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उपन्यास अंश--'वर्दीवाला संत' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हुआ यों था कि उस रोज़ तुका को ख़बरी ने एक छोटे फ्लैट का पता दिया था. एक बांग्लादेशी परिवार उसमें रहता था-यानी अधेड़ मियां-बीवी, एक जवान बेटा और बहू. बेटे का ब्याह अभी साल भर पहले ही हुआ था.
जब रात में एक बजे तुका दो कांस्टेबलों को जीप में ही बैठे छोड उपर आया तो उसने क्या देखा? बहू को छोड़ परिवार के तीनों सदस्य फ्लैट के बाहर उकडूं बैठे थे. गुमसुम बैठे थे. उनकी आँखों में नींद थी, चेहरों पर विवशता, मजबूरी. फ्लैट के बंद दरवाज़े के बाहर कांस्टेबल मुंगले तैनात खड़ा था. ‘क्या बात है?’ तुका ने पूछा,‘अंदर कौन है?’ वह चौंका,‘अंदर क्या कर रहे हैं?’ तभी उसे ख़याल आया...इस आवास में दो जवान लड़कियाँ भी रहती थीं. एक बेटी, जो इस समय किसी लेड़ीज बियर-बार में साक़ी बनी होगी. दूसरी बहू थी. वह कहाँ? उसने अचानक दरवाज़े पर लात जमाई. सिटकनी टूट गई. दरवाज़े की दोनों पाटें खुल गई. तुका ने देखा तो लड़की बिस्तर पर निढाल-सी लेटी थी. उसकी सलवार फर्श पर पड़ी थी. कुर्ता उलट कर चेहरे पर छाया था. मानो अभी-अभी सुनामी का कहर उसे चूमकर यहाँ से गुज़र गया था. दरवाज़ा धड़ाम से खुलने का असर लड़की पर तनिक भी नहीं हुआ. वह जस की तस पड़ी रही. वह जानती थी, इससे बुरा और क्या हो सकता है? यह पुलिसिया हफ्ते में एक बार आ जाता था. उसके शौहर, सास-ससुर सबको बाहर खदेड़ सांड की तरह चढ़ता था. अब यह दूसरा भी चढ़ेगा. फिर तीसरा...क्या फ़र्क़ पड़ेगा? लड़की दूसरी तूफान के आने का इंतज़ार खामोशी से करती रही. पर चौहान दम भर के लिए चौंक गया. उसने बेल्ट बांधते हुए मुस्कराने की कोशिश की. फिर हंस कर कहा,‘‘यार, तेरे में एक यही तो कमी है. सभी बातें जी पर लेता है.’ तुका के गले में हाथ डाल बाहर निकलते हुए उसने सफाई देनी शुरू की ‘कभी-कभी जानकारी उगलवाने के लिए दहशत बैठानी पड़ती है.’ कांस्टेबल मुंगले दोनों के पीछे-पीछे सीड़ियाँ उतर रहा था. तुका को यकीन नहीं हुआ तो चौहान ने सबूत पेश किए. ‘क्या तूने अख़बारों में कभी नहीं पढ़ा कि कश्मीर में हमारे जवानों ने कितने रेप किए? उत्तर पूर्व में तो ऐसी दहशत बैठ गई थी कि आतंकवादियों के पाँव ही उखड़ने लगे थे. अगर मणिपुर के महिला संगठनों ने आसाम राइफल के किले पर नंगी औरतों का जुलूस ले जाकर हंगामा नहीं किया होता तो-’ ‘लेकिन ये...ये सब ग़ैरकानूनी है.’
तुका अभी भी सड़क पर खड़ा-खड़ा सोच रहा था. वह साधारण मनुष्य होता तो पुलिसियों की इन दलीलों से ज़रूर प्रभावित होता. न वह साधारण मनुष्य था, न साधारण पुलिसिया. वह जानता था, उसकी चारों ओर भ्रष्टाचार, व्यभिचार नंगा नाच रहे थे. मुठभेड़ की आड़ में अब पुलिसिए ख़ुद ही सुपारी लेने लगे थे. राहीदुल बौना कह रहा था कि दस हज़ार रिश्वत देने पर बांग्लादेशी नागरिक को अभय वचन के साथ रिहा किया जाता था. तू गिरफ्तार करता रहेगा. वह दस-दस हज़ार उगलवाकर रिहा करता रहेगा. तुका, तेरा बेरहमी से शोषण होता रहा और तू ‘एडे’ की तरह दिन-रात एक करता रहा. दोषी कौन? इस बार उत्तर में उसके भीतर विस्फोट हुआ और वह अपने ही बाल नोंचते हुए ऐसे चिल्लाया कि कुतिया की तरह दो बच्चों को सीने से चिपकाए लेटी हुई राहीदुलकी बीवी उठ बैठी. दोनों बच्चे छाती पर से फिसल कर रोने लगे. राहीदुल खुद चौंक गया कि आखिर इस वर्दी वाले को क्या हो गया था? क्यों अपनी बेल्ट उतार कर वह अपने ही जिस्म पर कोड़े की तरह वार किए जा रहा था.पागल की भांति चिल्लाए जा रहा था. |
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