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भारत में शूटिंग में होती हैं ख़ासी मुश्किलें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हाल ही में प्रदर्शित फ़िल्म 'डॉन' की शूटिंग मलेशिया मे की गई. ठीक उसी तरह राकेश रोशन की फ़िल्म 'कृष' की ज़्यादातर शूटिंग सिंगापुर में की गई. इनकी एक वजह है भारत में फ़िल्म की शूटिंग करने में होने वाली दिक्कतें. भारतीय फ़िल्म उद्योग के निर्माता-निर्देशकों को विदेशों में शूटिंग करने में उतनी जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती जितनी कि हमारे अपने देश में. पहले स्विट्ज़रलैंड और उसके बाद न्यूज़ीलैंड, हांगकांग, मलेशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में आजकल बॉलीवुड फ़िल्मों की शूटिंग हो रही है. यहाँ तक कि भोजपुरी फ़िल्मों की शूटिंग भी इंग्लैंड में की जा रही है. देश में आउटडोर लोकेशन पर शूटिंग करने से निर्माता-निर्देशक कतराते हैं. निर्देशक थोड़ा ज़्यादा पैसा लगाकर स्टूडियो में ही सेट लगा लेते हैं और अगर बहुत ज़रुरी हो तो ही राकेश मेहरा और अकबर ख़ान जैसे निर्देशक वास्तविक लोकेशन के लिए जद्दोजहद करते दिखते हैं. ऐतिहासिक जगहों पर शूटिंग करने में कई जगहों से अनुमति लेनी पड़ती है और फिर यह ज़रुरी भी नहीं कि अनुमति सही समय पर मिल जाए और निर्देशक अपने तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार शूटिंग कर ही लें. जाने-माने निर्देशक जब्बार पटेल इस बारे में कहते हैं, "थोड़ी सी मुश्किल तो है लेकिन अगर आपका कागज़ी काम ठीक हो तो ज़्यादा दिक्कत नहीं होती. जो संस्था इन जगहों की देखभाल करती है, उनका ध्यान इस बात पर ज़्यादा रहता है कि उस जगह को किसी भी तरह का नुकसान न होने पाए और वे फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक से भी इस बात की अपेक्षा रखते हैं." बहुत कठिन है... डॉक्टर पटेल की बात अगर सही मान भी ली जाए तो भी निर्माताओं की मुश्किल तब और बढ़ जाती है जब इन तमाम अनुमतियों के बावजूद स्थानीय स्तर पर भी अधिकारियों को खुश करना पड़ता है और अगर ऐतिहासिक जगह का संबंध किसी धर्म या संप्रदाय से हो तो विभिन्न संगठन विरोध में उतर आते हैं. अभी हाल ही में आशुतोष गोवारिकर को आगरा किले में शूटिंग की अनुमति नहीं दी गई. आशुतोष अपनी नई फ़िल्म 'जोधा-अकबर' की शूटिंग के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहते थे. इस फ़िल्म का विषय मुगलकाल से संबंधित है लेकिन अनुमति न मिलने की वजह से आशुतोष को अपनी शूटिंग किसी और जगह पर करनी पड़ रही है. आम धारणा यह बनी हुई है कि फ़िल्म वाले इस तरह की ऐतिहासिक इमारतों का ठीक से ख़्याल नहीं रख पाते और उनकी शूटिंग के दौरान काफी नुकसान की भी गुंजाइश रहती है, जिसके चलते ऐसी जगहों पर शूटिंग की इज़ाजत नहीं प्रदान की जाती. जब कि किसी भी फ़िल्म की समीक्षा के समय बड़े आराम से फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है कि आजकल की फ़िल्मों में वास्तविक लोकेशन देखने को नहीं मिलती. देखने वाली बात यह है कि हमारे फ़िल्मकारों की कल्पना भी सरकारी झमेलों की शिकार हो जाती है. फ़िल्म निर्माता और निर्देशक भी ऐसी सिचुएशन फ़िल्म में रखना चाहते हैं जिसमें आउटडोर की ज़रुरत भरसक ही पड़े लेकिन जो लोग फिल्में बना रहे हैं, उनके सामने भी कई तरह की मुश्किलें हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें ब्रिक लेन की शूटिंग से लोग नाराज़19 जुलाई, 2006 | पत्रिका मलेशिया में सैफ़ अली ख़ान का 'ऑपरेशन'30 मार्च, 2006 | पत्रिका हालत ख़राब है मुंबई के पुराने स्टूडियो की13 फ़रवरी, 2006 | पत्रिका जसपाल राणा: शूटिंग से ‘शूटिंग’ की ओर16 अगस्त, 2005 | पत्रिका विवादित फ़िल्म 'वॉटर' प्रदर्शित होगी29 जून, 2005 | पत्रिका 'बॉन्ड' की फ़िल्म की शूटिंग भारत में 22 फ़रवरी, 2005 | पत्रिका द राइज़िंगः सबसे महँगी फ़िल्म23 जून, 2004 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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