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'इस ख़ून में ही कुछ ख़ास बात है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पृथ्वीराज कपूर के ख़ानदान में आजकल जो सबसे ख़ास बात देखने को मिलती है वो यह है कि कपूर परिवार के पुरुष पीछे छूट गए हैं और महिलाएँ आगे आ गई हैं. वो ज़्यादा बेहतर काम कर रही हैं. चाहे पृथ्वी थिएटर की ज़िम्मेदारी संभाल रही शशि कपूर की बेटी संजना कपूर हों या फिर रणधीर कपूर की बेटियाँ करिश्मा और करीना. इन महिलाओं ने काफी काम किया है और उनकी इस काम के लिए प्रशंसा भी की जानी चाहिए. जब 'फ़िज़ा' की पटकथा करिश्मा को सुनाई गई तो उन्होंने पहली बात यही कही थी कि मेरे परदादा पृथ्वीराज कपूर अगर आज होते तो मुझे ऐसी फ़िल्म करते देखकर काफ़ी खुश होते. करीना ने भी केवल मनोरंजक और झटके-मटके वाली ही फ़िल्में नहीं कीं बल्कि काफ़ी बेहतरीन फ़िल्में भी की हैं. 'चमेली' और 'ओंकारा' इसका उदाहरण हैं. पृथ्वी थिएटर के रूप में पृथ्वीराज कपूर की जो तस्वीर आज भी हमारे बीच है उसका श्रेय संजना कपूर को जाता है. बाक़ी की लड़कियाँ ऐसा नहीं करती हैं. यह कपूर ख़ानदान की ख़ासियत है. यह उनके ख़ून में हैं. कपूर की पहचान यह कहना ग़लत न होगा की कपूर ख़ानदान बॉलीवुड का सबसे अच्छा ख़ानदान है. पृथ्वीराज कपूर ने समाज के यथार्थ को मंच पर उतारने का काम किया था. रंगमंच पर भी और फ़िल्मी पर्दे पर भी. उनके इसी काम को उनके बेटे राजकपूर ने आगे बढ़ाया. शशिकपूर कुछ पश्चिमी छवि वाले थे. उनका एक ख़ास अंदाज़ था. शम्मी कपूर को पूरी तरह से मनोरंजक के रूप में लोग देखते थे. इन तीनों बेटों में से पृथ्वीराज कपूर का सबसे ज़्यादा प्रभाव राज कपूर के काम में देखने को मिलता है. इस परिवार का सामाजिक विषयों से वास्ता हमेशा ही रहा है. ऋषि कपूर ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया था. उन्होंने 'दामिनी', 'प्रेमरोग' जैसी कुछ अच्छी फ़िल्में कीं. यही बात आज की पीढ़ी में भी देखने को मिलती है. दरअसल, 50 के दशक के बाद जिन लोगों का जन्म हुआ है उन्होंने पृथ्वीराज कपूर को फ़िल्मों में उम्रदराज़ लोगों की भूमिकाओं में ही देखा है. मिसाल के तौर पर 'मुगले आज़म' में दिलीप कुमार के साथ वो अकबर बनकर आए हैं. इस दौरान भी उन्होंने अलग-अलग तरह की भूमिकाएँ कीं. 'कल, आज और कल' में उन्होंने लोगों को हँसाने की कोशिश भी की. प्रासंगिकता
एक बहुत मुनाफ़ा कमाने वाले थिएटर की जगह कम मुनाफ़ा और उसमें थिएटर के सभी सदस्यों की लगभग एक जैसी हिस्सेदारी पृथ्वीराज कपूर के काम के तरीके की सबसे अहम ख़ासियतों में है. इस प्रथा को मुंबई के कई और समूहों ने अपनाया और यह कुछ जगहों पर आज भी क़ायम है. पृथ्वीराज कपूर के काम में सीखने के लिए काफ़ी कुछ है पर पृथ्वीराज कपूर का जादू 50 के दशक के बाद के लोगों ने नहीं देखा है और इसपर ठीक तरीके से काम होना चाहिए. देश की सरकार को चाहिए कि उनके नाम पर महोत्सव, समारोह जैसे आयोजन करे ताकि आज की पीढ़ियाँ उनके काम को जान सकें. लोकप्रिय मीडिया को भी इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. हालांकि ऐसा होता नहीं है क्योंकि केवल ग्लैमर परोसा जा रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें पृथ्वीराज, एक संवेदनशील और समाजसेवी व्यक्तित्व02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'पापाजी जैसा कोई दूसरा नहीं मिला'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका उज़रा बट्ट, अभिनय और पृथ्वी थिएटर02 नवंबर, 2006 | पत्रिका याद की रहगुज़र02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'भाग्यशाली हूँ कि कपूर ख़ानदान में पैदा हुआ'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'अभी बहुत कुछ जानना-बताना बाक़ी है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'आलमआरा' से 'ओंकारा' तक का सफ़र02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'यादें, जो कभी धुंधली नहीं पड़ सकतीं'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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