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गुरुवार, 02 नवंबर, 2006 को 08:43 GMT तक के समाचार
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पृथ्वीराज, एक संवेदनशील और समाजसेवी व्यक्तित्व

पृथ्वीराज कपूर
हबीब बताते हैं कि पृथ्वीराज कपूर गांधीवादी विचारधारा में विश्वास रखते थे
जब मैं 1945 में अपनी थिएटर की ज़िंदगी शुरू करने के लिए मुंबई गया तो वह ज़माना पृथ्वीराज के पृथ्वी थिएटर्स का था.

उन्हीं दिनों ओपेरा हाउस में उन्होंने अपना काम शुरू किया था. उनके ड्रामे कला की दृष्टि से और अन्य पहलुओं से भी एकदम दुरुस्त हुआ करते थे. पठान मुझे बेहद पसंद था. हर लिहाज से. सेट, लाइटिंग, इतना सटीक और इतना बढ़िया अभिनय, मुझे वो सब नहीं भूलता.

उनके कई नाटकों में सामाजिक विषयों पर एक तरह की प्रतिबद्धता दिखाई देती है. समाज में हो रही घटनाओं पर वो तुरंत बहुत बेचैनी महसूस करते थे.

अगर देश में सांप्रदायिक दंगे हो रहे हैं तो तुरंत उसपर एक नाटक होना चाहिए. अगर बँटवारा हुआ तो तुरंत एक नाटक आना चाहिए. आहुति, दीवार जैसे नाटक ऐसी ही घटनाओं की प्रतिक्रिया थे.

यह भी ध्यान रखते थे कि यह आम आदमी की ज़बान में आना चाहिए. हिंदुस्तानी बोली में आना चाहिए.

वो एक गांधीवादी थे और इसलिए ऐसे तमाम विषयों पर वो इप्टा से सहमत थे और इसलिए उनका साथ और सहयोग हमें मिलता था.

पृथ्वीराज एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे. अपने इन्हीं कामों के लिए वो पहली बार राज्यसभा चुनकर गए. सरदार पटेल ने उनके नाटकों से मनोरंजन कर हटा दिया था.

इन्होंने कई बार संसदीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के तौर पर और सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख के तौर पर भारत का विदेशों में प्रतिनिधित्व किया. इनके बाद मैं राज्यसभा पहुँचा. बाद में विजयलक्ष्मी वगैरह भी पहुँचे.

वीआईपी क्लास और हवाई जहाज़ की सेवाएँ उपलब्ध होते हुए भी वो तीसरे दर्जे में ही चलते थे.

पृथ्वीराज का थिएटर प्रेम

ऐसा भी नहीं था कि करोड़पति थे. वो तो फ़िल्मों में कमाते थे और उसे थिएटर पर लुटाते थे. कई बार तो काफ़ी नुकसान भी उठाना पड़ा. इतनी ललक थिएटर की थी उनमें.

 आज के रंगकर्मियों से मैं यही कहता हूँ कि अगर तुम्हारे पास सृजनात्मकता है, कला है तो फिर एक बात पृथ्वीराज के काम से सीखनी चाहिए और वो है काम के प्रति लगन. उनके जैसी लगन कम ही लोगों में देखने को मिली. अगर उस ईमानदारी से कोई काम करे तो ज़रूर सफल होगा

थिएटर उनकी रग-रग में रचा-बसा था और इसी की वजह से उनकी फ़िल्में भी बहुत बेहतरीन होती थीं.

वो पारसी थिएटर का दौर था पर उन्होंने इसे छोड़कर एक प्राकृतिक रंगकर्म को शुरू किया. यह तो मैं नहीं कहूँगा कि इनका थिएटर यथार्थवादी था. हाँ, पारसी थिएटर से इनका काम भिन्न था.

हालांकि बाद में इन्हें बोलने में तकलीफ़ होने लगी. इनके घर पर पेशावरी और पंजाबी खाने पकते थे. इन सब का भी असर इनकी सेहत पर पड़ा. उनकी साँस फूलने लगी थी.

इसके बाद जैसे कुमार गंधर्व में एक फेफड़े के सहारे रुक-रुक कर गाने को अपनी गायकी का अंदाज़ बनाया, उसी तरह से पृथ्वीराज भी एक फेफड़े के सहारे रुक-रुक कर बोलने लगे.

उनके अपने बेटे, पृथ्वी के कई प्रमुख कलाकार अपनी-अपनी ट्रेनिंग के बाद उन्हें छोड़कर फ़िल्मों में या बाकी जगहों पर चले गए.

आज के दौर को देखता हूँ तो पाता हूँ कि उस तरह की साधना, उस तरह की रियाज़, उस किस्म की तलब कि कुछ करना है, लोग अब उसे अहमियत नहीं दे रहे हैं. आज की पीढ़ी इन चीजों को ख़ारिज करके आगे बढ़ रही है.

इसके बावजूद जो यथार्थ इप्टा के काम में या पृथ्वीराज जी के काम में जो गुणवत्ता देखने को मिलती है, उस दौर में जिस तरह के परिवर्तन तकनीक से लेकर रंगमंच में प्रयोगों के स्तर पर हो रहे थे, उन्हें जानना और समझना बहुत ज़रूरी है.

यह तो पता लगाना मुश्किल है कि पृथ्वीराज के काम को आज कितने लोग समझते हुए काम कर रहे हैं पर सबसे बड़ी बात यह है कि आधुनिक रूप में ही सही पर पृथ्वी थिएटर फिर से चल रहा है.

आज का 'पृथ्वी'

आज देशभर में थिएटर के लिए सबसे उपयुक्त जगह है पृथ्वी थिएटर.

हबीब तनवीर
हबीब मानते हैं कि समाज में हो रही घटनाओं ने पृथ्वीराज कपूर को प्रभावित किया और उनके काम में इसका असर दिखाई देता है

हालांकि कुछ ग़लतियाँ भी हैं. मसलन, ओपेरा हाउस की बिल्डिंग आज टूट चुकी है. वो ऐतिहासिक भवन था पर उसे बचाने की कोशिश नहीं की गई.

यह कमी भी मैं मानता हूँ कि रेपेट्री ग़ायब करना ठीक बात नहीं है. पर उसकी अपनी समस्याएँ हैं और इन्हें उससे बचना पड़ा क्योंकि ये उसकी ज़िम्मेदारी क़बूल नहीं कर सके.

संजना को बाद में लगा कि थिएटर की लगन तो उनमें बहुत है पर उनका योगदान यह हो सकता है कि वो थिएटर को प्रोत्साहित करें.

मैं संजना के काम को एक कुशल प्रबंधक के तौर पर देखता हूँ, उनकी ख़ासियत है कि वो एक कुशल जनसंपर्क अधिकारी और एक बेहतरीन व्यक्तित्व जो थिएटर के लिए पैसे जुटा रही हैं और इसके लिए वो प्रशंसा की पात्र हैं.

यहाँ कई नए लोगों को भी अपना काम दिखाने का मौका मिल रहा है पर एक हस्ताक्षर, एक दस्तख़त जैसी बात देखने को नहीं मिलती क्योंकि ये दूसरों को मौका दे रहे हैं पर ख़ुद रेपेट्री नहीं चला रहे हैं.

मैं समझता हूँ कि जिस भी व्यक्ति ने एक थीम के साथ जमकर काम किया है, अगर उसमें सृजनात्मकता है तो उसने अपने काम के माध्यम से अपना दस्तख़त पैदा किया है, एक छाप छोड़ी है.

आज के रंगकर्मियों से मैं यही कहता हूँ कि अगर तुम्हारे पास सृजनात्मकता है, कला है तो फिर एक बात पृथ्वीराज के काम से सीखनी चाहिए और वो है काम के प्रति लगन. उनके जैसी लगन कम ही लोगों में देखने को मिली. अगर उस ईमानदारी से कोई काम करे तो ज़रूर सफल होगा.

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