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बुधवार, 01 नवंबर, 2006 को 15:19 GMT तक के समाचार
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'अभी बहुत कुछ जानना-बताना बाक़ी है'

संजना कपूर
वर्ष 1978 में शशिकपूर और जेनिफ़र की कोशिशों से पृथ्वी थिएटर दोबारा अस्तित्व में आया
मेरे लिए यह अफ़सोस की बात है कि जब मैं पाँच साल की थी, तभी दादाजी (पृथ्वीराज कपूर) मुझे छोड़कर चले गए. मैं इसके लिए बहुत दुखी हूँ.

मेरे बचपन में पृथ्वी थिएटर की कहानियाँ और नाना जी की थिएटर कंपनी 'शेक्सपीयर वालाज़' की कहानियाँ ही मेरे लिए परी कथाओं के जैसे थे. हम इनकी कहानियाँ सुनकर ही बड़े हुए हैं.

कभी-कभी पापा (शशिकपूर) मुझसे अक्सर बहस करते रहते हैं कि इतना परेशान क्यों हो रही हो, आज की पीढ़ी के लोगों को पृथ्वीराज कपूर में इतनी रुचि नहीं है पर मैं समझती हूँ कि मुझे मेरे लिए यह काम करना है.

यह काम उन गिनती के पागल लोगों के लिए है जो मेरी तरह पृथ्वीराज कपूर के बारे में, उनके काम के बारे में जानना चाहते हैं.

मैं यह ख़ुद जानना चाहती थी कि वो कैसे थिएटर को जीते थे, कैसे तैयारी करते थे, प्रस्तुतिकरण किस तरह के होते थे, हमारे पास कुछ चित्र तो हैं पर कुछ और पहलुओं को सामने लाना होगा.

मेरे मन में एक जिज्ञासा यह भी है कि तत्कालीन रंगमंच संसार उनके बारे में क्या धारणा रखता था, क्या सोचता था. यह जानना ज़रूरी है कि उस दौर के लोग उनके काम के बारे में क्या सोचते थे और उनके काम को देखकर क्या प्रतिक्रियाएँ देते थे.

वो दो बार राज्यसभा सदस्य रहे और बेहिसाब यूनियनों, कमेटियों से जुड़े रहे.

दौर पर दस्तक

कुछ लोगों का कहना है कि आज कलाकारों को यात्रा भत्ते में जो छूट मिल रही है, उसे शुरू करवाने का श्रेय भी पृथ्वीराज कपूर साहब को जाता है. हम इसकी और इस तरह के और तथ्यों की पुष्टि, सबूत ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं.

 16 वर्षों के बाद ही उन्होंने पृथ्वी थिएटर्स को बंद कर दिया. मुझे लगता है कि ऐसा करना सबसे मुश्किल रहा होगा. पृथ्वी को बंद करना किसी ऐसी चीज़ को बंद करना था जो आपको अपार आनंद और संतुष्टी देता है

केवल 16 वर्षों तक चले पृथ्वी थिएटर में उस वक्त के सभी चोटी के कलाकारों ने काम किया. यह उनके व्यवहार और परख के कारण ही संभव था. आज के दौर में ऐसा किसी कला जगत की शख्सियत में देखने को नहीं मिलता.

असल में उस दौर में सिनेमा जगत में काफ़ी तेज़ी से परिवर्तन भी हो रहे थे. राजनीतिक रूप से, तकनीक के स्तर पर, प्रयोगों के स्तर पर, सिनेमा की समझ को लेकर कई तरह के बदलाव आ रहे थे जिन्हें जानना काफ़ी उपयोगी हो सकता है.

उन्हें इस बात का भी अंदाज़ा था कि कब रुकना है.

16 वर्षों के बाद ही उन्होंने पृथ्वी थिएटर्स को बंद कर दिया. मुझे लगता है कि ऐसा करना सबसे मुश्किल रहा होगा. पृथ्वी को बंद करना किसी ऐसी चीज़ को बंद करना था जो आपको अपार आनंद और संतुष्टी देता है. और वह भी सही समय पर बंद करना, इससे पहले की आपदा की स्थिति पैदा हो जाए.

पृथ्वी-तब और अब

आज पृथ्वी थिएटर उस रूप में नहीं है जैसा की उनके समय में था.

अब हम लोगों को एक जगह देते हैं ताकि थिएटर करने और देखने वाले यहाँ आएं और इस बहाने थिएटर क़ायम रहे. हमारा थिएटर नहीं, रंगमंच क़ायम रहे. लोग नाटक देखने आते रहें.

पृथ्वी थिएटर का पोस्टर
इस वर्ष तीन नवंबर से 19 नवंबर तक होने वाले पृथ्वी थिएटर फ़ैस्टिवल में मुख्य ध्यान पृथ्वीराज कपूर के काम पर होगा

उस दौर और आज के वक्त में काफ़ी फ़र्क है. हम आज के बाज़ार की चुनौतियों को किनारे रखकर काम नहीं कर सकते हैं. इससे लड़ना होगा और इसके मुताबिक अपने आप को बदलना भी होगा.

लोगों को थिएटर तक लाना, इसके लिए प्रचार करना, विज्ञापन करना भी एक चुनौती है. आज के समय में एक-दो अख़बारों में विज्ञापन देकर आप इतने बड़े महानगर में अपने नाटक के लिए 200 लोग भी मुश्किल से जुटा पाएँगे.

हालांकि उस वक्त भी ऐसा था. मेरे पिताजी को ख़ुद रिक्शे पर भोंपू लेकर प्रचार करना पड़ता था. सिनेमाघरों पर जाकर वो पर्चे बाँटते थे. तब लोग इकट्ठा होते थे.

हम ऐसे तरीकों को भी इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके अलावा आज के समय में, आज के साधनों के मुताबिक ज़्यादा से ज़्यादा तरीके खोजने होंगे, अपनाने होंगे ताकि लोग थिएटर तक पहुँचें.

मुझे लगता है कि हमारे जीन में ही कुछ पागलपन, जुनून या कुछ ख़ास बात है. वो पीढ़ी दर पीढ़ी दिखाई देता रहा है. ज़रूरत इस बात की है कि उसके प्रति हम ईमानदार रहें और काम करते रहें.

अभी तो बहुत कुछ करना बाक़ी है. साल में 400 शो होते हैं पर मुझे नहीं लगता कि इनमें से 200 प्रस्तुतियों को भी सार्थक कहा जा सकता है. वजह यह है कि हम बिल्कुल अकेले हैं.

ऐसा नहीं है आज थिएटर देखने वालों की कमी है. ज़रूरत है उनको थिएटर तक लाने की कोशिश करने की और रचनात्मक तरीकों से कोशिश करते हुए उन्हें थिएटर तक लाना होगा.

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