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एक बहुत ही संवेदनशील इंसान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पृथ्वीराज जी अपने आर्टिस्टों के साथ एक बाप या बड़े भाई का सा बर्ताव करते थे. बहुत ही हस्सास, ख़ुद्दार और मोहब्बत वाले इनसान थे. जब वह चार साल के थे तो उनकी वालिदा का इंतक़ाल हो गया था. उनके दादा ने उन्हें पाला था लेकिन वह माँ की मोहब्बत के लिए तरसते थे. कहते थे. "जब मैं छोटा सा था तो मेरी उम्र का एक लड़का जो मेरा दोस्त भी था, स्कूल छूटने के बाद बजाये घर आने के, उसके घर जाता था और दरवाज़े में खड़ा यह देखा करता था कि उसकी माँ किस तरह अपने बच्चे का स्वागत करती है, कैसे प्यार से उसका बस्ता लेती है, लिपटा कर प्यार करती है, खाने को देती है". मैं अब भी पृथ्वीराज जी की बातें सोचती हूँ तो मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं. शायद यही कमी थी जिसने उस बच्चे को इतना बड़ा आदमी बनाया, एक ऐसा हस्सास इनसान बनाया जिसके दिल में सारे हिंदुस्तान के लिए मोहब्बत थी. पृथ्वीराज जी की ख़्वाहिश थी की वह अपने ड्रामे हिंदुस्तान के छोटे से छोटे गाँव में जा कर दिखाएँ. रहमदिल इंसान वे बेइंतहाँ रहमदिल थे. एक मर्तबा कलकत्ते में एक वर्कर को, जिसका नाम ढ़ोंडू था, हैज़ा हो गया. पृथ्वीराज जी किसी मीटिंग में बाहर गए हुए थे.दिन के डेढ़ बजे थे. उसकी उलटियों और फ़ुज़ले से कमरा बेहद गंदा हो गया था. हम लड़कियाँ तो मारे डर के उसके कमरे के आसपास भी नहीं जा रहीं थीं. जब पृथ्वीराज जी बाहर से आए तो किसी ने कह दिया कि ढ़ोडू को कालरा हो गया है. बस पापा जी बग़ैर जूते उतारे उसके कमरे की तरफ़ भागे और जा कर उसे अपने सीने से लगा लिया. ढ़ोंडू का जिस्म ठंडा होता जा रहा था, मगर पापा जी उसे डाक्टर के आने तक इस तरह से लिपटाए रहे कि उसको उनके जिस्म की हरारत मिलती रहे. जब डाक्टर आया तो उसने कहा "पृथ्वीराज जी इस शख़्स की जान सिर्फ आपने अपने जिस्म की गर्मी देकर बचाई है, वर्ना यह बिल्कुल टंडा हो गया था". मैं कितने ही दिन हैरत और तअज्जुब से सोचती रही कि उन्होंने वहाँ की गंदगी का भी ख़्याल नहीं किया और न ही यह सोचा कि वह बीमारी उन्हें लग जाएगी. मेरे दिल में उनके लिए इज़्ज़त और बढ़ गई. पृथ्वीराज जी की इनसान दोस्ती और रहमदिली का एक और वाक़्या मुझे याद आता है. एकबार पूरा थियेटर तीन बसों में कश्मीर जा रहा था. पहाड़ों के पुरपेंच रास्ते थे. एक जगह बस रुक गई. पता चला कि जो मज़दूर रास्ता बनाने का काम कर रहे थे, उनमें से एक मज़दूर बैलेंस खो बैठा और चट्टानों पर गिरकर ज़ख़्मी हो गया है. पापा जी तड़प कर बस से उतरे. हम लड़कियों को आर्डर हुआ कि एक सीट फ़ौरन ख़ाली करो. देखा कि पृथ्वीराज जी उस ज़ख़्मी मज़दूर को, जिसके सिर से ख़ून बह रहा था, दो लड़कों की मदद से उठा कर ला रहे थे. उस मज़दूर को सीट पर लिटा दिया.
हमारे साथ एक होमियोपैथ डाक्टर भी रहता था. उसने फ़ौरन उस मज़दूर की मरहम पट्टी कर दी और कोई दवा उसके मुंह में डाली, फिर भी मज़दूर को होश नहीं आया. पापा जी ने आर्डर दिया कि बस को वापस ले चलो, जहाँ कोई हास्पिटल हो वहीं रोक देना. पृथ्वीराज जी उस मज़दूर को एक हास्पिटल में दाखिल करवा के और उसके एक साथी को उसके लिए कुछ पैसे देकर ही वापस लौटे. जब भी हम किसी शहर में जाते तो हमेशा हमारे मैनेजर ऐसी जगह ढूंढते जहाँ कम से कम सौ आदमी ठहर सकें क्योंकि हम सब आर्टिस्ट सौ से कुछ ज़्यदा ही होते थे. हमारे बिस्तर, जो हम साथ लेकर चलते थे, ज़मीन पर बिछाए जाते थे.पापा जी को एक कमरा मिलता जहां उनका बिस्तर ज़मीन पर ही लगाया जाता था. आर्गनाइज़र घबराए हुए आते और कहते "पापा जी आप ज़मीन पर! हुक्म कीजिए हम अभी आप के लिए तख़्त या पलंग का इंतज़ाम करते हैं". वे मुस्करा कर कहते "अगर आप 99 पलंग का इंतज़ाम कर सकते हैं तो सौवाँ पलंग मेर लिए ले आएँ". (शौकत कैफ़ी फ़िल्म और थिएटर जगत की जानीमानी अभिनेत्री हैं. उनका यह लेख उनकी किताब 'याद की रहगुज़र' का एक हिस्सा है. यह पुस्तक राजकमल प्रकाशन ने छापी है) | इससे जुड़ी ख़बरें जेल में कटे वो दिन01 सितंबर, 2006 | पत्रिका विश्वनाथन का उपन्यास दुकानों से हटा29 अप्रैल, 2006 | पत्रिका उपन्यास 'आकाश चम्पा' का अंश08 सितंबर, 2006 | पत्रिका एकदम इकहरी ज़िंदगी29 सितंबर, 2006 | पत्रिका ‘तनी हुई रस्सी’ का एक अंश12 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका पथर कटवा19 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका उपन्यास अंश--'वर्दीवाला संत'26 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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