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पथर कटवा
पथर कटवा दबे-कुचले लोगों की कहानी है
कथाकार का अपना एक अनुभव संस्कार होता है. वह अपनी आँखों से देखी और लोगों से सुनी-सुनाई के आधार पर इस अनुभव संस्कार का विस्तार करता रहता है.

इसमें अपने देखे-भोगे और दूसरों के देखे-समझे का अनुपात हर किसी के अनुभव संसार में अलग-अलग होता है.

लेकिन जैसा लक्ष्मण गायकवाड़ का अनुभव संसार है वैसा कम ही लोगों का होता है. इसका तक़रीबन पूरा का पूरा उनका अपना अनुभव है. उनकी रचनाएँ मार्मिक और भोगे हुए यथार्थ को ही प्रतिबिंबित करती हैं.

‘पथर कटवा’ लक्ष्मण गायकवाड़ का नया उपन्यास है. इसमें भी एक पिछड़े समाज की सच्चाई को उजागर किया गया है.

इस पखवाड़े इसी पुस्तक का एक अंश –

भाँडेकर के घर में आज चहल-पहल थी. सगाई की शाम थी. गली के पाँच-सात घरों से कुछ अच्छे-ख़ासे लोग, रस्म के समय हाज़िर रहने के लिए पहुँच गए थे. आने वाली गर्मियों में ‘पंढ़रपुर’ में विवाह होना तय हुआ. रिवाज के मुताबिक वागदत्ता वधू के लिए शंकर ने 51 रुपए का दहेज उसके पिता के हाथों में रख दिया. विवाह में वर को दो जोड़ी कपड़े, दोनों तरफ की शादी का खर्चा और माता-पिता, भाई और संबंधियों के लिए कपड़ा देना तय हुआ.

इस सगाई में उपस्थित लोगों में फिर चर्चा शुरू कि लड़का पढ़ा-लिखा है, अच्छी नौकरी में है और उसकी ज़िद है कि लड़की चोली पहन कर ही विवाह वेदी पर चढेगी. भाँडेकर ने भी इस बात को मान लिया है. यह तो बहुत बड़ी घटना है, भारी भयंकर बात है जो ये लोग रिवाज़ के विरुद्ध जा रहे हैं. यह देखकर अगर कल हमारी बेटियाँ भी चोली पहनने की ज़िद कर बैठीं तो हमारे रीति-रिवाजों का क्या होगा...ऐसी ही चर्चा चलती रही.

सोलापुर के वडार समाज के भाँडेकर को जाति मुखिया के रूप में माना जाता था. मुखिया होने के नाते उसके व्यवहार और उसके कहे का बड़ा महत्त्व था. भाँडेकर आए मेहमानों की बातें ध्यान से सुन रहा था, अतः उनकी बातों के जवाब में उसने कहना शुरू किया,‘‘आप सब लोग जरा ध्यान से सुनिए. आपने देखा है कि समाज बदल रहा है. उस बदलाव के साथ हमारे वडारी समाज को भी बदलना होगा-आगे बढ़ना होगा, नहीं तो हम पीछे रह जाएँगे. कितने दिन और हम राम और सीता के नाम पर अपनी बहू-बेटियों को गाय-बकरियों की तरह नंगे धड़ और स्तनों से घूमने पर मजबूर करेंगे? उनके इस प्रकार अर्धनग्न रहने से लोग उन्हें बुरी नज़रों से देखते हैं. क्या आपको अच्छा लगता है? मेरा यह विचार है कि विवाह के निमित्त अब हम मिलकर अपनी जवान बेटियों को चोली पहनने दें. मैं इस विचार का हूँ.’’

 तुकाराम के दिल से सुनीता अभी तक पूरी तरह गई नहीं थी, परंतु जब उसे पता लगा कि उसके बाप ने जबर्दस्ती उसकी शादी कहीं दूर ‘गीतरा’ नामक जगह कर दी थी तो अब उसे भूलने का प्रयास कर रहा था और आने वाली नई ज़िंदगी के विवाह के सुनहरे सपने संजोने लगा था

विवाह में लड़कियों के चोली पहनने का विचार युवा पीढ़ी के सभी उपस्थित लोगों को अच्छा लगा और वे सब भाँडेकर की बात से सहमत हो गए. पर जो बुजुर्ग थे या अज्ञानी युवा थे, वे भाँडेकर के नए विचारों से सहमत नहीं थे. कह रहे थे कि रीति को तोड़कर वे जाति से बाहर नहीं होना चाहते. कुछ युवाओं ने तो यहाँ तक कह दिया कि वे इस प्रकार की शादियाँ होने ही नहीं देंगे. वे लोग गुस्से से तनतनाते हुए बाहर चले गए.

भाँडेकर ने अपने संबंधियों-शंकर और तायप्पा को ढाढस बँधाते हुए कहा,‘‘आप घबराना मत. जिन लोगों को हमारी बात मंज़ूर होगी, वे ही लोग विवाह में उपस्थित होंगे.’’ हम उन्हीं को आमंत्रित करेंगे, जिन्हें चोली पहनना मान्य है. वे ही इस विवाह में आएँगे. पंढ़रपुर में विट्ठल के दरबार में सबकी नाक के सामने हम यह ब्याह रचाएँगे. कन्या चोली पहन कर ही वेदी पर चढ़ेगी. जो होता है, होने दो. आप भी अपने साथ उन्हीं लोगों को लाइए जो आपके विचारों से सहमत हों.’’

ये सारी बातें होने के बाद शंकर और तायप्पा भाँडेकर को प्रणाम कर अपने गाँव की और चल पड़े.

तुकाराम की माँ सीता शादी की तैयारी में लग गई. आस-पास की औरतें इकट्ठा होकर, मिलकर उसकी तैयारी में हाथ बँटाती. देखते-ही-देखते शादी की तारीख़ पास आ गई. शंकर और सीता के काम की रफ़्तार बढ़ गई. घर में दाल, चावल, गेहूँ, ज्वार, गुड़ की भेलियाँ आदि इकट्ठी होने लगीं, देने-लेने की वस्तुएँ खरीद ली गई. 15 दिन पहले ही भाँडेकर के घर से सबके लिए अच्छे कपड़ों का गट्ठा शंकर के घर पहुँच गया था. सबके लिए शादी के कपड़े जो सिलाने थे. अब अच्छा-खासा शादी का वातावरण दिखने लगा.

तुकाराम के दिल से सुनीता अभी तक पूरी तरह गई नहीं थी, परंतु जब उसे पता लगा कि उसके बाप ने जबर्दस्ती उसकी शादी कहीं दूर ‘गीतरा’ नामक जगह कर दी थी तो अब उसे भूलने का प्रयास कर रहा था और आने वाली नई ज़िंदगी के विवाह के सुनहरे सपने संजोने लगा था.

शादी के लिए दुल्हन चोली पहनकर खड़ी होगी, यह बात चारों ओर जंगली आग की तरह फैल गई. अपनी धर्म डूबेगा, इस आशंका से जगह-जगह के वडार नायक अपनी-अपनी ग्राम पंचायतें बुलाकर तुकाराम की शादी का विरोध करने पंढ़रपुर जाने की सोच रहे थे.

इस बात की भनक पड़ते ही भाँडेकर ने भी सोलापुर के युवाओं को संघटित करके कहा कि आज के बाद होने वाली सब शादियों में दुल्हन चोली पहनकर ही शादी करेंगी. यह इरादा सबने मिलकर पक्का कर दिया. अब वडार समाज दो गुटों में बँट गया. नया और पुराना- उन दोनों में साँप और नेवले का बैर और खेल शुरू हो गया. चार दिनों के बाद तुकाराम की शादी थी. गर्मी तो थी ही, परंतु वहाँ का वातावरण उससे भी अधिक गरम और तपा हुआ था. पुराना गुट दाँत पीसता हुआ कह रहा था हम देखते हैं यह शादी कैसे हीती है-लड़की को हम चोली पहनने नहीं देंगे. शादी रोकने के इरादे से धीरे-धीरे आस-पास के गाँवों से लोग इक्टठे होने लगे थे.

शादी के तीन दिन पहले तुकाराम को हल्दी का उबटन लगाया गया. मित्र परिवार के लिए बकरा काट कर प्रतिभोज का आयोजन किया गया, जिसे ‘फद्धल दवार’ नामक रिवाज कहते हैं. शादी के लिए आमंत्रित लोग धीरे-धीरे आ रहे थे. ऐसा लगता था मानो चींटियों की कतार घर की ओर चली आ रही हो.

शंकर के रिश्तेदार और आस-पास के लोगों ने तय कर लिया था कि इस विवाह का विरोध न करे वे उसमें शरीक होने, पंढरपुर जाएँगे. पढ़ा-लिखा लड़का अगर अपनी पत्नी को चोली पहनाना चाहता है तो उसमें कोई हर्ज नहीं, ऐसा सब कह रहे थे. अब सब बराती प्रस्थान के लिए तैयार थे. 10-15 वडार गाड़ियाँ ढोल-नगाड़े और शहनाई के स्वर और ताल पर धीरे-धीरे पंढरपुर की और बढ़ी चली जा रही थीं. गर्मियों के दिन थे, दोपहर का समय था. धरती में तपन इतनी थी जैसे गरम तवा हो, जिस पर मक्का भी फूटने लगे! ऐसी गर्मी को देखते हुए सबने गाड़ियाँ एक अरमाई के पास रोक दीं और उनमें जुते भैसों को खोलकर छाया में बाँध दिया और उन्हें दाना-पानी देने पास के तालाब पर ले गए.

शंकर की बीवी सीता रोटी और ‘पिठला’ बेसन से बनी हुई सब्ज़ी अपने मेहमानों के भोजन के लिए अपने साथ लाई थी-साथ में उसने सबको एक-एक प्याज पकड़ा दिया. धूप में चलकर थके हुए मेहमान ‘रोटी पिठले’ पर टूट पड़े. पास के कुँए से शंकर का छोटा भाई भीमा और बेटा कलसी में पानी ले आए-सबने प्यास बुझाने के लिए पानी पिया और तनिक सुस्ताने के बाद फिर सबने पंढरपुर का रास्ता पकड़ लिया.

इधर पंढरपुर में तुकाराम और उसके बरातियों के पहुँचने से पहले लड़की वाले पहुँच गए थे और वे बारातियों का इंतजार कर रहे थे. भाँडेकर समझ गया था कि शादी में कुछ गड़बड़ होने वाली है. उसने अपने साथ 100-150 तगड़े जवान ले लिए थे. क्या मालूम कब उनकी ज़रूरत पड़े. पंढरपुर रास्ते से थोड़ी दूर आगे आकर भाँडेकर अपने मित्र परिवार के साथ नेउली से आने वाले मेहमानों का इंतजार कर रहा था. दूर से ही नगाड़ों, ताशों(ढोलों) और शहनाई की आवाज़ें आने लगीं. आवाज़ सुनकर भाँडेकर और उनके सगे-संबंधियों और साथी जान गए कि बारात पास आ गई है. बरातियों को देखकर लड़की के बाप की जान में जान आई. रीति-रिवाज के अनुसार पान-सुपारी देकर बारातियों का स्वागत किया गया. एक दूसरे को प्रणाम करने के बाद सब एक-दूसरे के गले मिले. सब ओर लाल गुलाबी और सफेद रंग के जरो वाले पटके, पगड़ियाँ दिख रही थीं. बदन पर सफेद कमीज और धोती पहने हुए लंबे-चौड़े, मोटे-ताजे, फुर्तीले लोग दिख रहे थे. उन्हें देखकर पंढरपुर की ऊँची जाति के क्षत्रिय मराठा, वैश्य, ब्राह्मण लोग वडार लोगों की ‘वड़ी शादी’ देखने निकल आए थे और चर्चा कर रहे थे.

लड़की वाले एक घंटे पहले ही मंदिर के मंडल में शादी के लिए एकत्रित हो गए थे. विट्ठल, रखुभाई के मंदिर के सामने शादी का मंडप सजाया गया था. वहाँ भी लहगी-ढोल-ताशा और शहनाई की आवाज़ गूँज रही थी. सगे संबंधी रिवाज के हिसाब से एक-दूसरे को उपहार ले-दे रहे थे. सब संबंधियों के उपहार ग्रहण करने के बाद शादी के मंडप में वर और वधू दोनों ही अपने-अपने मामा के कंधे पर बैठकर आए. वर को नए कपड़े दिए गए. वर-वधू को मंडप में लाते समय शहनाई बजाने वाले उनके आगे-आगे चल रहे थे. बहुत ही सुंदर लग रहे थे वे दोनों. वडार समाज के ब्राह्मण ‘तलंगे’ हाथ में धोती का छोर पकड़े वधू को जल्दी लाने को कह रहे थे-शादी की घड़ी का-मुहुर्त समय पास आ रहा था. वडार समाज का शादी कराने वाला, उसी जाती कि पंच मरगू दंडगुले भी भरपूर दक्षिणा लेकर उपस्थित था. लड़की चोली पहन कर शादी की वेदी पर चढ़ेगी, इस बात पर वह राज़ी हो गया था. शादी जल्दी हो जाए, इस इरादे से वह ‘मंगलाष्टक’ आशीर्वाद तेलुगु में बोलने को राजी हो गया था.

40-50 औरतों के झुंड के बीच ‘वधू’ घोंडाबाई, कीमती सुंदर इरकल साड़ी, हरी चूड़ियाँ और हरी चकत्ते वाली सुंदर चोली पहनकर वेदी पर आई. उसने अपनी चोली पल्ले से इस प्रकार ढँक रखी थी कि पता न लगे कि उसने चोली पहनी हुई है. वर-वधू दोनों के सिर पर पलाश और नागिन के पत्तों से बने सेहरे बँधे हुए थे. वधू आकर खड़ी हुई थी उसका पल्ला सरक गया और कुछ लोगों की नज़र उसकी चोली पर पड़ गई.

पुराने विचारों का एक युवक ‘संत्राम येडाझुटे’-लड़की को चोली पहने देखकर चीख उठा-ये नहीं हो सकता और उसने एक पत्थर उठाकर मार दिया. शंकर का भाई भीमा जो वर-वधू के पास खड़ा था, वह पत्थर जोर से उसके सिर में जा लगा. चोट इतनी गहरी थी कि भीमा धड़ाम से ज़मीन पर गिर पडा. यह देख कर भाँडेकर चिल्लाया, संत्राम को पकड़ों और उसकी मरम्मत करो. अब वहाँ एक ही कोहराम मच गया-दोनों विरोधी गुट आपस में भिड़ गए। अब विवाह-विधि पर किसी का ध्यान न था, दोनों गुट गुस्से से भरे हुए थे. औरतें भी पीछे नहीं थीं. वे भी अपनी साड़ियों के पल्ले कमर में कसकर मारामारी करने में जुट गई. लाठियाँ निकल आईं और मार-पीट शुरू हो गई. बारात की औरतों और बच्चों के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें आने लगीं. विवाह मंडप से लोग इधर-उधर भागने लगे. औरतें एक-दूसरे के बाल पकड़ कर झगड़ने लगीं-वे कह रहीं थी, अभी तक हमारे समाज में किसी ने चोली पहनी नहीं थी, तुम लोगों ने यह काम करके जाति परंपरा को तोड़ी है, धर्म डुबोया है...बड़ी देर तक मार-पीट होती रही.

 पुराने विचारों का एक युवक ‘संत्राम येडाझुटे’-लड़की को चोली पहने देखकर चीख उठा-ये नहीं हो सकता और उसने एक पत्थर उठाकर मार दिया. शंकर का भाई भीमा जो वर-वधू के पास खड़ा था, वह पत्थर जोर से उसके सिर में जा लगा. चोट इतनी गहरी थी कि भीमा धड़ाम से ज़मीन पर गिर पडा

इस सारे कोलाहल-मारापीटी में भीमा खून से लथपथ पडा था. उसके प्राण कब निकल गए, किसी को पता तक नहीं चला. उधर भाँडेकर के लोगों ने संत्राम को लाठियों से इतना मारा कि उसने भी उसी जगह अपने प्राण त्याग दिए.

दोनों गुटों के दो लोगों के सिर्फ़ चोली पहनने, न पहनने के प्रश्न पर प्राण चले गए. इतना सब होने पर भी चोली पहने हुए ही शादी करने का निर्णय किया गया। शादी के मंडप में दो मुर्दे पड़े हुए थे-फिर भी भाँडेकर और शंकर ने तुकाराम और घोंडाबाई के सिरों पर ‘अक्षत’ डालकर और लड़की को चोली में ही विदा कर-वडार समाज की पुरानी रीति को बारूद से उड़ा दिया.

शादी के बाद दूल्हा-दुल्हन को विरोधियों से बचाने के लिए विट्ठल मंदिर के अंदर के कमरे में बंद करके शंकर बीवी सीता और भाँडेकर की बीवी यल्लमा, दोनों बाहरी दरवाज़े पर बैठ गईं-और रखवाली करने लगीं.

रात-दिन पत्थर तोड़ने वाले हाथ-आज अपने रीति रिवाज़ की खातिर एक-दूसरे का सिर फोड़ रहे थे. लाठी और पत्थरों की चोटों से रक्त सने सफेद धोती, कुरते चारों और दिख रहे थे.

 इस झगड़े में दोनों गुटों के चार-पाँच लोग घायल हो गए थे-खून से लथपथ, पानी-पानी कहकर कराह रहे थे. झगड़े का जोर कम नहीं हो रहा था. दोनों लोगों को मरा देखकर चोली न पहनने देने वाले लोग भागने लगे. चोली पहनाने वाले लोगों में से चार जख्मी लोगों की भी मौत हो गई

इस झगड़े में दोनों गुटों के चार-पाँच लोग घायल हो गए थे-खून से लथपथ, पानी-पानी कहकर कराह रहे थे. झगड़े का जोर कम नहीं हो रहा था. दोनों लोगों को मरा देखकर चोली न पहनने देने वाले लोग भागने लगे. चोली पहनाने वाले लोगों में से चार जख्मी लोगों की भी मौत हो गई. शंकर का भाई उनमें से एक था. भाँडेकर की रिश्तेदारी के दो लोग भी मारे गए थे.

चोली न पहनने देने वाले गुट का मरा हुआ आदमी था भीमरा वडार और उस गुट का मुखिया था ‘बोईल ईडीगुए’ उसने जल्दी से भीमरा वडार की मृत देह अपनी गाड़ी में डाल ली और विवाह मंडप से भाग खड़ा हुआ.

किसी जमाने में जैसे मुगल और मराठे आपस में भिड़ जाते थे, उसी तरह विवाह-मंडप में चोली वाले और बिना चोली वाले गुटों का घमासान मच गया था. वडार समाज की औरतें बड़बड़ा रही थीं कि यह ‘लगन’ नहीं है, बल्कि ‘विघन’ है-शादी नहीं यहाँ बर्बादी हो रही है. ऐसा घमासान शायद हमारे बाप-दादों ने भी न देखा होगा.

सब पर दुःख की छाया दिख रही थी-आखिर शंकर और भाँडेकर ने तुकाराम और घोंडाबाई कि विवाह संपन्न होने की घोषणा कर दी. शंकर ने ऐलान किया कि आने वाले समय में उसके गोत्र की सब बेटियाँ, लड़कियाँ चोली पहना करेंगी. संत्राम येडाकुटे और रामा चौगुले ‘चोली विरोधी’ गुट के मुखिया थे. भाँडेकर ने भी ऐलान किया कि वे भी विरोधी गुट के विवाह में हंगामा करेंगे.

शादी में शामिल सब मेहमान मृतकों को अंत्येष्टि के लिए श्मशान घाट ले गए और सब मुर्दो की एक ही चिता रच दी. चिता की अग्नि को साक्षी मानकर सब युवाओं ने प्रतिज्ञा ली कि अब वे सब नए जमाने के साथ चलकर अपनी माँ, बहनों, बेटियों को चोली पहनाना शुरू करेंगे. आइंदा अपने को वे ‘चोली पहनने वाले वडार’ कहेंगे. दिल पर भारी बोझ लेकर वे सभी श्मशान से वापस विवाह स्थल पर लौट आए. मृतकों का दुःख और अपने जख्मी लोगों को लेकर सब अतिथिगण अपने घरों को लौट गए.

(पृष्ठ 135 से 140)
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उपन्यास - पथर कटवा
लेखक - लक्ष्मण गायकवाड़
पृष्ठ-198, मूल्य – 250
वाणी प्रकाशन, दिल्ली

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