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बिसरे साजों को सहेजने का संकल्प | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसे जुनून के सिवा दूसरा कोई नाम नहीं दिया जा सकता. एक ऐसा जुनून, जिसमें पुरखों की कला परंपरा विलुप्त होने से बची रह गई. छत्तीसगढ़ की इस्पात नगरी के नाम से मशहूर भिलाई के रिखी क्षत्रिय ने यूं ही खेल-खेल में कुछ पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों को एकत्र करना शुरु किया और धीरे-धीरे यह खेल कब एक जुनून में तब्दील हो गया, इसका पता रिखी को भी नहीं चला. आज देश के 137 ऐसे पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र रिखी के संग्रह में हैं, जिनमें से आधे लुप्त हो चुके हैं. इन दुर्लभ लोक वाद्य यंत्रों को बजाने में पारंगत रिखी के पास इनके निर्माण से लेकर, इनकी उपयोगिता, इनका इतिहास और इनसे जुड़ी अनेक कहानियाँ हैं. शुरूआत भिलाई इस्पात संयंत्र के इलेक्ट्रिकल विभाग में वरिष्ठ तकनिशियन के पद पर कार्यरत रिखी की बचपन से ही संगीत में दिलचस्पी रही है. गुड्डा-गुड़िया के खेल में बाजा बजाने से लेकर शादी-ब्याह और संगीत मंडलियों से होती हुई यह यात्रा रिखी को पारंपरिक लोक वाद्यों के संग्रह तक खींच लाई और रिखी पागलों की तरह इन लोक वाद्य यंत्रों की तलाश में यहाँ से वहाँ भटकते रहे. रिखी बताते हैं- “मुझे बार-बार लगता था कि संगीत में जिस तेजी से सब कुछ बदल रहा है, उसमें तो हमारे पारंपरिक लोक वाद्य पूरी तरह से गायब हो जाएँगे. इसी चिंता के साथ मैंने लोक जीवन में रचे-बसे कुछ वाद्य यंत्रों को एकत्र किया. ” लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था. इस श्रम, समय और धन साध्य काम के चक्कर में रिखी को कई तरह के नुकसान झेलने पड़े. वे थोड़ी झिझक के साथ बताते हैं- “इन वाद्य यंत्रों के पीछे भागते रहने के कारण मैं अलग-अलग कक्षाओं में कई-कई बार फेल होता रहा. ग्यारहवीं में तो पूरे पाँच बार फेल हुआ. भला हो मेरे पिता का, जिन्होंने मुझे बर्दाश्त किया और मेरे इस अलाभकारी पागलपन को लेकर कभी टोका-टाकी नहीं की.” संगीत को गहराई से जानने की प्रक्रिया में रिखी ने लोक संगीत में स्नातकोत्तर करने का निश्चय किया तो तबला वादन में विद् की उपाधि भी हासिल की. इसके अलावा इन्होंने लोक संगीत में डिप्लोमा भी किया. दावा उनका दावा है कि देश में अपनी तरह का यह अकेला लोक वाद्यों का व्यक्तिगत संग्रह है, जहां इतनी बड़ी मात्रा में लुप्तप्राय दुर्लभ वाद्ययंत्र हैं.
आज की तारीख़ में रिखी के संग्रह में एक से बढ़ कर एक वाद्य यंत्र हैं और हर वाद्य यंत्र से जुड़ा हुआ है कोई न कोई किस्सा, कोई न कोई इतिहास का एक पन्ना. रिखी कहते हैं कि संगीत भले ही लोक रंजन का माध्यम रहा हो, लेकिन हर रोज़ के कार्य-व्यवहार में भी इसका ख़ूब इस्तेमाल हुआ है. मसलन, ढ़ीमर जनजाति के पारंपरिक वाद्य यंत्र मरकी को ही लें. इस वाद्य यंत्र में मटकी को काट कर उस पर चमड़ा मढ़ दिया जाता है. फिर उसमें छेद कर मोर पंख को कुछ इस तरह निकाला जाता है कि मोर पंख को आहिस्ता-आहिस्ता खिंचने पर हूबहू शेर की दहाड़ सुनाई पड़ती है. रिखी बताते हैं कि मनोरंजन के अलावा नदी-घाटियों में सब्जी उगाने वाले ढ़ीमरों द्वारा खेत की फसल को दूसरे जानवरों से बचाने के लिए मरकी का इस्तेमाल कुछ दशक पहले तक होता रहा है. इसी तरह बस्तर के इलाके से संग्रहीत रोंजो और सरगुजा के आदिवासी इलाके से संग्रहीत झुमका को वे जानवरों के शिकार से जोड़ते हैं. रिखी पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं- “बीच जंगल में कोई रोंजो बजाए और क्या मजाल कि खरगोश निकल कर बाहर न आए. ” मुश्किलें लेकिन इन वाद्य यंत्रों को संग्रहीत करने में रिखी को कम पापड़ नहीं बेलने पड़े हैं. डमरु की तरह दीखने वाले डांहक को पाने में तो उन्हें बरसों लग गए. अपनी तरह के अनूठे डांहक को बजाने के लिए एक साथ हाथ और पैर का इस्तेमाल किया जाता है. डांहक को साल में एक बार केवल नवरात्रि के समय बजाया जाता है. इसके अलावा स्त्रियों के लिए डांहक छूने पर भी पाबंदी है. कई नियम-कायदे से बंधे इस वाद्य यंत्र को पाने में रिखी को पसीना आ गया. पारधी जनजाति में देवतुल्य माने जाने वाले इस वाद्य यंत्र को पहले तो पारधियों ने दिखाने से भी इनकार कर दिया. बाद में साल भर तक लगातार उनके पीछे पड़े रहने पर मुश्किल से रिखी को डांहक की तस्वीर उतारने की इजाजत मिली. फिर कुछ सालों की मेहनत के बाद वे डांहक बनाने में भी सफल हो गए. एक-एक वाद्य यंत्र की तलाश में बरसों श्रम करने के बाद भी रिखी संतुष्ट नहीं हैं. उन्हें लगता है कि देश में ऐसे और हज़ारों लोक वाद्य होंगे, जिन्हें बचाया जाना ज़रुरी है. अपनी सांस्कृतिक मंडली लोक रागिनी के तहत वे लगातार इन वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन उनकी इच्छा पूरे देश के लुप्तप्राय लोक वाद्यों को बचा लेने की है. वे जल्दी ही इस पर एक विस्तृत परियोजना बना कर मध्य प्रदेश और उड़ीसा में अपना काम शुरु करने वाले हैं. |
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