BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 01 नवंबर, 2006 को 17:12 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'भाग्यशाली हूँ कि कपूर ख़ानदान में पैदा हुआ'

शशिकपूर
मैं उस ऊपरवाले का शुक्रगुज़ार हूँ जो मेरा कपूर ख़ानदान में जन्म हुआ.

मेरा जन्म जब हुआ, तबतक मेरे पिताजी एक जाने-माने स्टार और कलाकार के तौर पर स्थापित हो चुके थे. चार-पाँच वर्ष की उम्र में ही जब मैंने होश संभाला तो पता चला कि मेरे पिताजी एक कलाकार हैं.

छह साल का ही था जब फ़िल्म सिकंदर में पिताजी के काम को देखा. उसी वर्ष मैंने पहला नाटक देखा-शाकुंतलम. तो इस तरह पिताजी के दोनों तरह के काम से मेरा परिचय हुआ.

पिताजी के फ़िल्मी सफ़र को देखता हूँ तो पता चलता है कि भूमिकाओं और काम की विविधता ऐसी है जो सभी के बस की बात नहीं. एक परिपक्व अभिनेता के रूप में उन्होंने कई अच्छी फ़िल्में कीं.

इससे भी ज़्यादा ख़ास है उनका थिएटर का काम. जिस दौर में उन्होंने थिएटर का काम शुरू किया, वो दौर बनावटी थिएटर का था.

उन्हें थिएटर में यह बनावटीपन कुछ कम पसंद था और इसलिए वो अपने थिएटर को यथार्थ के ज़्यादा क़रीब ले गए.

 मेरी फ़िल्म कंपनी 'फ़िल्मवालाज़' घाटे में गई और फिर बंद हो गई पर खुशी इस बात की है कि पृथ्वी थिएटर चल रहा है

दूसरी नई बात यह थी कि यह हिंदुस्तानी थिएटर में पृथ्वी थिएटर पहली व्यावसायिक कंपनी के रूप में स्थापित हुआ.

बड़ा ही अच्छा दौर था वह. 150 लोगों का एक समूह जिसमें परिवार जैसा माहौल था. वही नौकर खाए, वही मालिक खाए. इस तरह से मैं रंगमंच और पिताजी के काम से रूबरू हुआ था.

बंद हुआ पृथ्वी

पर 16 बरसों का सफ़र तय करके पृथ्वी थिएटर बंद हो गया.

इसकी कई वजहें थीं. एक तो यह कि पिताजी का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था. ख़ासतौर पर उनकी आवाज़ थकने लगी थी.

दिनभर के कामकाज के बाद शाम को थिएटर करने के समय तक उनकी आवाज़ में थकावट आ जाती थी.

दूसरी बात यह कि उनकी कई महिला कलाकार पृथ्वी छोड़कर चली गई थीं.

उज़रा पाकिस्तान चली गई थीं और ज़ोहरा जी भी व्यक्तिगत कारणों से लंदन चली गई थीं.

हम उनके काफ़िर बच्चे थे जो थिएटर छोड़कर फ़िल्मों मे चले गए थे. हालांकि मैंने फ़िल्मों में काम तब शुरू किया जब पृथ्वी बंद हो गया.

शशिकपूर और पृथ्वीराज कपूर
शशिकपूर अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के साथ शकुंतला नाटक में

इसके बाद मैंने कई फ़िल्मों में काम किया पर जो संतुष्टी चाहिए थी, वो नहीं मिल रही थी. लगा कि कुछ फिर से किया जाए जो अपनी तरह का हो.

फिर आया पृथ्वी

इसके बाद मैंने जेनिफ़र (पत्नी) से कहा कि मैं एक थिएटर शुरू करना चाहता हूँ और साथ ही एक फ़िल्म कंपनी भी.

पहले तो वो सहमत नहीं हुईं. अपनी बहन को पत्र में उन्होंने लिखा कि शशि पागल हो गया है जो दोनों चीज़ें एक साथ शुरू करना चाहता है. बाद में वो तैयार हो गईं.

तीन नवंबर, 1978 को पृथ्वी को फिर से शुरू करने की तैयारी हो गई. उस दिन इप्टा के साथियों को एक कार्यक्रम करना था पर किन्हीं कारणों से वो नहीं हो सका. फिर मैंने नसीर से कहा तो वो तैयार हो गए.

पाँच नवंबर को नसीरुद्दीन शाह और ओमपुरी की ओर से नाटक प्रस्तुत किए गए. तब से लेकर आज तक यह सिलसिला चल रहा है. पृथ्वी थिएटर में तब से लेकर अब तक रोज़ नाटक होते हैं.

मेरी फ़िल्म कंपनी 'फ़िल्मवालाज़' घाटे में गई और फिर बंद हो गई पर खुशी इस बात की है कि पृथ्वी थिएटर चल रहा है.

आशा है, पृथ्वी चलता रहेगा. मेरे बाद भी.

इससे जुड़ी ख़बरें
याद की रहगुज़र
02 नवंबर, 2006 | पत्रिका
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>