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शुक्रवार, 29 सितंबर, 2006 को 00:48 GMT तक के समाचार
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एकदम इकहरी ज़िंदगी

रेखांकन: डॉ लाल रत्नाकर

उपन्यास अंश

दस बारह दिनों के अंतराल पर चटर्जी ने शाम की शैर के लिए वही गड़लुहारों के डेरो की तरफ जाने का रास्ता पकड़ा.

मैंने उनसे कहा,‘‘देखिए उधर बहुत सुनसान है और इधर शहरी लोगों का आना जाना शायद ही होता हो. अच्छा तो यही होगा कि आप नाजो का मोह छोड़ें और घर में रखे छुरों से ही दिल बहलाएँ. कहीं उन लोगों को यह भनक लग गई कि हम उनके डेरे की लड़की पर डोरे डालने की गरज़ से उधर पहुँचते हैं तो हमें लेने के देने भी पड़ सकते हैं. कोई ऊँच नीच घट गई तो किसी को पता भी नहीं चलेगा. यह लोग आदिम स्वभाव के खूँखार लोग है. किसी की भी जान ले लेना इनके बाएँ हाथ का खेल है.’’

चटर्जी साहब ने मेरी सलाह हँसी में उड़ाते हुए कहा, ‘‘छुरे खरीदने वालों से वह लोग यह सुलूक कभी नहीं करेंगे. इसके अलावा तुम्हें याद होगा नाजो ने उस रोज़ कहा भी था,‘‘अपणो पइसा लेने कद आवे सूँ बाबू सा.’’

उनके मुँह से नाजो द्वारा वोला गया वाक्य उसी लबो-लहज़े में सुनकर मैं दंग रह गया. तो यह बात है. नाजो इनके मन में इतनी गहराई तक उतर चुकी है कि यह पूरी तरह ‘नाजोमय’ हो चले हैं.

मैंने फिर उन्हें नहीं रोका टोका- उनके साथ-साथ डेरों की दिशा में आगे बढ़ता रहा.

आज नाजो की भट्टी पर कोई नहीं था. पता चला कि नाजो और उसका बाप शहर में अपने औजार वगैरह बेचने गए हैं.

अब वहाँ ठहरकर इंतजार करने का तो कोई सवाल ही नहीं था. निदान हम लोगों को उधर से निराश ही लौटना पड़ा.

चटर्जी ने पूछा,‘‘क्या ये लोग रात तक अपना सामान उधर बेचते रहते हैं?’’

"बेचते ही रहते होंगे. जब वह छुरी, चाकू, चिमटे वगैरह काफ़ी तादाद में बना लेते हैं तो फिर गाँवों-कस्बों में बेचने के लिए निकल ही जाते होंगे."

चटर्जी मेरी बात पर सहमति जतलाते हुए बोले,‘‘तो चलो फिर और किसी शाम आकर देख लेंगे. अभी तो लगता है कि खानाबदोश कुछ दिनों तक और भी इधर ही पड़ाव डाले रहेंगे.’’

दो चार दिन यों ही निकल गए. एक दिन हम दोनों प्राइवेट बसों के अड्डे के नज़दीक से निकल रहे थे. वहाँ काफी भीड़ इकट्ठा थी. जो बस अड्डे से बाहर तक फैली पड़ी थी और बसों के आसपास भी खूब शोर शराबा था.

सहसा किसी औरत के चीखने-चिलाने की आवाज़ कानों में पड़ी तो मैंने जरा आगे बढ़कर देखना चाहा कि मामला क्या है. चटर्जी साहब ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर पूछा,‘व्हाट इज़ द मैटर.’

‘अभी बतलाता हूँ’ कहकर मैं भीड़ में जरा सा ओर आगे बढ़ गया. वहाँ जो दृश्य मैंने देखा उससे तो मैं हैरान ही रह गया. बिल्कुल खून जमा देने वाला दृश्य था.

वही गड़लुहार लड़की जो चटर्जी साहहब से उस दिन छुरे खरीदते हुए हँस हँसकर बातें कर रही थी और पूछ रही थी ‘आपणों पइसा लेणे कद आवे सूँ बाबू सा.’ इस क्षण स्टीयरिंग व्हील पकड़े एक ड्राइवर को गरेबान पकड़े हुए थी और उसे खिड़की से बाहर खींचकर औंधा किए थी. उसके हाथ में काले-भुजंगे जैसा एक खूँखार छुरा लहरा रहा था. वह चिंघाड़कर कह रही थी ‘थारी मतारी णे गधे...तणे मझे समझो णी रंडी के पूत,’ मणे आज थाड़ी नाड़ काटेगी ई कारण. तणे म्हारे धरम, बिगाड़ो... म्हारो नी होके रहणो तो मणे वी तजे जीता नी छोड़णो. तेरा रकत नी पी जाऊँ तो मज्झे बी नाजो ना कहणा.’

माजरा एकदम से समझ में नहीं आ रहा था. सामने जो कुछ था उससे इतना ही अनुमान लगाया जा सकता था कि उस हट्टे कट्ठे गबरू जवान ड्राइवर ने नाजो को किसी कारण शायद छेड़ छाड़ करके क्रुद्ध कर दिया था. मगर इतनी सी बात पर वह मरने मारने पर क्यों उतर आई थी? साथ ही वह धरम बिगाड़ की भी घोषणा कर रही थी. तो क्यों उस ड्राइवर ने नाजो को शादी का झाँसा देकर उससे दैहिक संबंध बना लिए थे?

कुछ ही देर में लोगों की कनफूसियों से जो तथ्य सामने आए उनसे सारी कहानी स्पष्ट हो गई. हुआ यह था कि ड्राइवर, जो कौम का ठाकुर था नाजो के बहुत दिनों से फुसलाता आ रहा था कि वह नाजो से विवाह कर लेगा. इसी के चलते उसने नाजो का दैहिक शोषण भी कई बार किया था. ड्राइवर की धोखाधड़ी से उत्तेजित नाजो ने बदला लने का फैसला इसी रूप में किया था कि अब जो भी हो उस ड्राइवर की जान लेकर रहेगी.

इसी गहमा गहमी के दौरान शोर सुनकर कहीं से पुलिस के दो सिपाही भी घूमते घामते आ निकले. उन्होंने जो ड्राइवर की एँठी हुई गर्दन और पपोटों से बाहर निकल पड़ती आँखों का हाल देखा तो ड्राइवर का गिरेबान नाजो के हाथों से खींच खांचकर किसी तरह छुड़ाया और नाजो को ढाँढस बंधाया कि वह ड्राइवर को थाने ले जाकर उसकी खाल में भूस भर देंगे.

नाजो की आँखों में खून उतरा हुआ था मगर अब वह सिपाहियों के आ जाने से बेवस हो गई थी. उसने हाथ का छुरा एक तरफ फेंक दिया और ड्राइववर के मुँह पर थूक कर बोली, ‘जा बड़ (घुस) जा अपनी जाई के...कहीं तो हाथ आवेगा. तणे बकरो सा हलाल ना करो तो मणे अपनी माँ की बेट्टी ना केया बेस्वा (वेश्या) की ऊलाद (औलाद) कैणा.’

नाजो को मैंने चोटिल नागिन की तरह उस भीड़ में फुंफकार मारते देखा सुना. फिर वह भीड़ से निकलकर एक तरफ चली गई. मायूसी के बावजूद उसके चेहरे पर अंगार दहक रहे थे.

कुछ ही क्षणों में सारी भीड़ तितर बितर हो गई और बसों की आवाजाही शुरू हो गई. मैने गंभीर विचारों में खोए चजर्जी साहेब से कहा, "आप किस सोच में डूबे हुए हैं. अब तो सारा कुछ आप अपनी आँखों ही देख चुके हैं. चिड़िया तो उड़ गई अब ‘पछताने’ से क्या होगा."

 गड़लुहारों का जीवन हमें और आपको बाहर से आकर्षक और रोमांटिक लगता है पर वास्तव में वह वैसा है नहीं. ये सब लोग बहुत कठोर, ‘मैटर ऑफ फैक्ट लाइफ' जीते हैं एकदम इकहरी ज़िंदगी. जिसमें कविता में बखाने जाने वाली भावनाओं और भावुकता की कोई गुंजाइश नहीं है. सीधे शब्दों में कहें तो उनकी ज़िंदगी कुँए के स्रोत को फोड़कर आने वाले पानी जैसी है

मेरी टिप्पणी पर वह कुछ नहीं बोले तो मैंने कहा, "आपने अपनी नाजो का असली रूप देख लिया.?"

"देख लिया जनाब! इस चीज़ के लिए ही तो मैं खाना बदोश के डोरों की तरफ जाता था. इस लड़की के लिए मेरे दिल में जबरदस्त जगह पैदा हो गई है."

मैंने उनके चिंतामग्न चेहरे की ओर देखकर परिहास में कहा,‘‘लेकिन आप चूक गए. अगर उस ड्राइवर से पहले शुरूआत कर बैठते तो बाज़ी आपके हाथ रहती.’’

मेरी फब्ती सुनकर वह जरा भी नहीं हँसे. उनके चेहरे पर सोच का भाव पूर्ववत बना रहा. वह कहने लगे, "मिस्टर चरन यह बाज़ी हमारे हाथ में तो कभी भी न रहती. यह सारा कुछ हालात पर निर्भर करता है."

"क्यों? कैसे हालात? ऐसी निराशा की क्या वजह हो सकती है?"

इस पर उनके चेहरे का रंग थोड़ा बदला और वह सामान्य स्थिति में लौटकर बोले, "चीज़े ऊपर ही ऊपर नहीं बदली जा सकती. गड़लुहारों का जीवन हमें और आपको बाहर से आकर्षक और रोमांटिक लगता है पर वास्तव में वह वैसा है नहीं. ये सब लोग बहुत कठोर, ‘मैटर ऑफ फैक्ट लाइफ' जीते हैं एकदम इकहरी ज़िंदगी. जिसमें कविता में बखाने जाने वाली भावनाओं और भावुकता की कोई गुंजाइश नहीं है. सीधे शब्दों में कहें तो उनकी ज़िंदगी कुँए के स्रोत को फोड़कर आने वाले पानी जैसी है. वहीं तो असली जल है मगर क्या हम सुविधाओं में जीने वाले प्राणी उस पानी को हजम कर सकते हैं, टैप में आने वाले पानी को भी हम फ़िल्टर करके पीते हैं. वैसा न करें तो बीमार हो जाएँगे."

जिप्सी स्कॉलर

मैं उनके गहरे मंतव्य से बहुत प्रभावित हुआ और बोला, ‘‘हाँ यह तो बड़े गहरे नुक्ते की बात कही आपने.’’

वह अपनी रौ में कहते चले गए. ‘क्या तुमने ‘जिप्सी स्कालर’ पढ़ी है?’

"जिप्सी स्कालर? उसमें क्या है. मैंने तो कभी पहले उसका नाम भी नहीं सुना."

वह धीमी गति से बढ़ते हुए बोला, मैं बतलाता हूँ. एक बौद्धिक व्यक्ति जिप्सिमा ‘रोमिंग (धुमक्कड़) लाइफ’ के प्रति बहुत गहरा आकर्षण अनुभव करता था. वह उसी लगाव के चलते बराबर यह सपने देखता रहता था कि वह खुली फिज़ाओं में जिप्सियों के खाना बदोश कविले के साथ भटक रहा है.

यहाँ आकर चटर्जी साहब एक क्षण के लिए ठहर गए और मेरी उत्सुकता को लक्ष्य करके बोलने लगे, ‘‘संयोग से उस स्कालर के हाथ एक ऐसा मौका आ ही गया कि वह जिप्सियों के कवीले में जा पहुँचा. उन्हें भी उसे अपने साथ रखने में कोई आपत्ति नहीं हुई. शुरू में तो उसे उन लोगों की जंगली आदतें, आदिम ज़िंदगी का खुलापन और अनगढ़ बोलचाल खूब पसंद आई. मगर शरीर के धरातल पर उनकी तरह जी कर आनंद और उल्लास में जीने की लालसा उसे ज़्यादा देर रास नहीं आई. वह जिन ज़रूरतों और आदतों का गुलाम था-वह फ़िल्टर लाइफ वहाँ कहाँ मयस्सर थी. दिमागी धरातल पर लाबाऊलीपन में जीना एक बात है और अपने संस्कारों को तिलांजलि देकर एक बिल्कुल भिन्न शैली में अपनी जीवन चर्या ढालना असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल ज़रूर है. सो वह बेचारा जिप्सी स्कालर अंततः खानाबदोश ज़िंदगी से मोह भंग हो जाने की स्थिति में अपनी पुरानी और उसी उबासी भरी बासी दुनिया में लौट आया.’’

मैं बोला,‘‘यह तो बहुत महत्वपूर्ण गाथा है. इसका मतलब तो सीधे-सीधे यही निकलता है कि वह हर शख्स जो खुली, बेवाक और आदिम ज़िंदगी जीने का सपना पालता है वह उसका एक दिमाग़ी खलल है.’’

"यह एकदम से सटीक निष्कर्ष है. आप दूसरों की ज़िंदगी महज़ ख्यालों और भावनाओं में जी सकते हैं और हवाईपन में ही उसे जी सकने में सुविधा भी है मगर एक बार वास्तविक तल पर उसमें शामिल हो जाने पर आप उसे अधिक देर तक चला नहीं सकते. आज अपने खून की माँग पर गौर करें तो आप यही पाएंगे कि आपको अपनी बनी-बनाई एक विशेष शैली ही अनुकूल लगता है. कोई किसी और का जीवन नहीं जी सकता. आप बरसों से जिस घर में रहते हैं उसकी चहारदीवारी अनजाने में ही आपको इस कदर बाँध लेता है कि आप सुविधाओं से भरे बड़े से बड़े महलों या शानदार होटलों में भी थोड़े दिनों में ऊब जाएँगे और मौका पाते ही अपने दड़बे की ओर दौड़ पड़ेंगे."

हम दोनों कुछ सोचते हुए निःशब्द आगे बढ़ते रहे. नगर में दाखिल होने पर मैं चौराहे पर ठहर गया. रात होने लगी थी. मैंने सोचा मैं अपनी कोठरी की ओर ही चला जाऊँ.

चटर्जी साहब शायद, मेरे मन की बात भाँप गए. वह मेरे कंधे पर हथेली से हल्की सी चाप देकर बोले,‘‘अरे मियाँ! घर जाने की ऐसी भी क्या जल्दी है? वहाँ आपका कोई इंतजार तो कर नहीं रहा होगा.’’

मैंने ठहाका लगाकर कहा,‘‘वही चहारदीवारी इंतजार करती होगी जिसका ज़िक्र आपने अभी-अभी किया था.’’

‘‘चलो यही सही. थोड़ा विद्रोह और सह लेना उनका. खाना पीना करके रात को सोने चले जाना.’’

मैं चटर्जी साहब के अनुरोध पर उनके साथ आगे चल पड़ा तो वह बोले,‘‘अपना हाल भी उस जिप्सी स्कॉलर से अलग थोड़े ही है, अगर अपने भीतर वैसा जीवन जीने की सच्ची ललक होती तो न जाने कितने पहले उस तरह के आदिम कबीलों में जा मिला होता.’’

‘‘चलिए आप तो एक नफ़ासत भरी जीवन शैली के आदी हैं मगर उस बे पढ़े-लिखे ड्राइवर को देखिए जिसने नाजो जैसी अनिद्य सुंदरी को अपने प्रणय पाश में बाँधकर भी छलाकर ही किया. अगर वह उससे विवाह कर ही लेता तो क्या बुरा था बेचारी भोली भाली लड़की कितनी उत्तेजित और निराश हो चली थी.’’

‘‘तुम्हारा सोच ठीक है मगर यह क्या यह नहीं हो सकता कि नाजो की देह से खेलने वाला ड्राइवर एक शादी शुदा गृहस्थ हो? उसका भी अपना रचा बसा संसार हो. वीबी बच्चों को लेकर एक सुखी जीवन जीता हो. जहाँ तक मैं समझता हूँ वह भी अपने संस्कारों की एक फिल्टर ज़िंदगी की ग़ुलाम है. अगर वह सच में नाजो के प्रति प्रेम में पगा लेता तो सारे झूठे मुलम्मे उतार फेंकता और उसे अपनी जीवन सहचरी बना लेता. वह भी हम सब की तरह घटिया और कायर निकला. नाजो के शरीर से खेलना उसके लिए एक शगल से अधिक कुछ नहीं था. लड़की बहुत मूर्ख होती हैं- उन्हें झूठी प्रशंसा और लल्लों चप्पों से कोई भी किसी भी सीमा तक फुसला सकता है.’’

‘‘आप सब कुछ जानते समझते हुए यह दोहरी ज़िंदगी जीते हैं?’’

‘‘कौन नहीं जीता? आधुनिक ज़िंदगी ने हमें यही तो एक महासंक्रामक बीमारी दी है कि हम एक चेहरों वाली जीवन शैली से दिनों दिन दूर हटते चले जा रहे हैं. और तो और जहाँ इसकी ज़रूरत नहीं है वहाँ भी हम अनजाने में वही दो मुहाँपन कर बैठते हैं.’’

मैं जान बूझकर मेहतरो की उसी बस्ती से होकर निकला जहाँ से घूमते हुए जाना चटर्जी का प्रिय शगल था. मेरा ख्याल था कि वहाँ हर शाम होने वाले हंगामे पर वह आज भी जरूर कोई टिप्पणी करेंगे. पर उस शाम उन्होंने उसका उल्लेख तक नहीं किया. शायद अचेतन में उनके पाँव उसी पुराने मार्ग पर चलने के अभ्यस्त हो चुके थे मगर उन सारी भड़काऊ स्थतियों में रस लेने की मानसिकता से उस समय बुहत दूर थे. क्या यह नाजो के साथ हुए हादसे की प्रतिक्रिया थी? जो हो उस शाम का यह परिवर्तन कुछ नहीं था कि जिस दृश्य का आनंद प्राप्त करने की गरज से एक आदमी एक ख़ास बस्ती से गुजरता हो. किसी दिन वहाँ से निकलते समय उसे दिक्काल का कोई ख्याल ही न रहे. इस तरह की गफ़लत भीतर के आंदोलन से जुड़ी हुई न हो यह कैसे कहा जा सकता है.

उनके साथ बढ़ती घनिष्ठता ने उनके मानसिक तंत्र को समझने में मेरी अच्छी सहायता की. सोच और कर्म के स्तर पर उनका द्वैत उनके व्यक्तित्व का मुख्य केंद्र था. लगता तो यह था कि वह औरों से भाग रहे हैं मगर वास्तविकता यही थी कि वह बहुत से अवसरों पर स्वयं की ही तरह दे जाते थे. कभी-कभी तो यह प्रवृत्ति चिलचस्प लगती है मगर बाज़ मौकों पर तकलीफदेह भी कम नहीं होती.

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(लेखक ने अभी इस उपन्यास को कोई नाम नहीं दिया है)

उपन्यास अंश
कहानीकार-उपन्यासकार मंज़ूर एहतेशाम के उपन्यास 'बिगाड़' का एक अंश.
उपन्यास अंश
वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘मिलजुल मन’ का एक अंश.
उपन्यास अंश
वरिष्ठ कथाकार संजीव के उपन्यास 'आकाश चम्पा' का एक अंश.
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