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सोमवार, 26 मार्च, 2007 को 11:58 GMT तक के समाचार
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रुलाना आसान है, हँसाना मुश्किल'

अक्षय के दोस्त की सच्ची कहानी पर बनी है फ़िल्म
हाल ही में फ़िल्म ‘नमस्ते लंदन’ रिलीज़ हुई और भारत में कुछ ख़ास व्यवसाय नहीं कर पाई. फ़िल्म वक़्त के निर्देशक विपुल शाह की इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका में अक्षय कुमार और कैटरीना कैफ हैं.

फ़िल्म 'नमस्ते लंदन' अक्षय के एक दोस्त की सच्ची कहानी है. जब अक्षय कुमार ने ये बात विपुल शाह को बताई तो उन्हें लगा कि क्यों न इसी विषय पर एक फ़िल्म बनाई जाए.

अक्षय बताते हैं, “कुछ ही दिनों बाद विपुल ने मुझे एक स्क्रिप्ट दिखाई और मैं हैरान रह गया कि अरे ये तो मेरे दोस्त की कहानी है. मुझे स्क्रिप्ट बहुत अच्छी लगी और मैंने इस फ़िल्म के लिए हाँ कर दी थी. फ़िल्म चलना न चलना यह हमारे हाथ में नहीं होता बल्कि उमसें एक साथ कई चीज़ें शामिल होती हैं”.

इस फ़िल्म का किरदार अक्षय कुमार के जीवन के बहुत करीब है, “मैं खुद एक छोटे शहर से आया हूँ और मैंने भी ज़िंदगी में बहुत जगहों के साथ बहुत सारी संस्कृतियां भी देखी हैं लेकिन मुझे भारतीय संस्कृति सबसे ज़्यादा पसंद है.”

अक्षय मानते हैं कि आप कहीं के भी रहने वाले हों किसी से भी जुड़े हों लेकिन अपने आपको कभी नहीं भूलना चाहिए. “मैं आज भी पैर छूकर अपने माँ-बाप का आशीर्वाद लेना नहीं भूलता फिर चाहे मैं लंदन में रहूँ या फिर कहीं और...”

इमेज

कई सालों तक ऐक्शन हीरो की इमेज में क़ैद रहने के बाद कॉमेडी और फिर रोमांटिक. लेकिन अक्षय कहते हैं, “आज करीब पाँच साल बाद मैं अपने आप को हर किरदार में दर्शकों के सामने रख सकता हूँ. मैं पहले भी इस इमेज के चक्कर में फंस चुका हूँ. बड़ी मुश्किल से अपने आपको वहाँ से निकाल पाया हूँ”.

अक्षय कुमार
अक्षय कहते हैं कि उन्होंने इमेज की जंजीर को मुश्किल से तोड़ा है

अक्षय को अभिनय के अलावा और किसी चीज़ में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है. इस क्षेत्र में अपने काम को लेकर तरह-तरह के एक्सपेरिमेंट करने भी इन्हें पसंद नहीं हैं. “मैं सिर्फ एक अभिनेता ही रहना चाहता हूँ और निर्देशन या निर्माता बनकर नया एक्सपेरिमेंट करने का मेरा कोई इरादा नहीं है.”

कॉमेडी को मुश्किल काम बताते हुए वे कहते हैं, "आँखों में ग्लिसरिन डालकर कुछ भावनातमक डायलॉग बोलकर दर्शकों को रूलाना तो बहुत आसान है लेकिन एक साथ बैठे पाँच हजार दर्शकों को एक ही जगह पर हँसाना बड़ा मुश्किल होता है."

अक्षय मानते हैं कि अभिनेताओं की ज़िंदगी उतार-चढ़ाव से भरी होती है और कभी-कभी उसके खुद के फैसले गलत भी साबित हो जाते हैं.

वे एक दिलचस्प उदाहरण देते हैं, “जैसे किसी बच्चे को एक खिलौने की दुकान में बिठा दो और उसे कहिए कि तेरे पास पाँच मिनट है और जितना खिलौना उठा सकता है उठा ले. इसी तरह एक अभिनेता भी अपने कैरियर में वह सब कुछ करना चाहता है फिर चाहे वह कर पाए या नहीं. उसे कभी पूरी संतुष्टि नहीं मिलती है. उसके अंदर हमेशा नए नए किरदार करने की चाहत होती है”.

वे कहते हैं, “मैं हर तरह के किरदार करना चाहता हूँ और किए भी हैं. मेरे ख़याल से हर फ़िल्म में कॉमेडी होनी चाहिए और दर्शकों का मनोरंजन करना हमारा फर्ज होता हैं. मैं लोगों को मनोरंजन देने आया हूँ न कि उन्हें सुलाने या रूलाने आया हूँ”.

बदलाव

हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर बदलाव देखा गया है और आगे भी होता रहेगा. हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री बहुत अच्छे तरीके से बदल रही है और ये बदलाव होने भी चाहिए. दर्शकों को नई नई चीज़ें देखने की आदत होती है. चार साल पहले और आज में बहुत बदलाव हुआ है.

फ़िल्म इंडस्ट्री में ख़ान अभिनेताओं की तूती बोलती है लेकिन इक्का दुक्का लोगों को छोड़कर कोई अभिनेता इनसे टक्कर नहीं ले पाता है.

तो क्या अक्षय को भी कभी इस तरह का डर लगता है ? इसके जवाब में मुस्कुराते हुए अक्षय ने कहा, “खान अभी आए हैं लेकिन कुमार बहुत पहले से आए हैं फिर चाहे वह किशोर कुमार हो, अशोक कुमार हो. हम हमेशा से इंडस्ट्री में है”.

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