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'...और स्टेज पर ही मेरी धोती खुल गई' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा जन्म 18 मार्च, 1938 को कोलकाता में हुआ था. उस ज़माने में मेरे पिताजी बीएन सरकार की 'न्यू थिएटर्स कंपनी' में काम करते थे. कोई एक साल की उम्र में ही पिताजी हम लोगों को लेकर वापस मुंबई आ गए. यहाँ मेरा बचपन माटुंगा में बीता. उस वक्त ईस्ट माटुंगा या वेस्ट माटुंगा नहीं हुआ करता था. माटुंगा, माटुंगा था. जब धीरे-धीरे होश संभालना शुरू किया तो समझ में आया कि मेरे पिताजी एक बड़े कलाकार हैं. वो बहुत अच्छी-अच्छी फ़िल्मों में काम करते हैं. मुझे इस काम की बहुत समझ तो थी नहीं पर रात को थिएटर जाना काफ़ी अच्छा लगता था. रॉयल ओपेरा हाउस में रात आठ बजे से शो शुरू होता था और यह सिलसिला रात 12 बजे तक चलता था. हमें तो ऐसा लगता था कि जैसे हमारी पिकनिक हो रही हो. वहाँ बैकस्टेज में हम लोग डोसे वगैरह मँगवाकर खाया करते थे. ...और मैं रो पड़ा ऐसा नहीं है कि हम कुछ काम नहीं करते थे. वहीं से छोटी-छोटी भूमिकाओं का सिलसिला शुरू हुआ था. मेरी एक छोटी-सी नेकर थी, स्कूल वाली. उसी को पहनकर जाता था. इसी नेकर पर धोती बाँध लिया करता था और स्टेज पर चला जाता था. हुआ यूँ कि पता नहीं कैसे वो धोती खुल गई और नेकर दिख गई. दर्शक इसपर हँसने लगे. मुझे यह बहुत ही बुरा लगा. मुझे बहुत बुरा लगा, अटपटा लगा और मैं बहुत रोया. तब पापाजी ने मुझे समझाया कि ये सब चीज़ें तो होती रहेंगी बच्चे. इसके बाद स्कूल में दाखिला हो गया. मैं स्कूल जाता था और थिएटर भी करता था पर जब थिएटर बाहर यानी दूसरे शहरों में जाता था तो मैं स्कूल ही जाता था. हाँ, अगर गर्मियों की छुट्टियाँ हुईं या दूसरी छुट्टियाँ होती थीं तो मैं भी थिएटर के साथ बाहर जाता था. सफ़र की शुरुआत छह साल का था तब पिताजी के साथ एक फ़िल्म में काम करने का मौका मिला. यह फ़िल्म थी- 'सिकंदर'. इस फ़िल्म में पिताजी ने एलेक्ज़ेंडर की भूमिका की थी जो यादगार भूमिका मानी जाती है.
कह सकते हैं कि यहाँ से मेरे फ़िल्मों में काम करने की शुरुआत हुई. एक बड़ा ही अच्छा माहौल था. क़रीब डेढ़ सौ लोगों का थिएटर था. सबका एक साथ रहना, खाना और वह भी किसी तरह के फ़र्क से परे. इस तरह के माहौल में अपने पिताजी, दोनों बड़े भाइयों राजकपूर और शम्मीकपूर से सीखता हुआ और कई बेहतरीन कलाकारों का काम देखते हुए, उनके साथ काम करते हुए मैं बड़ा हुआ. आज मैं ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करता हूँ कि मुझे इस तरह के परिवार और परिवेश में जन्म मिला. बहुत ही अच्छा-अच्छा और मीठा सफ़र रहा मेरे बचपन का. घर में छोटा होने के कारण सभी से मुझे प्यार मिलता था. मेरी ज़िंदगी में 18 वर्ष की उम्र में एक अहम मोड़ आया. मुझे प्यार हुआ और जैनिफ़र जैसी जीवन साथी मिलीं. इसपर बात करेंगे, अगले अंक में... (जानी-मानी फ़िल्मी हस्ती शशिकपूर के ज़िंदगी के तमाम पड़ावों और अनुभवों की यह बानगी शशिकपूर से हमारे साथी पाणिनी आनंद की बातचीत पर आधारित है. इस सिलसिले में अगले कुछ हफ़्तों तक हम साप्ताहिक रूप से आपको सामग्री उपलब्ध कराएंगे. यह अंक आपको कैसा लगा, इस बारे में हमें अपनी प्रतिक्रिया भेजें- hindi.letters@bbc.co.uk पर) |
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