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मैं अब अपना इंटरव्यू नहीं पढ़ती हूँ: नंदिता | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़ायर, 1947-अर्थ, हरी-भरी, वॉटर आदि जैसी तक़रीबन 28 फ़िल्मों में अपने अभिनय की कुशलता का प्रमाण दे चुकी और ‘गर्ल नेक्स्ट डोर’ की छवि लिए नंदिता दास हमेशा दूसरों के बारे में सोचे बगैर और कुछ हटकर फ़िल्में करने में यकीन रखती हैं. विवादों से घिरी फ़िल्म ‘फ़ायर’ के ज़रिए जब इन्होंने बॉलीवुड में क़दम रखा तो उन्हें यक़ीन था कि इस फ़िल्म के बाद दर्शक इन्हें किसी और फ़िल्म में नहीं देख पाएँगे. नए प्रयोगों से लेकर नई भाषाओं को सीखने की इनकी ललक की वजह से ही इन्होंने कई अन्य भाषाओं की फ़िल्में भी की है. इनमें बांग्ला, उड़िया, तेलुगु, हिंदी और मराठी फ़िल्में शामिल है. उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश: फ़िल्म ‘माती माय’ मराठी फ़िल्म है, इसके बारे में कुछ बताइए ? इस फ़िल्म की कहानी बहुत ही भावनात्मक और दिल को छूने वाली है. सारे किरदार बहुत ही अच्छे हैं और हम सबने बहुत मेहनत भी की है. आमतौर पर महिलाओं को इस तरह का किरदार नहीं मिलता है लेकिन मैं बहुत ही भाग्यशाली हूँ कि चित्राजी ने इस फ़िल्म के लिए मुझे चुना. आपकी ज़्यादातर फ़िल्में दूसरी भाषाओं में हैं. हिन्दी फ़िल्में बहुत कम करती हैं इसकी क्या वजह है? ऐसा नहीं है कि मैं हिन्दी फ़िल्में नहीं करती हूँ लेकिन हमारी सोच ऐसी है कि हम सिर्फ हिन्दी फ़िल्मों को ही भारतीय फ़िल्मों का नाम देते हैं. असल में ऐसा नहीं होना चाहिए, मराठी, उर्दू, तमिल, तेलुगू आदि भाषा की फ़िल्मों को भी यह दर्जा मिलना चाहिए. मैं और ज़्यादा हिन्दी फ़िल्में करना चाहूँगी. आपने कई भाषा की फ़िल्में की है. इन्हें सीखने में कभी कोई परेशानी नहीं आई? मुश्किल तो होती है लेकिन सौभाग्य से अभी तक मुझे साथी कलाकार ऐसे मिले हैं कि मेरा काम ज़्यादा आसान हो जाता है. मुझे लगता है कि मैं उनकी वजह से अपने आपको ज़्यादा निखार पाती हूँ. मेरे लिए यह एक चुनौती की तरह होता है जिसे स्वीकार करने में मुझे मज़ा आता है. आप कमर्शियल फ़िल्मों के बजाए आर्ट फ़िल्मों में ज़्यादा नज़र आती है. कमर्शियल फ़िल्में आप करना नहीं चाहती या फिर ऐसे ऑफ़र्स कम आते हैं? आर्ट और कमर्शियल की ये बहुत पुरानी बहस है. कुछ देर के लिए हमें इस लेबल के दायरे से ऊपर आकर फ़िल्म देखनी चाहिए, उसकी कहानी और संदेश को समझना चाहिए. मुझे जिस तरह के किरदार करने पसंद हैं. मैं उसके लिए ही हाँ करती हूँ और फिर भाषा या उसकी और कोई बात मेरे लिए बंधन नहीं होती है. आपके नाम के साथ ‘आर्ट अभिनेत्री’ का टैग लग गया है इसे किस तरह लेती हैं?
देखिए, पहले तो मैं इस टैग या लेबल को नहीं मानती हूँ. मुझे याद है जब मैं फ़िल्म पिता कर रही थी तो कई लोगों ने मुझसे पूछा था कि चूंकि इस फ़िल्म में संजय दत्त हैं तो क्या आप कमर्शियल फ़िल्म कर रही हैं और संजय से लोग पूछते कि इस फ़िल्म में आपके साथ नंदिता है तो क्या यह आर्ट फ़िल्म होगी? यही हाल फ़िल्म अक्स का भी हुआ था. मेरे ख़याल से हम जितनी बातचीत करते हैं जितना एक दूसरे से मिलते-जुलते है उसपर भी काफ़ी चीज़ें निर्भर करती हैं. मुझे इस बात से कोई परेशानी नहीं होती है. पिछले पाँच साल से तो मैंने अपने ख़ुद के इंटरव्यू पढ़ने ही छोड़ दिए हैं. मुंबई में पूरा बॉलीवुड बसता है फिर आपके दिल्ली में रहने का क्या कारण है ? दिल्ली में मेरा पूरा परिवार रहता है इसके अलावा मेरे ज़्यादातर दोस्त भी वहीं पर हैं. मुझे कभी भी मेनस्ट्रीम अभिनेत्री नहीं बनना था इसलिए मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं दिल्ली में हूं या फिर मुंबई. लेकिन हाँ ढूँढ़ने वाले मुझे ढूँढ़ ही लेते हैं. थिएटर और फ़िल्मों में क्या अंतर पाती है? मेरे ख़याल से थिएटर में अच्छा बुरा तुरंत दिख जाता है और फ़िल्मों में रीटेक के ज़रिए उसे सुधार सकते हैं. थिएटर में आप कुछ लोगों तक ही पहुँच सकते है जबकि फ़िल्म के ज़रिए आप एक ही साथ करोड़ों लोगों तक पहुँचने में कामयाब हो जाते हैं. आपने अपने कैरियर की शुरूआत ही विवादास्पद फ़िल्म फ़ायर से की, आपको ऐसे विवादित विषय पर फिल्म करने में कोई डर महसूस नहीं हुआ? सच बताऊँ तो जब मैंने फायर की थी तो मैंने ऐसा कुछ नहीं सोचा था. मैंने एक ऐसी फ़िल्म में काम करने के लिए हामी भरी थी जिस पर आम लोग चर्चा करना भी गलत मानते थे. लेकिन इस फ़िल्म के बाद मैंने सोचा था कि शायद ही मैं कभी और फ़िल्मों में नज़र आऊँगी. आपने बहुत ही बोल्ड विषयों पर काम किया है तो क्या आप मानती है कि समाज में इस दबे सच को उभारने में आपकी भूमिका होगी या रही है? सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहूँगी कि हर किसी का संदेश देने का अपना तरीका होता है. जो चीज़ें हमारे समाज में घटित हो रही है उन्हें लोगों को जानना भी ज़रूरी है. संदेश भी कोई ग़लत चीज़ नहीं है, बस ज़रूरत है तो आपको उसे सीधे तरीके से अपनाने की और उसपर अमल करने की. हर तरह की फ़िल्में हमारे बीच हैं और होनी भी चाहिए और अगर लोग मानते हैं कि समाज को कुछ बताने का या कोई रास्ता दिखाने में मेरा कोई हाथ है तो इसके लिए मैं उनकी आभारी हूँ. आप गहराई भरे किरदारों की तैयारी कैसे करती हैं ? मैंने शायद ही कोई ऐसा किरदार किया है जिसके लिए मुझे बहुत ज़्यादा तैयारी करनी पड़ी हो. जब आपको कोई सच्चा किरदार करना होता है तो उसमें आपको उसके हावभाव से लेकर हर चीज़ की नक़ल करनी पड़ती है और जिसके लिए आपको उसके बारे में पढ़ना भी पड़ता है. लेकिन अगर कोई किरदार भावनात्मक और गहराइयों से परिपूर्ण है तो मेरे ख़याल से इंसान के जीवन में पहले ही इतनी भावनाएँ होती है कि उसे किरदारों के लिए और मेहनत नहीं करनी पड़ती है. धीरे-धीरे कमर्शियल और समानांतर फ़िल्मों का भेद मिटता जा रहा है, इसपर आप क्या कहेंगी? यह बात तो सही है. लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ अच्छी फ़िल्में ही चलती है. आजकल ज़्यादातर फ़िल्मों का भविष्य उसके मार्केटिंग और पैकेजिंग पर निर्भर करता है. आपके पास एडवर्टाइज़िंग के लिए कितना पैसा है इस बात पर भी आपकी नज़र होनी चाहिए. क्या आप हमेशा से कमर्शियल फ़िल्मों से न जुड़कर सामाजिक मुद्दों वाली फ़िल्मों पर ही काम करना चाहती थी? मुझे ये सारी कैटगरीज़ समझ में नहीं आती है. मैं वही फ़िल्में करना चाहती हूँ जिससे मैं खुद को जोड़ सकूँ. जहाँ तक मेरी फ़िल्म के विषयों की बात है तो मैं मानती हूं कि हर इंसान के अंदर कई चीज़ें छुपी होती है. मैं मनोरंजक विषयों पर भी काम करना चाहूँगी बशर्ते वह माइंडलेस फ़न न हो. जाने भी दो यारो, चश्मेबद्दूर जैसा सेंसिबल मनोरंजन भी हो सकता है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'दर्शक अच्छी फ़िल्में देखना चाहते हैं'10 मई, 2005 | पत्रिका कान समारोह की ज्यूरी में नंदिता भी26 अप्रैल, 2005 | पत्रिका भारत में शूटिंग में होती हैं ख़ासी मुश्किलें15 नवंबर, 2006 | पत्रिका अमरीका में 'बॉलीवुड म्यूज़िक अवार्ड्स' संपन्न10 नवंबर, 2006 | पत्रिका धूम मचा रही हैं भोजपुरी फिल्में30 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका बिग बी को एक और उपाधि04 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'डॉक्टर अंबेडकर- एक अनकहा सच'25 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका दो फ़िल्में तय करेंगी ऐश्वर्या का भविष्य18 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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