून में जन्मी उज़रा बट्ट ने 1930 के दशक में रंगमंच की दुनिया में क़दम रखा और आज भी सक्रिय हैं. शुरू में नृत्य गुरू उदयशंकर के सानिध्य में रहने के बाद वर्ष 1941 में वो पृथ्वीराज के संपर्क में आई और फिर क़रीब दो दशक तक पृथ्वी थिएटर से जुड़ी रहीं. उज़रा के पृथ्वीराज कपूर तक उनके पहुँचने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है. वो बताती हैं, "वर्ष 1943 में मुंबई में ख़्वाज़ा अहमद अब्बास ने अपने नाटक ज़ुबैदा में उन्हें मुख्य भूमिका करने को दिया. नाटक बहुत चला और सबकी ज़बान पर रहा. पृथ्वीराज कपूर भी यह नाटक देखने गए थे. ज़ुबैदा का किरदार तो उन्हें पसंद आया ही, उस किरदार को निभाने वाली उज़रा के अभिनय कौशल ने उन्हें काफ़ी प्रभावित किया. फिर क्या था पृथ्वीराज ने उज़रा को बुलावा भेजा और अपने नाटकों में काम करने की पेशकश कर दी. उज़रा बताती हैं कि उनके लिए यह पहली बड़ी छलांग थी. पृथ्वी थिएटर की यह मेहनतकश और गंभीर युवा अभिनेत्री देखते ही देखते सरहद की दीवारें मिटाती हुईं इतनी मशहूर हो चलीं कि वक्त के साथ उन्हें और उनकी रंगकर्मी बहन ज़ोहरा सैगल को दक्षिण एशिया की ग्रांड ओल्ड लेडीज़ कहकर पुकारा जाने लगा. उज़रा बताती हैं, "पुथ्वीराज साहब के साथ मैं काफी वक्त रही. उनके साथ 'आहुति', 'शकुंतला' और 'कलाकार' जैसे कई नाटक किए जो काफी पसंद किए गए. रंगमंच में कामयाब पारी के बाद उज़रा वर्ष 1958 में अपने पति हामिद बट्ट के साथ पाकिस्तान चली गईं और उन्होंने पाकिस्तान में रंगकर्म का नया रास्ता खोला. | इससे जुड़ी ख़बरें पृथ्वीराज, एक संवेदनशील और समाजसेवी व्यक्तित्व02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'पापाजी जैसा कोई दूसरा नहीं मिला'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका याद की रहगुज़र02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'भाग्यशाली हूँ कि कपूर ख़ानदान में पैदा हुआ'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'अभी बहुत कुछ जानना-बताना बाक़ी है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'आलमआरा' से 'ओंकारा' तक का सफ़र02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'इस ख़ून में ही कुछ ख़ास बात है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'यादें, जो कभी धुंधली नहीं पड़ सकतीं'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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