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शुक्रवार, 01 सितंबर, 2006 को 09:26 GMT तक के समाचार
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जेल में कटे वो दिन
जेल में कटे वो दिन
भारत में गोपनीयता क़ानून 1923 में बना था और अंग्रेज़ी हुकूमत का यह क़ानून कभी सही तो कभी ग़लत इस्तेमाल के कारण चर्चा का विषय बनता रहा है.

भारत में पिछले कुछ वर्षों में जहाँ इस क़ानून के ख़िलाफ़ पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर देशव्यापी अभियान चले वहीं इस क़ानून के कुछ प्रयोग भी सामने आए जिन्हें लेकर लोकतांत्रिक अधिकारों और क़ानून की ओट में दमन के प्रयासों का कड़वा सच सामने आया.

ऐसा ही एक उदाहरण बने दिल्ली में 'कश्मीर टाइम्स' के ब्यूरो प्रमुख इफ़्तिख़ार गीलानी. गीलानी 'वॉयस ऑफ़ जर्मनी' के लिए भी काम करते हैं और पाकिस्तान के कुछ अख़बारों के दिल्ली संवाददाता भी है.

पिछले दिनों उन्हें इसी क़ानून के तहत रक्षा मामलों से संबंधित दस्तावेज रखने के ज़ुर्म में तिहाड़ जेल भेज दिया गया.

नौ जून, 2002 से 13 जनवरी, 2003 तक तिहाड़ में बीते दिनों और उससे पूर्व के कठोर अनुभवों को उन्होंने एक पुस्तक का रूप दिया है.

इस पुस्तक को पेंगुइन प्रकाशन ने अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू भाषाओं में प्रकाशित किया है. यह पहली किताब है जिसे पेंगुइन ने इन तीनों भाषाओं में एकसाथ प्रकाशित किया है.

पढ़िए, 'जेल में कटे वो दिन' के अंश-

(जेल में पहला दिन)

एक सहायक अधीक्षक किशन मेज़ के पीछे रखी कुर्सी पर बैठा था. कमरे में 10-11 लोग और थे. इनमें से कुछ जेल के मुलाज़िम लग रहे थे जबकि बाकी क़ैदी दिखते थे. सहायक अधीक्षक किशन ने मुझसे मेरा नाम पूछा. इससे पहले कि मैं अपना नाम बता पाता एक नेपाली मुलाज़िम में मुझे थप्पड़ मारा. यह खुल्लम-खुल्ला मारपीट का पहला नमूना था.

किसी ने पीछे से मुझे लात मारी, मेरी पीठ पर घूंसे बरसाए और किसी दूसरे ने मेरे बाल पकड़कर मेरा सिर मेज़ पर दे मारा. मेरे मुंह से ख़ून निकलने लगा. मेरी नाक और कान से भी ख़ून बह रहा था. लात-घूंसे मारते हुए मुझे भद्दी-भद्दी गालियां भी दी जा रही थीं.

"साला, गद्दार, पाकिस्तानी एजेंट," वे लोग चीख़-चीख़कर कह रहे थे. "तेरे जैसे लोगों को ज़िंदा नहीं रहना चाहिए. ग़द्दारों को तो सीधे फांसी पर लटका देना चाहिए."

लगभग आधे घंटे तक मैंने वतनपरस्ती का यह ख़ौफ़नाक नमूना झेला जबकि अधिकारी और क़ैदी दोनों एक-दूसरे को न्यौता दे रहे थे कि मुझे दिखाएं कि ग़द्दारी की सज़ा कैसी होती है. आख़िर में मैं बेहोश हो गया. जब मुझे होश आया तो मैंने ख़ुद को बाहर के गलियारे में पड़ा पाया. मेरे चेहरे पर ख़ून के ताज़ा धब्बों के निशान थे. मुझसे जाकर मुंह धोने के लिए कहा गया. गुसलख़ाने तक जाते-जाते गालियों की बौछार ने मेरा पीछा किया. अचानक किसी ने गरजकर कहा, ‘पाख़ाने की सफ़ाई कर.’

यह मुझे यातना देने वालों में से एक राजेश (बदला हुआ नाम) की आवाज़ थी जो अपना रौब झाड़ रहा था.

 इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता राजेश ने मुझे अपनी ख़ून से सनी क़मीज़ उतार कर उसी से शौचालय साफ़ करने का हुक्म सुनाया. मेरे पास उसका हुक्म मानने के अलावा कोई चारा नहीं था. शौचालय साफ़ करमें में मुझे करीब एक घंटा लगा.

शौचालय किसी बस अड्डे पर बने पब्लिक शौचालय की तरह गंदा था. इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता राजेश ने मुझे अपनी ख़ून से सनी क़मीज़ उतार कर उसी से शौचालय साफ़ करने का हुक्म सुनाया. मेरे पास उसका हुक्म मानने के अलावा कोई चारा नहीं था. शौचालय साफ़ करमें में मुझे करीब एक घंटा लगा.

मैंने यह काम अभी ख़त्म ही किया था कि एक दूसरा कैदी रामू (बदला हुआ नाम) किसी जल्लाद की तरह मेरे सामने आ खड़ा हुआ और मुझसे थोड़ी दूर पड़े एक बहुत बड़े कूलर को लाने और उसे कमरे के पास लगाने को कहा. मेरी लाख कोशिशों के बावजूद वह कूलर हिला भी नहीं. मेरी बदहाली देखकर तमिलनाडु विशेष पुलिस (टीएनएसपी) के एक मुलाज़िम का दिल पसीज गया और उसने कुछ नए क़ैदियों को मेरी मदद करने के लिए कहा.

बाद में मुझे पता चला कि तिहाड़ जेल में मेरे पूरे प्रवास के दौरान मुझे देशभक्ति का सबक पढ़ाने वाले राजेश और रामू को कहीं ज़्यादा ख़तरनाक जुर्मों के मामलों में सज़ाएं मिली थीं. राजेश पर तिहरे क़त्ल का इल्ज़ाम था और बाद में उसे 80 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई थी. रामू पर बलात्कार का इल्ज़ाम था और बाद में उसे भी सज़ा सुनाई गई थी.

अब यह गलियारा दाख़िले की औपचारिकताएं शुरु होने के इंतज़ार में फ़र्श पर बैठे नए क़ैदियों से भरा पड़ा था. साथ का कमरा खुला पड़ा था. दोबारा बुलाकर मुझे यह कमरा और इसमें रखी मेज़-कुर्सियां साफ़ करने का हुक्म दिया गया. बिना कोई जिरह किए मैंने इस हुक्म की भी तामील की.

दाख़िले की कार्रवाई शुरू हो चुकी थी. एक-एक करके नए कैदियों को अंदर बुलाया जा रहा था. एक जेल अधिकारी और एक डॉक्टर अपने कुछ पसंदीदा कैदियों की मदद से अपने काम को अंजाम दे रहे थे.

यक़ीनन राजेश और रामू उन्हीं पसंदीदा क़ैदियों में से थे. राजेश डॉक्टर के साथ था. जैसे ही उसने मेरा नाम और पहचान चिन्ह दर्ज किए गालियों की बौछार के साथ उसने मेरे साथ मारपीट भी की. डॉक्टर ने मुझसे मेरा जुर्म पूछा. जब उसे बताया गया कि मैं एक आईएसआई का एजेंट हूं तो उसने भी मेरी पिटाई की.

हालांकि एक डॉक्टर होने के नाते उसका काम हर नए क़ैदी की पूरी डॉक्टरी जांच करना और अगर कोई ज़ख़्म हों तो उन्हें दर्ज करना भर था. फिर भी उसने मुझे यह लिखकर देने के लिए कहा कि जेल में मारपीट से हुए मेरे ज़ख़्म हक़ीक़त में पुलिस की हिरासत में हुई मारपीट से हुए थे. उसे इस बात पर हैरानी थी कि पुलिस ने मुझ जैसे ग़द्दार को इतनी आसानी से कैसे छोड़ दिया. पहली बार मैंने थोड़ी हिम्मत जुटाई और रिपोर्ट पर दस्तख़त करने से इंकार कर दिया.

डॉक्टर मुझे अपना हुक्म मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकता था. मैंने सोचा कि वह मुझे राजेश, रामू और उनके साथियों के हवाले करने से ज़्यादा तो और कुछ नहीं कर सकता है.

‘तेरी कमीज़ कहां है?’ रामू ने पूछा.
‘गुसलख़ाने में,’ मैंने जवाब दिया.

‘जाकर ला और जैसी है, वैसी पहन.’ उसने हुक्म सुनाया.

मेरी कमीज़ इतनी गंदी हो चुकी थी कि मुझे उल्टी आने लगी. मगर मुझे अगले तीन दिन तक वही कमीज़ पहनने के लिए मजबूर किया गया. वह भी दिल्ली की जून की तपती गर्मी में. लगता था कि ऐसा बर्ताव ऐसे हर क़ैदी के साथ किया जाता है जिसे नाबालिग़ के साथ बलात्कार करने या शासकीय गोपनीयता अधिनियम के तहत जुर्म करने का कुसूरवार माना जाता हो.

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जेल में कटे वो दिन
लेखक- इफ़्तिख़ार गीलानी
प्रकाशक- पेंगुइन बुक्स
मूल्य-150 रुपए(पेपरबैक संस्करण) कुल पृष्ठ-176

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