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सोमवार, 19 सितंबर, 2005 को 18:15 GMT तक के समाचार
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मोहनजोदड़ो की आवाज़
आबिदा परवीन
आबिदा परवीन के कैसेट भारत में अत्यधिक लोकप्रिय हैं
('कौन चलाता है आपकी दुनिया' के अंतर्गत वुसतुल्लाह ख़ान ने जायज़ा लिया है पाकिस्तान की मशहूर सूफ़ी गायिका आबिदा परवीन के जीवन और संगीत का. आबिदा के जीवन पर संगीत ही हावी माना जाता है).

1960 के दशक में जब पाकिस्तान में फ़रीदा ख़ानम और इकबाल बानो ग़ज़लों के जूड़ों में चमेली के माफिक गुंथ चुकी थी, सिंध की दरगाहों पर लरकाना के मुहल्ले अली गौहराबाद के हैदर शाह लोक तानें लगा कर सूफ़ियाना गायकी का जादू जगा रहे थे.

हैदर शाह के साथ उसकी आठ नौ वर्ष की बच्ची भी होती थी जो चुप चाप एक ओर बैठी अपने पिता की कला के प्रदर्शन को देखती और दर्शकों के अभिवादन को दिल ही दिल में नापती तौलती रहती थी.

यह उस समय की बात है जब रेडियो पर आवाज़ के आडिशन में सफल होना उतना ही महत्वपूर्ण समझा जाता था जितना कि यूरोप और अमेरीका में किसी नवयुवक को ड्राइविंग लाइसेंस मिलना.

हैदर शाह की बेटी भी एक दिन रेडियो पाकिस्तान के ऑडिशन में सफल हो गई और उस से समय समय पर शाह अब्दुल लतीफ भटाई का कलाम गवाया जाता रहा.

हैदराबाद स्टेशन पर शैख़ ग़ुलाम हुसैन म्युज़िक प्रोड्यूसर हुआ करते थे. यह उनकी नौकरी नहीं बल्कि उनका जुनून था जो उन्हें सदैव नए प्रयोग के लिए उन्हें बाध्य करता रहता था.

हैदर शाह की बेटी की आवाज़ सुन कर शैख़ ग़ुलाम हुसैन को विचार आया कि क्यों न ग़ज़ल और लोक गायकी के बीच की जो दूरी है उसे समाप्त किया जाए और ग़ज़ल को दरबारी रंग से निकाल कर उस पर दरगाह वाला रंग चढ़ाया जाए.

यह प्रयोग दोनों के लिए मील का पत्थर साबित हुई.

‘शाहजु रेसालू’ गाने वाली हैदर शाह की बेटी का आबिदा परवीन के नाम से प्रसंशा और लोकप्रियता के पथ पर पहला क़दम था जिस में उसे शैख़ ग़ुलाम हुसैन के रूप में एक ऐसे गीतकार पति का साथ मिल गया जो 24 घंटे का शिक्षक और मार्गदर्शक भी था.

सूफ़ीयाना रंग में ग़ज़ल और कविता गाने वाली स्त्रियों का माइक के सामने बैठने का ढंग इस प्रकार हुआ करता था जैसे स्टेज पर नमाज़ के समय बैठा जाता है, एक हथेली फ़र्श पर और दूसरा हाथ शब्दों और सुरों के उतार-चढ़ाव के साथ लगातार सक्रिय.

बैठने का यह अंदाज़ सैकड़ो वर्षों के दरबारी परंपरा का नतीजा है.

आबिदा की पृष्ठभूमि

आबिदा की पृष्ठभूमि दरबारी ना होकर दरगाह वाली गायकी से थी इस लिए उसने उठने और बैठने का भी वही ढ़ंग अपनाया जैसे कोई ध्यान की अवस्था में किसी मज़ार के सामने आलती-पालती मारकर बैठे. अपने आप से बेख़बर दोनों हाथ हरकत के लिए आज़ाद और सर का हिलना धमाली रचाने के अंदाज़ में.

और इस अदा के साथ जब आबिदा ने झूम ‘चिर कड़ा साईयां दा, तेरी कत्तन वाली जीवे’ या ‘इक नुक्ते विच गल मकदी ए’ की तान छेड़ी तो पाकिस्तान के कोने कोने में यह अलाप संगीत के रसियाओं को मुड़ मुड़ कर देखने पर विवश करती चली गई.

आबिदा की गायकी में हर एक के लिए कुछ न कुछ है. जो सीधे सरल श्रोता हैं उन के लिए ‘जब से तूने मुझे दीवाना बना रखा है, संग हर शख़्श ने हाथों में उठा रखा है’ जैसा कलाम ही सिर धुनने के लिए काफ़ी है.

सीमा पार आबिदा

1984 में आबिदा परवीन हैदराबाद से स्थायी रूप से कराची चली गईं. यह वह समय है जब पाकिस्तान ने बाकी दुनिया को नुसरत फ़तेह अली ख़ान के हवाले कर दिया और कुछ ही समय में संगीत के एक दलाल पीटर गैबरियल द्वारा नुसरत की आवाज़ के शेयर संगीत के स्टॉक एक्सचेंज में तेज़ी से बिकने लगे.

नुसरत के बाद आबिदा परवीन ऐसी दूसरी आवाज़ है जिसने सरकारी इलेक्ट्रानिक मीडिया और व्यवासायिक कैसेट मंडी के घेरे को तोड़ते हुए उत्तरी अमेरीका से सुदूर पूरब तक अपना जादू जगाया.

कोई बीस वर्ष पूर्व तक भारत में तीन पाकिस्तानी नाम संगीत के दूत के रूप में जाने जाते थे—नूरजहां, मेह्दी हसन और ग़ुलाम अली.

मगर नुसरत फ़तेह अली और आबिदा परवीन ने भारत में वही किया जो लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ ने पाकिस्तान में किया, अथवा हाईवेज़ पर चलने वाली बसों और टरकों, शहरों में एक दूसरे से रेस लगाती गाड़ियों, ड्रॉईंग रूम और गली-मुहल्ले के चायख़ानों पर क़ब्ज़ा कर लिया.

यह वह दोतरफ़ा संगीत कूटनीति है जिस ने उस समय से लोगों के दिलों पर जमी बर्फ़ को पिघलाने का काम प्रारंभ किया जब क्रिकेट कटनीति और पर्दे के पीछे की कूटनीति जैसी शब्दावली से कोई परिचित नहीं था.

हालांकि मोहनजोदड़ो की नृत्य करती हुई कन्या दिल्ली के अजायबघर में है लेकिन मोहनजोदड़ो की आवाज़ आबिदा परवीन के रूप में इस्लामाबाद में रहती है.
'ढ़ूंढोगे हमें मुल्कों मुल्कों, मिलने के नहीं नायाब हैं हम...'

(यह लेख पाकिस्तान के प्रसिद्ध कवि नसीर तुराबी की सहायता से लिखा गया जिन्हें आबिदा परवीन मुर्शिद अथवा पीर कहती हैं)

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