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'यादें, जो कभी धुंधली नहीं पड़ सकतीं' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पृथ्वी थिएटर्स का कोई भी नाटक जिसने देखा, उसकी स्मृति से पृथ्वीराज की वह मूर्ति कभी ओझल नहीं हो सकती, जब हर शो के बाद ज़रूरतमंदों की मदद के लिए दोनों बाहों के बीच झोली फैलाए पृथ्वीराज जी आँखें झुकाए खड़े रहते थे. तीनों बेटे शशि, शम्मी और राजकपूर उन्हें जिस अधिकार से पुकारते थे, हर कोई ‘पापाजी’ के इसी संबोधन से उन्हें जानता था. जिस समय देश आज़ाद हुआ, पापाजी भारतीय फ़िल्म जगत के और आधुनिक हिंदी रंगमंच के पितामह थे. मैं उन ख़ुशनसीबों में से हूँ जिन्हें पृथ्वीराज कपूर को पास से देखने का मौक़ा मिला. वर्ष 1940 में बनी फ़िल्म ‘सिकंदर’ से लेकर 1964 में प्रदर्शित ‘मुग़ले आज़म’ तक जिस फ़िल्म में भी पापाजी ने भूमिका की, उस पात्र को दर्शकों की आँखों के आगे सजीव कर दिया. पहली आवाज़ वाली फ़िल्म ‘आलमआरा’ के युग से ‘नानक नाम जहाज़ है’ तक पुरानी तमाम फ़िल्मों के नाम केवल पापाजी के अभिनय के लिए याद किए जाते रहेंगे. हाल में अंग्रेज़ी की अलेक्जेंडर देखकर पश्चिम के एक समीक्षक ने टाइम्स में लिखा था कि अभिनय सीखने के लिए हॉलीवुड के सितारों को हिंदी की ‘सिकंदर’ देखनी चाहिए थी. पापाजी का सम्मोहन
फ़िल्मों से भी अधिक जिस सम्मोहन का जादू देश पर दशकों छाया रहा, वे थे पापाजी के नाटक. वर्ष 1945 से 1960 के बीच पृथ्वी थिएटर्स ने केवल आठ नाटक खेले-शकुंतला, दीवार, पठान, ग़द्दार, आहुति, कलाकार, पैसा और किसान. पृथ्वी थिएटर्स के जो भी शो, जब जिस शहर में पहुँचे, उस शहर का सारा जीवन उतने दिन जैसे उस एक हस्ती के गिर्द घूमता रहा. दर्शकों से पात्रों के जीवंत साक्षात्कार का नशा अलग है. रंगमंच घाटे का सौदा था. पापाजी फ़िल्मों में काम करके थिएटर के कर्ज़े उतारते रहे. ईमानदारी ऐसी पक्की कि सलाहकारों के बार-बार ज़िद करने पर भी हिसाब की तारीख़ें आगे पीछे करने को कभी हाँ नहीं की. भीड़ में भी पापाजी को पहली झलक मिलते ही, जैसा सबके साथ होता था, मुझपर भी वही असर हुआ. मैं भी भक्तिभाव से उनका प्रशंसक बन बया. उनका परिचय पाने वाला हर कोई उनके व्यक्तित्व की चर्चा करते नहीं थकता था. उनको जानने वालों के, उनकी लानत सुनने वालों के बीच तरह-तरह से उनके गुणों की धूम थी पर मुझे जब पृथ्वी थिएटर्स में शामिल होकर उनको निकट से परखने का अवसर मिला तो बाहर वालों में उनकी जो ख्याति थी, मैंने उन्हें उससे कहीं ऊँचा, कहीं बड़ा पाया. थिएटर में रहकर मैंने अपनी आँखों से देखा कि उनके बारे में जितना कुछ सुना था पापाजी उससे कहीं अधिक महान थे. हर कसौटी पर सच्चे हर साँचे पर संचालक की तरह, निर्देशक की बागडोर थामे, साथी की हैसियत से, मित्र की भाँति, संबंधी के नाते, पिता या पति के रूप में कल्पना में जैसा कलाकार गढ़ा जा सकता है, हर कसौटी पर उनका चरित्र उससे भी सच्चा था.
आज के, दशकों से चले आते कितने सितारे, कितने निर्देशक, कितने निर्माता उनके ऋणी हैं. कला जगत उनके नाम से धनी हुआ. फ़िल्म जगत को आदर्शों के लक्ष्य बनाने की प्रेरणा उनसे मिली. एक और ख़ास बात. देश गाँधीजी के सिद्धांतों से भटक गया हो, पृथ्वीराज जीवन भर उन विश्वासों पर अटल रहे. ‘दीवार’ हो या ‘गद्दार’ उनके हर नाटक में देशभक्ति का स्वर था. उनके पात्रों में देश की आत्मा झलकती थी. देश के पहले राष्ट्रपति ने उन्हें दो बार राज्यसभा में मनोनीत किया. विदेशों में कला के पहले शिष्टमंडलों का नेतृत्व उन्हें सौंपा गया. साहित्याकारों से, दार्शनिकों से, संगीतकारों से उनका आतिथ्य भरा रहता था. उनकी बैठक में गीता-कुरान-बाइबिल-ग्रंथ साहब की शामें बैठती थीं. यश के घेराव में भी अपने साथ के मामूली से मामूली परिचित की भी उन्हें चिंता रहती थी. औरों से अगर कुछ छिपा रहता था तो दीन दुखियों के लिए उनकी दिली हमदर्दी. उन्होंने कलाकार का जीवन पाया था और ऐसा हृदय पाया था जो बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की दुआओं से, चेष्टाओं से लबालब था. (कैलाश बुधवार बीबीसी हिंदी सेवा के प्रमुख रह चुके हैं और एक जानेमाने प्रसारक और रंगकर्मी हैं) | इससे जुड़ी ख़बरें 'इस ख़ून में ही कुछ ख़ास बात है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'आलमआरा' से 'ओंकारा' तक का सफ़र02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'अभी बहुत कुछ जानना-बताना बाक़ी है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'भाग्यशाली हूँ कि कपूर ख़ानदान में पैदा हुआ'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका एक बहुत ही संवेदनशील इंसान 02 नवंबर, 2006 | पत्रिका उज़रा बट्ट, अभिनय और पृथ्वी थिएटर02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'पापाजी जैसा कोई दूसरा नहीं मिला'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका पृथ्वीराज, एक संवेदनशील और समाजसेवी व्यक्तित्व02 नवंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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