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उन्नीसवीं शताब्दी की लघु कथाएँ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटिश लायब्रेरी लंदन में हिंदी की पुरानी पुस्तकों का बड़ा संग्रह है. इन पुस्तकों में ‘मनोहर कहानी’ इसलिए आकर्षित करती है कि यह नवम्बर 1882 में छपा लघुकथा संग्रह है. पुस्तक के पहले पन्ने पर ‘मनोहर कहानी’ के नीचे लिखा है, ‘जिसमें सौ अलाहिद: अलाहिद: निहायत दिलचस्प किस्स दर्ज हैं.’ पुस्तक लखनऊ के विख्यात प्रकाशन मुंशी नवल किशोर ने छापी है. पहले ही पन्ने पर दर्ज है- ‘‘दूसरी बार 1200 जिल्द छापी’’ . 19वीं शताब्दी में आमतौर पर किताबों की कम प्रतियाँ छापी जाती थीं. दूसरे संस्करण में ‘मनोहर कहानी’ का 1200 छापा जाना यह सिद्ध करता है कि यह पुस्तक अपने समय में बहुत लोकप्रिय रही होगी. ‘मनोहर कहानी’ में न तो कहानी लेखकों का नाम है न ही संपादक का उल्लेख है. लेकिन कहानियाँ पढ़ने से यह लगता है कि सभी कहानियाँ किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की गई हैं क्योंकि उनकी भाषा शैली में बड़ी एकरूपता है. संभवतः प्रकाशन, मुंशी नवल किशोर, के सुझाव पर किसी लेखक ने लघु कथाएं जमा करके पुस्तक तैयार की होगी. ‘मनोहर कहानी’ में प्रकाशित कहानियों का चार वर्गीकरण किया जा सकता है. पहला प्रकार उन कहानियों का है जो किसी मुहावरे की व्याख्या करती हैं तथा इन कहानियों का अंत मुहावरे पर होता है. दूसरे प्रकार की वे कहानियाँ हैं जो अकबर और बीरबल के किस्सों के रूप में प्रचलित हैं. इनके अंतर्गत कुछ ऐसी कहानियाँ हैं जो कालांतर में अकबर बीरबल के किस्सों के नाम से गढ़ी गई होंगी और उन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए अकबर बीरबल के किस्से कह दिया गया होगा. तीसरे प्रकार की कहानियाँ मध्या एशिया के प्रसिद्ध हिकायतों तथा पंचतंत्र की कहानियों के परिवर्तित रूप हैं. अंतिम प्रकार के अंतर्गत वे कहानियाँ भी आती हैं जो देश के विभिन्न भागों में प्रचलित हैं और आज भी लोकमानस का हिस्सा बनी हुई हैं. इस तरह यह संग्रह अपने समय की लोकप्रिय और प्रचलित कहानियों का संग्रह ही कहा जाएगा. इसमें मौलिकता का अंश कितना है यह प्रश्न अवश्य विचारणीय है. कहानियों के माध्यम से 19वीं शताब्दी के सामाजिक जीवन और उनके विभिन्न कार्यकलापों की झलकियाँ मिलती हैं. दिल्ली शहर के बाँके, अफ़ीमी और उचक्के कई कहानियों के मुख्य पात्र हैं. चतुर व्यक्ति बनाम सीधे व्यक्तियों के द्वंद्व को कई कहानियों का आधार बनाया गया है. कहानियों की भाषा का अध्ययन विशेष रूप से रोचक है. यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि खड़ी बोली का जो स्वरूप इन कहानियों में दिखाई पड़ता वह लोकप्रिय स्वरूप है. इसकी खड़ी बोली पर सबसे अधिक ब्रज का प्रभाव दिखाई पड़ता है. उदाहरण के लिए ‘ल’ को ‘र’ के रूप में प्रस्तुत किए जाना तथा ‘ओ’ के स्थान पर ‘औ’ का प्रयोग यह साबित करता है कि कहानियों की भाषा पर ब्रजभाषा का प्रभाव है. भाषा में सांकेतिकता और लाक्षणिकता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है. द्विअर्थी शब्दों के प्रयोग पर भी बल दिया गया है. प्रकाशित कहानियों में किसी प्रकार के विराम चिन्ह का प्रयोग नहीं किया गया है. न तो कहीं पूर्ण विराम है, अर्द्ध विराम या अल्प विराम है. कहानियों में केवल विस्मयादिबोधक चिन्ह का प्रयोग किया गया है. प्रत्येक कहानी के अंत में दो पाई (खड़ी लाईनों) द्वारा कहानी के अंत की सूचना दी गई है. (हालांकि पाठकों की सुविधा के लिए हम कहानियों को सभी विराम चिन्हों के साथ प्रकाशित कर रहे हैं) असग़र वजाहत ********************************************* कहानी-8 किसी ठाकुर द्वारे में कई एक अताई चैन से बैठे गा रहे थे और बहुत से लोग खड़े सुनते थे. इसमें एक ढीठ बैरागी आया और उनके हाथ से तम्बूरा ले, सबके बीच में बैठ, लगा बेसुरा हो गाने. उसका खटराग सुन सब उदास हुए पर कोई न बोला. निदान एक चौबे खड़ा सुनता था. उसने कहो,‘‘बाबा जी! बस करो, बस करो, बहुत गाए.’’ बैरागी ने खिजला के उत्तर दियो,‘‘महाराज ! मैं तो अपने ठाकुर को रिझाता हूँ और कोई रीझा तो क्या, न रीझा तो क्या?’’ चौबे बोला,‘‘सारे! मौको तो रिझाय ही न सक्ये’’ कहा,‘‘ ठाकुर मोंहूं सों कूढ़ है जो तू रिझाए लेगो?’’ यह सुनकर वह लज्जित चुपचाप उठकर चला गया. कहानी -17 एक क्रोधी अंधा कहीं चला जाता था कि एक अंधे कुएं में गिर परा और लगा पुकारने के, चलियो दौड़ियो लोगों. मैं कुएं में गिर पड़ा. लोग तरस खा दौड़ कर वहां गए और कुएं के पनघटे पर खड़े होके उसके निकालने का उपाय करने लगे. कुछ बेर जो हुई तो वह भीतर से रिसाय के बोला कि शीघ्र निकालते हो तो निकालो नहीं तो मैं किधर ही को चला जाता हूँ, मुझे फिर न पाओगे. कहानी -20 दो जान पहचान मिलकर भ्रमण को निकले और चले-चले नदी के तीर पर पहुँचे. तब एक ने दूसरे से कहा कि भाई! तुम यहाँ खड़े रहो तो मैं शीघ्र एक डुबकी मार लूँ. इसने कहा,‘बहुत अच्छा’. यह सुनकर वह 20 रूपए उसे सौंप कर कपड़े तीर पर रख जो पानी में बैठा तो उसने चतुराई से वे रुपए किसी के हाथ अपने घर भेज दिए. उसने निकल, कपड़े पहन रूपए माँगे. यह बोला,‘लेखा सुन लो’. उसने कहा,‘अभी देते अबेर भी नहीं हुई, लेखा कैसा?’ निदान दोनों से विवाद होने लगा और सौ पचास लोग घिर आए. उनमें से एक ने रूपए वाले से कहा, ‘अजी क्यों झगड़ते हो?, लेखा किस लिए नहीं सुन लेते’? हार मान उसने कहा, ‘अच्छा कह.' वह बोला, ‘‘जिस काल आपने डुबकी मारी, मैंने जाना डूब गए. पाँच रूपए दे तुम्हारे घर संदेशा भेजा और जब निकले तब भी और पांच रुपए आनंद के दान में दिए. रहे दस तो मैंने अपने घर भेजे हैं उनकी कुछ चिंता हो तो मुझसे टीप लिखवा लो’’. यह धांधलपने की बात सुनकर वह बिचारा बोला भला भाई! भर पाए. कहानी -22
कोई पोस्ती जंगल में बैठा कटोरी में पोस्त घोल रहा था. दैवी किसी झाड़झूड़ से एक खरहा जो निकल के दौड़ा तो उसके धक्के से इसकी कटोरी लुढ़क पड़ी. यह रिसाय के बोला कि तुझसे क्या कहें भला तेरे बाप से ही जाकर कहेंगे. इतना कह कूंडी खोटा कांख में दबा नगर में जा हर एक चौपाए को देखता चला. निदान एक गधे को जो उसके वरण के समान था पाया तो गधे वाले से जाकर कहा कि तेरे इस पशु के बेटे ने मेरी पोस्त की कटोरी भरी हुई लुढ़ा दी. उसने कहा कि जिसके बेटे ने लुढ़ाई है विसी से जाकर कहो. ये सुन वह गधे के पास जा उसकी पीठ पर हाथ रख चाहे कि कुछ कहे वो हीं उसने फिर कर एक ऐसी दुलत्ती मारी कि यह बिचारा हाय कर बैठ गया और हँस कर बोला कि क्यों न हो जिसका बाप ऐसा हो जिसका लड़का वैसा ही हुआ चाहिए. इतना कह चला गया. कहानी -31 कोई बनिया बटोही बाट मूल के एक बन में जा निकला, उसे वहां और उसे और तो कोई न सूझ पड़ा पर एक योगी दिखाई दिया. इसने उसे दंडवत करके पूछ ‘‘नाथ जी! आते हो कहाँ से और जाओगे कहाँ?’’ उत्तर दिया,‘‘बाबा हिंगलाज ज्वालामुखी हरिद्वार क्षेत्र कुरूक्षेत्र करके तो आया हूँ और काशी हो गंगा गोदावरी का मेला कर सेतुबंध रामेश्वर को जाऊँगा.’’ बनिए ने कहा,‘‘महाराज! एक बात पूछूं जो क्रोध न करो’’? बोला बाबा! ‘‘एक नहीं, दो कहा’’. ‘‘महाराज हम गृहस्थी हैं जो देश फिरे तो कुछ दोष नहीं, आप फ़क़ीर हो भटक-भटक क्यों भरम गंवाते हो, एक ठौर बैठ कर किस लिए अपने भगवान का ध्यान नहीं करते?" कहा बाबा! ‘‘तूने यह कहावत नहीं सुनी. बहता पानी न निर्मला बंधा गंधीला होय. साधूजन रमता भला दाग न लागे कोय.’’ कहानी -70 मुफ़्त बिराने माल के खाने वाले दिल्ली के बांके प्रसिद्ध हैं. एक दिन कोई बांका किसी हलवाई की दुकान से सोंही जा खड़ा हुआ और लगा उसकी मिठाई की और सैन करके पूछा, "यह क्या है?" उसने कहा, ‘खाजा’. इतनी बात के सुनते ही वह झटपट थाल उठा, उसकी सब मिठाई खा गया और लगा कुछ रोकड़ माँगने और कहने कि मैंने तेरा कहना पूरा किया इसकी मजदूरी दे. निदान धमक़ा धमकू के उसने एक रूपया ले ही के छोड़ा. तब कई एक आदमियों ने आके हलवाई से पूछा कि अजी यह क्या बात थी कह तो सही.
बोला, ‘‘महाराज! कहूँ क्या अपना शिर यही कहावत है जो कानों सुनते थे सो आंखों देखी कि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे.’’ कहानी -97 दिल्ली में किसी अफ़ीमी के छः लड़के थे. एक दिन तीन लड़कों को साथ ले हज़रत कुतुब के मेले को गया. वह भीड़ भड़क्का देख यह डर कर एक लड़के को कंधे पर चढ़ा दूसरे को गोद में ले, तीसरे का हाथ पकड़ अलग हो जो एक ओर खड़ा हुआ तो पीनक में आया. पहर एक पीछे मेले में कुछ हुल्लड़ जो हुआ तो वह पीनक से चौंक कांधे के लड़को को न देख बहुत घबराया. निदान यों कहता कहता कोतवाल के पास आया कि हाय हाय! मेरा लड़का खोय गया. कोतवाल ने पूछा,‘‘तुम्हारे कै लड़के हैं?’’ बोला,‘‘छः उनमें से एक खोया है.’’ कोतवाल ने सुनके ढंढोरिए को उसके साथ कर दिया. वह सारा दिन उसे सारे नगर में लिए फिरा. निदान रो झींक सांझ के समय जो घर में घुसा तो पौर की चौखट लड़के से शिर में लगी. वह रोया. तब यह बोला,‘‘ये अभागा अनहोनहार सारे नगर में ख़राब कर मुझे रूला कर जो तू अब रोया पहले ही क्यों न बोला, तो मैं इतना खराब न होता.’’ इस बात को सुन किसी उसे चिनहारी ने कहा,‘‘भाई जो कहावत है सुनते थे सो तुमने कर दिखाई कि बग़ल में लड़का और शहर में ढंढोरा.’’ | इससे जुड़ी ख़बरें सातों दिन भगवान के, क्या मंगल, क्या पीर...15 सितंबर, 2006 | पत्रिका पत्रकारिता की कालजयी परंपरा 15 सितंबर, 2006 | पत्रिका अब भी चमत्कृत करती है 'माँ'08 सितंबर, 2006 | पत्रिका एक कालजयी रचना के सौ साल08 सितंबर, 2006 | पत्रिका कायांतरण08 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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