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'पापाजी जैसा कोई दूसरा नहीं मिला' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पापाजी (पृथ्वीराज कपूर) तो मेरी रग-रग में बसे हुए हैं. जब भी मैं किसी काम में या मुश्किल में होती हूँ तो यही सोचती हूँ कि पापाजी इसे कैसे करते. मैं पहले डांसर थी. जाने-माने नृत्य गुरू उदरशंकर मेरे उस्ताद थे. 10 वर्षों तक मैं नृत्य से ही जुड़ी रही मगर उसके बाद मैं 1945 में मुंबई आ गई. यहाँ आकर पृथ्वीराज कपूर साहब का नाटक शकुंतला देखा. वजह यह थी कि मेरी बहन अज़रा बट्ट पापाजी के साथ काम करती थीं और इस नाटक में मुख्य भूमिका में थीं. इसके बाद इन्होंने दीवार खेला और वो मुझे बेहद पसंद आया. थी तो मैं डांसर पर अभिनय मेरा पहला प्यार था. मैंने पापाजी से कहा कि वो मुझे अपने साथ काम करने का मौका दें. दीवार नाटक में एक अंग्रेज़ औरत के किरदार से मैंने उनके साथ काम करना शुरू किया था. मैंने अपने जीवन में मंच पर आना, कपड़े पहनना, जेवरात संभालना, समय से पहले थिएटर आना और अपने क्षेत्र के व्यावसायिक पहलुओं को उदयशंकर जी से सीखा था पर मेरे पास आवाज़ नहीं थी. पापाजी ने मुझे आवाज़ का इस्तेमाल सिखाया. और बाकी भी मैं तो यह कहती हूँ कि ज़िंदगी में मैंने जो कुछ भी पाया है वो पापाजी के क़दमों में बैठकर पाया है. कहते हैं कि देवता पुरुष तो कोई होता नहीं है पर अगर कोई था तो वो था. वो राज्यसभा सदस्य थे. उन्हें रेल में फ़्रर्स्ट क्लास में चलने का पास मिलता था पर वो भी तीसरे दर्जे में बाकी टीम के साथ सफ़र करते थे. वही खाना वो भी खाते थे जो बाकी लोग खाते थे. रहना-सोना, सब लोगों के साथ. ऐसा लगता था कि यह थिएटर की टीम नहीं, एक परिवार है और पृथ्वीराज उसके मुखिया. उनके साथ काम करने वाले सब लोगों को लगता था कि हम उनके लिए ख़ास हैं. मैं यूरोप के सभी देशों में अपना शो कर चुकी हूँ. दुनिया के लगभग हर कोने को देख चुकी हूँ पर पापाजी जैसा व्यक्तित्व और उनके जैसा कलाकार मुझे आज तक नज़र नहीं आया. फ़िल्म और थिएटर अगर कोई मुझसे सच-सच पूछे तो मुझे पापाजी फ़िल्मों में इतने पसंद नहीं थे जिसने की थिएटर में. मुझे उनकी फ़िल्मों में एक्टिंग ज़रा दूसरे किस्म की लगती थी.
स्टेज पर तो उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता था. उनकी उंगली दर्शकों की रगों पर रखी होती थी. कई तरह की ज़बान उन्हें मालूम थी. इसमें कोई शक नहीं कि कपूर परिवार ने काफ़ी नाम कमाया है. पृथ्वीराज जी ही नहीं, उनके तीनों बेटों, राज, शम्मी और शशि ने भी बेहतरीन काम किया है. फिर राज कपूर के तो क्या कहने. आरके फ़िल्म्स के बैनर तले क्या बढ़िया फ़िल्में बनाई उन्होंने. आवारा का तो काफ़ी नाम हुआ. शम्मी निहायत हसीन लड़का था और शशि लंबे समय तक काम करते रहे. उन्होंने अच्छी फ़िल्में कीं. अब राजकपूर तो रहे नहीं और इन दोनों बेटों ने काम छोड़ दिया. यह बहुत अफ़सोस की बात है. नई पीढ़ी में संजना तो कमाल का काम कर रही है. पिछले वर्ष मैंने भी पृथ्वी में एक नाटक खेला, एक थी नानी. तब मुझे इस बात का अंदाज़ा हुआ कि कितनी मेहनत से संजना और कुणाल उस थिएटर को चला रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें पृथ्वीराज, एक संवेदनशील और समाजसेवी व्यक्तित्व02 नवंबर, 2006 | पत्रिका उज़रा बट्ट, अभिनय और पृथ्वी थिएटर02 नवंबर, 2006 | पत्रिका एक बहुत ही संवेदनशील इंसान 02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'भाग्यशाली हूँ कि कपूर ख़ानदान में पैदा हुआ'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'अभी बहुत कुछ जानना-बताना बाक़ी है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'आलमआरा' से 'ओंकारा' तक का सफ़र02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'इस ख़ून में ही कुछ ख़ास बात है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'यादें, जो कभी धुंधली नहीं पड़ सकतीं'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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