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गुरुवार, 26 मई, 2005 को 14:02 GMT तक के समाचार
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'फ़्यूज़न संगीत में कोई बुराई नहीं'
बालमुरलीकृष्ण
बालमुरलीकृष्ण कहते हैं कि संगीत नाटक अकादमी का स्तर काफ़ी गिरा है
कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के विश्वविख्यात गायक, दो दर्जन भाषाओं से परिचित, पद्मभूषण मंगलमपल्ली बालमुरलीकृष्ण मानते हैं कि फ़्यूज़न संगीत में कोई बुराई नहीं है.

वे मानते हैं कि युवा शास्त्रीय संगीतकारों को जितने अवसर आज मिल रहे हैं, उतने उनके दौर में नहीं थे और युवा पीढ़ी संगीत के क्षेत्र में बेहतर कर रही है.

मुरलीकृष्ण नई चुनौतियों पर ध्यान देने की सलाह देते हैं कि युवा कलाकार शास्त्रीय संगीत की गरिमा, गुणवत्ता और स्पष्टता को बनाए रखें.

पिछले दिनों संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष, सोनल नामसिंह के कामकाज और रवैये पर उन्होंने आपत्तियाँ ज़ाहिर कीं और अकादमी के विशेष समिति से इस्तीफ़ा भी दे दिया है. हालांकि उनका इस्तीफ़ा अभी सरकार ने स्वीकार नहीं किया है.

दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान पाणिनी आनंद ने उनसे संगीत और अकादमी, दोनों के बारे में बातचीत की.

इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-

सवाल- शास्त्रीय संगीत और फ़्यूज़न यानी मिश्रित संगीत की तुलना को आप किस रूप में देखते हैं?

जवाब- देखिए, शास्त्रीय संगीत, संगीत की एक शैली है जिसमें तमाम तरह की प्रस्तुतियाँ हैं जबकि फ़्यूज़न संगीत विधाओं के साथ किसी नए तरह के प्रयोग पर आधारित होता है. इसमें होता यह है कि जो हमारे संगीत को सुन रहे हैं वो अपने हिसाब से उसमें चीज़ें जोड़कर अपनी समझ का रूप देते हैं.

मेरे ख़याल में इसमें कोई बुराई नहीं है. अगर संगीत अच्छा है तो अपनी जगह बनाए रखेगा और अगर ऐसा नहीं है तो ख़त्म हो जाएगा.

सवाल- आप कई भाषाओं में गाते हैं, किस तरह से देखते हैं गायन की विविधता को?

जवाब- कोई भी भाषा हो, मैं हमेशा अर्थ और स्पष्टता को महत्व देता हूँ. मैं इनके विविध रूपों को जानता हूँ और उन्हें सामने रखता हूँ. मेरी दृष्टि में हर संगीत श्रेष्ठ है.

सवाल- आज की वर्तमान युवा पीढ़ी, जो शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में आगे आ रहे हैं, उनमें कितनी संभावनाएँ आपको दिखाई दे रही है?

जवाब- मैं इनके काम से प्रभावित हूँ और ये काफ़ी बेहतर कर रहे हैं. इनके पास संभावनाएँ भी काफ़ी हैं. उदाहरण के लिए, आज मीडिया और तमाम संस्थाएँ इनको बढ़ावा देने के लिए हैं जबकि हमारे समय में ऐसा नहीं हुआ करता था.

 अकादमी भारत के काफ़ी गरिमामय केंद्र के रूप में था पर जब से इन्होंने (नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने) बागडोर संभाली है, अकादमी का स्तर गिरा है

आज तो किसी भी प्रस्तुति को दुनिया में कहीं भी देखा जा सकता है और कला के तमाम रूपों को अच्छी तरह से सैकड़ों वर्षों के लिए संरक्षित किया जा सकता है.

हाँ, इन नए कलाकारों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती भी है और वो हमारी अपेक्षा भी है कि ये युवा कलाकार शास्त्रीय संगीत की गरिमा, गुणवत्ता और स्पष्टता को बनाए रखें.

सवाल- संगीत नाटक अकादमी में पिछले दिनों जो विवाद उठा, उस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

जवाब- देखिए, हालांकि सरकार ने अबतक मेरा इस्तीफ़ा नहीं स्वीकार किया है पर मैंने इससे इस्तीफ़ा दे दिया है और मुझे इस बारे में कुछ नहीं करना है. अब सरकार तय करेगी कि आगे क्या होना है.

अगर कुछ दिनों में सरकार अपनी स्वीकृति नहीं देती है, तो भी मैं अपना इस्तीफ़ा स्वीकृत मान लूँगा.

सवाल- पर आप लंबे समय से अकादमी से जुड़े हैं फिर आपने इस्तीफ़ा क्यों दिया?

जवाब- मैं इसकी वर्तमान कार्यप्रणाली से कतई सहमत नहीं हूँ. मुझे 1970 के दशक में पुरस्कार मिला था और उस समय से मैं अकादमी से जुड़ा रहा हूँ.

तब अकादमी भारत के काफ़ी गरिमामय केंद्र के रूप में था पर जब से इन्होंने (नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने) बागडोर संभाली है, अकादमी का स्तर गिरा है.

वो जिस तरह से बात करती हैं, जिस तरह से बैठकों का आयोजन करती हैं, उनका घमंड, ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैया, किसी को भी सम्मान न देना, मुझे यह सब पसंद नहीं है. मैं क्यों यह सब देखूँ. मैंने इसीलिए इस्तीफ़ा दे दिया है.

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