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अम्मा से वह आख़िरी मुलाक़ात | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुपरिचित कथाकार मंज़ूर एहतेशाम इन दिनों अपने नए उपन्यास की रचना में लगे हुए हैं. प्रस्तुत है इस उपन्यास ‘बिगाड़’ का एक अंश.... बात बिगड़नी तो शायद काफ़ी पहले, जब उसने जायदाद में अपने हक़ का यूँ ही सरसरी तौर पर ज़िक्र किया था, शुरू हो गई थी लेकिन उसकी संजीदगी का शुरू में खुद उसे अंदाज़ा नहीं हुआ था. पिछले कुछ साल उसके लिए ऐसे बीते थे जिनमें अनेक रहस्य-रूपी मामलों पर से पर्दा उठा था और कई ऐसी बातें जिन्हें वह अपने बचपन से जोड़कर लाख समझने की कोशिश के बाद भी नहीं समझ पाता था, साफ़ होती गई थीं. यह कि वह यतीम था और जिन्हें इतने लंबे अर्से तक अपना पिता समझता रहा था, अम्मा के दूसरे शौहर और खुद उसके सौतेले बाप थे, और उसी हिसाब से बाक़ी पाँचों छोटी बहनें, उसकी सौतेली बहनें. और यह भी कि सौतेले बाप की जायदाद में उसका कोई हिस्सा नहीं बनता था. फिर एक के बाद दूसरी, कई ऐसी बातें जिनको जानना न सिर्फ़ अम्मा के प्रति उसकी सोच को गड़बड़ाता था, बल्कि अभी तक जो-जो हो चुका था उसे अजीब तरह से हास्यस्पद बनाता था. अगर यही था तो सात साल पहले जब उसकी गृहस्थी भोपाल में जम चुकी थी, अम्मा ने उसे और मरियम को बंबई वापस आने पर क्यों मजबूर किया?! जवाब एक ही हो सकता था-अपनी ख़ुदगर्ज़ी की वजह से! वहाँ बंबई में अब्बा की जायदाद के उलझे मामलों को सुलझाने के लिए कोई भरौसेमंद भाग¬-दौड़ करने वाला नहीं था. अब्बा की पहली शादियों से, एक नहीं, दर्जन-भर औलादें थीं, लेकिन सब निकम्मी भी, और अब्बा-अम्मा, ख़ास तौर पर अम्मा की दुश्मन भी. दरअसल, उन सात खातों के दौरान ही ज़्यादातर राज़ों पर से पर्दे उठे थे. उस बीच, खुद उसकी कोशिशों से बंबई में ज़्यादातर जायदाद के उलझे मामले भी सुलझ चुके थे, और उसके अपने लिए कुछ माँगने पर अम्मा के इनकार के बाद, जो कोशिश उसने खुद पाँवों पर खड़े होने की की थी, न सिर्फ़ यह कि बुरी तरह नाकाम हो गई थी, बल्कि मामला जिस तरह खुलकर सामने आया था उससे अम्मा को यक़ीन हो गया था कि वह अब्बा की जायदाद में अमल-दख़ल करके, ग़ैर-क़ानूनी तौर पर बंधा-पैसा कमाना चाहता है! उसने ग़ैर-ज़रूरी सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं समझी थी और एक बार फिर, मरियम और बिटिया के साथ उसी शहर भोपाल का रूख़ किया था जो बीते समय में एक बार उनकी पनाहगाह रह चुका था. आज की दुनिया में अव्वल तो आदर्श-नामी तोता पालता कौन है, या पालता है तो उसकी परवरिश गिद्ध की तरह करता है, दूसरे लोगों को नोचने-खसूटने के वास्ते इस्तेमाल करने को. ज़िंदा चीज़ें अपनी उम्र गुज़ार सकने के लिए आबो-हवा और फ़िज़ा की मुहताज होती हैं, वह तोते हों, गिद्ध या इंसान! कभी कोई बेईमानी करते हुए नीयत थोड़ी करता है कि मैं अब फ़लां-फ़लां काम बेईमानी का करने जाता हूँ. बेईमानी भी हो जाती है, ईमानदारी की तरह और जो हो जाए उसके पक्ष में दलीलें पेश करना, कौन-सा मुश्किल काम है! बेईमानी भी हो जाती है, ईमानदारी की तरह, और जो हो जाए उसके पक्ष में दलीलें पेश करना, कौन-सा मुश्किल काम है! लगता है, आज ऐसा हो गया है, लेकिन यक़ीनन दुनिया-बनने के साथ ही ऐसा रहा होगा. सवाल-जवाब का जोखिम भी किसी के साथ इस तकल्लुफ़ को बरतते ही उठाया जा सकता है कि कहीं हम आपसी लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन तो नहीं कर रहे! तो भी, सारे दुनियादारी के तक़ाजे जे़हन में रखने की कोशिश के बावजूद ऐसा हो जाता है (जिसके करने की बेपनाह ख़्वाहिश दिल में होने के बावजूद) जो हम करना नहीं चाहते!
भोपाल लौटने के कुछ वक़्त बाद, अपना काम शुरू कर सकने के सहारे खोजता, जब वह एक बार फिर वापस बंबई गया था, तो ऐसा ही कुछ अम्मा और उसके बीच हो गया था, जिसके नतीजे उसे अम्मा का वह रौद्र-रूप देखने को मिला था. -अरे जा, जा! अम्मा ने गुस्से की लौ पकड़ती आवाज़ में उसे ललकारा था. –तेरी हैसियत मेरे लिए कपड़े की उस चिन्दी से ज़्यादा नहीं जो महीने पर औरत बांधती है? तुझ जैसे कितने कीड़े मेरे जिस्म से गंदगी बनके बह गए, बेग़ैरत! तू बात किस से कर रहा है! पल भर को उसे चक्कर आ गया था. आँखों के सामने अंधेरा और कानों में झाईयाँ बजने लगी थीं. सारी कड़वाहट और बिगाड़ के बावजूद उसने कल्पना नहीं की थी कि अम्मा उससे कभी इस मुहावरें में बात कर सकती थीं या कभी उसके कान उनकी आवाज़ में यह सुन सकते थे. तब तक हो रही बातचीत, जिसमें खुद उसके तेवर हमले के थे, या हमलावराना ढंग से जिसकी शुरुआत हुई थी, एकदम ग़ायब- उसका दिमाग़ बिल्कुल ख़ाली हो गया था. उस पल अगर उसने क़रीबी दीवार का सहारा न लिया होता तो शायद ग़श खा कर गिर जाता. और फिर, बिल्कुल अनजाने और अनचाहे, उसकी आँखों से आंसुओं की मोटी धारें बह निकली थीं. यह, कि खुद उसके अंदर आंख से बह निकल सकने वाले माद्दे की इतनी मिक़दार मौजूद थी, उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था, क्योंकि खुद अपनी याद में वह शायद ही कभी रोया था. ज़िंदगी के उलझावे हों या मौत के सदमे, उस पर इस तरह असरअंदाज़ नहीं हो पाए थे कि अपने अंदरूनी समंदर का उसे एहसास हो पाता. और पता नहीं वह रोना ही था या उसे अलग से कोई नाम दिया जाना चाहिए, क्योंकि आंख़ें ज़ारो-क़तार बहती रही थीं लेकिन हलक़ से कोई भी आवाज़ नहीं निकली थीं. बल्कि शायद पूरे वक़्त उसके चेहरे पर मुस्कुराहट सी खेलती रहीं थी! अच्छा हुआ उस वक़्त वहाँ दूसरा कोई नहीं था, वरना क्या तमाशा बनता उसका! एक छह-फीटा, लहीम-शहीम आदमी, सर-मूंछ-सब सफ़ेद, जितना-जितना मुस्कुरा रहा था, आंखों से उतने ही ज़्यादा आंसू बह रहे थे! ‘स्माइल मसल्स’ और ‘हेयर डक्टस’ का आपस में ऐसा मसख़रा शॉर्ट-सर्किट शायद ही कभी देखने में आता हो. जाने कितना वक्फ़ा रहा होगा, अम्मा का आख़री जुमला सुनने के बाद उसके होशों-हवास वापस लौटने में, लेकिन जब ऐसा हुआ था तो उसने पाया था उस दौरान एक पल को भी अम्मा चुप नहीं हुई थीं, और लगातार उसी कैफ़ियत में बोले चली जा रही थीं. वह पल उसकी शिकस्त का पल था-‘कोई सुलह नहीं! उनकी नाराज़गी और गुस्सा खुद उसके कानों तक सिर्फ़ आवाज़ की ऊँच-नीच की तरह पहुँच रहा था, जिसे शब्दों में समझ पाना या जिसका जुम्लों में मतलब निकाल पाना मुम्किन नहीं था. अपनी आस्तीन की कोर से आँखें खुश्क करते हुए उसने नज़र भर कर उन्हें देखा थाः आँखों में कौंधती दीवानगी, नफ़रत में फड़कती नाक और खुद पर क़ाबू रखने के लिए फ़र्श पर बिछे क़ालीन पर होले-होले उठते क़दम. उन्होंने हरे फूल-बूटे की पैटर्न का स्लीपिंग-गाउन पहन रखा था और नाक में कीमती हीरे की लोंग दमक रही थी. उस अधूरे हवास की कैफ़ियत में भी जो लफ़्ज़ सिमट कर उसकी ज़बान पर आया, वह ‘वाह! ही था! एक बार फिर से वह अम्मा के रौब का क़ायल होने पर मजबूर हो गया था. वाह! कुछ पल ठहर कर फिर वही उसने ऊँची आवाज़ में दोहराया था, अम्मा को एकटक देखते. वाह-वाह क्या कर रहा है! वह और भड़क उठी थीं-कोई मुशायरा हो रहा है यहाँ?! मुशायरा तो नहीं, वह बोला तो लगा आवाज़ मनों बोझ में दबी, कमज़ोर और कहीं दूर से आ रही थी-वाह-वाह क्या सिर्फ़ शायरी सुनकर ही की जाती है! आपको मान गए, उसकी दाद दें रहे हैं! हम आपके सामने लगते कहाँ हैं, उसने इस तरह कहा था जैसे उनसे नहीं, खुद अपने-आप से बात कर रहा हो. हर मायने में, हैं आप हमारी अम्मा ही! वार और ऐसा तीखा! बक़ौल शायर-‘तेग़आज़मा का हाथ ही काम से जाता रहा!’ मान गए?
जा रस्साले! उन्होंने हिक़ारत से कहा था-शेर सही याद रख सकने तक की तो तमीज़ नहीं, कि ‘तेग़आज़मा का हाथ ही’ और ‘हाथ ही तेग़आज़मा’ के बीच फ़र्क़ कर सकते! शायरों-अदीबों की दोस्ती का दम भरते हैं! हम से सवाल-जवाब करके तफ़सील और सफ़ाई चाहते हैं, केंचेवे स्साले! वह कौन-सी बदबख़्त घड़ी थी, मेरे मालिक! जो मैंने ऐसे जान के दुश्मनों को जना! और जन दिया था तो गला घौंट कर ख़त्म क्यों नहीं कर दिया! वह कौन-सी ख़ता हुई मुझसे मेरे मालिक! जिसकी सज़ा तू इन मरदूदों को मेरे सिर पे मुसल्लत करके दे रहा है. घड़ी और पल, मेरी पैदाइश के, खूब याद होंगे आपको. उसने इस अंदाज़ में कहा था जैसे अम्मा को जता देना-चाहता हो कि उसे सिर्फ़ एक लड़ाई में मात हुई थी. जंग अभी बाकी थी. जब बेटे ने पैदा होकर आँखें खोली और बाप ने दुनिया को अलविदा कहा! जब मुल्क को फ़िरंगी और आपको कंगाल शौहर से...! उसने जुम्ला अधूरी छोड़ दिया था. उसे पूरा करने की ज़रूरत भी नहीं थी. वह उसके दिमाग को खूब अच्छी तरह समझती थीं. हाँ! उन्होंने गुस्से में पूरी ताक़त से चीख़ते हुए कहा था-डाकू! पैदा होते ही बाप को खा गया! और किसी आँधी में पत्ते-सी काँपती, कुछ घातक कर गुज़रने से बचने के लिए, वह कमरे से चली गई थीं. ठीक किया वरना उतनी देर में वह शॉक और सदमे से इतना तो उबर ही चुका था कि मासूमियत से पूछता-खा कहाँ गया, आपके लिए आसानी कर दी! आज़ादी दिला दी! वह मरते नहीं तो एक कंगाल की मुहब्बत आपके लिए कितने दिन को क़ाफी होती! कितना साथ निभा पातीं आप उसका या जब तक वह ज़िंदा था, कितना साथ रहीं आप उसके! यह थी उसकी अम्मा से वह आख़िरी मुलाक़ात जिसे यादगार कहा जा सकता था. |
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