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'संगीत में सरहदों को जोड़ने की ताक़त है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संगीत में वह ताक़त है जो लोगों को ही नहीं बल्कि सरहदों को भी जोड़ती है. दुनिया की कोई भी सरहद इतनी मजबूत नहीं कि वह किसी संगीत को सीमा पर लगे कंटीलो तारों की बाड़ में बांध सके. दरअसल, संगीत अपने आप में इतना ताक़तवर है कि वह किसी भी देश की सरहद में बंधा नहीं रह सकता. राजनीति और मजहब ने आम लोगों के बीच जो खाइयाँ पैदा की हैं, उनको संगीत और हमारी संस्कृति ही पाट सकती है. कुछ फ़िरकापरस्त ताकतें भी इन दूरियों को बढ़ाने का प्रयास कर रहीं हैं. लेकिन संगीत इन तमाम कड़वाहटों को धोने में सक्षम है. हमारे दोनों मुल्क यानी भारत और पाकिस्तान पहले भी एक थे, आज भी एक हैं और भविष्य में भी एक सूत्र में ही बंधे रहेंगे. बंगाल तो कला और संस्कृति की ही धरती रही है. मैं इसे सलाम करती हूं. मेरी बरसों पुरानी साध थी कि इस धरती पर अपना कार्यक्रम पेश करूँ. अब जाकर मेरी यह तमन्ना पूरी हुई है. यहाँ की धरती ने पंडित रविशंकर और पंडित जसराज जैसे संगीत साधकों को जन्म दिया है. भारत और पाकिस्तान के कलाकार तो पूरी दुनिया में छाए हैं. सूफ़ी गायकी सूफ़ी गायकी तो एक साधना है. रूह की आवाज़ को ही सूफ़ी गायकी कहते हैं. यह इंसान को इंसान से जोड़ती है.
यह गायकी दर्द से जुड़ी हुई है. इसलिए विभाजन और दिलों के दर्द को समझती है. सूफ़ी जैसी ताक़तवर कोई दूसरी चीज़ नहीं है. अमीर खुसरो साहब ने सूफ़ी गायकी को एक नया आयाम दिया था. यह आम लोगों के दर्द के बीच ही बजता है. सूफ़ी संगीत एक ऐसा माहौल बनाता है जहां गायक और श्रोता एक-दूसरे में लीन हो जाते हैं. दर्द से उभरा यह संगीत ही दर्द भरे दिलों को जोड़ने और दिलों के जख़्म पर मरहम लगाने का काम करता है. मैंने अपने पूरे जीवन में सूफ़ी संगीत के ज़रिए दिलों और मज़हबों को जोड़ने का ही काम किया है. आगे भी मेरी यही कोशिश रहेगी. अपने संगीत के ज़रिए मैं इस खाई को अगर थोड़ा-सा भी कम कर सकी तो, ख़ुद को धन्य समझूंगी. मैं समझूँगी कि मेरी संगीत साधना सफल हो गई. भारत-पाक रिश्ता जहाँ तक भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों का सवाल है, संस्कृति और संगीत ही इन दोनों के आपसी संबंधों को स्वाभाविक और मज़बूत बना सकते हैं.
इसका कोई और विकल्प नहीं है. मैं विदेशों में, ख़ासकर यूरोप और अमरीका में अपने कार्यक्रमों के सिलसिले में अक्सर जाती रहती हूँ. वहाँ मैं देखती हूँ कि इस उपमहाद्वीप की संस्कृति कितनी लोकप्रिय है. देखे बिना इस बात पर यकीन करना मुश्किल है. वहाँ हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी भाई-भाई की तरह रहते हैं. हाल में अपने अमरीका दौरे के दौरान मैंने इस बात को बड़ी शिद्दत से महसूस किया. वहाँ इस बात का फ़र्क करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है कि कौन हिंदुस्तानी है और कौन पाकिस्तानी. आख़िर इन दोनों देशों के लोगों की संस्कृति और संगीत की विरासत तो साझा ही है. राजनीति ने हमें अलग ज़रूर कर दिया है, आख़िर हम एक ही मिट्टी के तो बने हैं. हमारी जैसी संस्कृति या संगीत दुनिया के किसी और देश में मिलना मुश्किल है. इन मामलों में हम इतने धनी हैं कि दुनिया के सबसे विकसित देश भी हमारे मुकाबले नहीं ठहर सकते. हमलोग मिल जाएँ तो पूरी दुनिया पर राज़ कर सकते हैं. (कोलकाता में पीएम तिवारी से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें पाकिस्तान पहुँचकर ख़ुश हैं शुभा22 मार्च, 2006 | पत्रिका जाड़े की धूप जैसी जगजीत की ग़ज़लें19 दिसंबर, 2005 | पत्रिका सुर का रिश्ता के गीत सुनिए28 सितंबर, 2005 | पत्रिका सुर का रिश्ताः ऑडियो वीडियो 27 सितंबर, 2005 | पत्रिका भारत-पाक के बीच जुड़ा सुर का रिश्ता27 सितंबर, 2005 | पत्रिका मोहनजोदड़ो की आवाज़ 19 सितंबर, 2005 | पत्रिका 'रीमिक्स अब बंद होना चाहिए'02 सितंबर, 2005 | पत्रिका मेहदी हसन में संगीत ललक आज भी है26 मार्च, 2005 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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