|
पृथ्वी थिएटर के यादगार नाटक | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पापा जी के ड्रामे हमेशा सोशल थीम पर होते थे. ड्रामे का कास्ट्यूम उज़रा जी तैयार करती थीं. (उज़रा जी ज़ोहरा की छोटी बहन हैं. वह पृथ्वी थियेटर के ड्रामों में हरोइन का रोल करती थीं). उनका मज़ाक़ बहुत अच्छा है. पारसी थियेटर का एक तजर्बाकार सेट डिज़ायनर और उसका बेटा सेट बनाते थे लेकिन सजावट फर्नीचर सब उज़रा जी के मज़ाक़ के मुताबिक़ होता था. डांस की तालीम ज़ोहरा जी देती थीं. डांस कम्पोज़ भी वहीं करती थीं. वह बहुत अच्छी कैरेक्टर आर्टिस्ट थीं, बल्कि हैं. मुझे आज थियेटर की थोड़ी बहुत जो सूझ-बूझ है वह पृथ्वीराज कपूर के बाद ज़ोहरा सहगल की ही देन है. पंद्रह-बीस साल के अर्से में पृथ्वीराज जी ने आठ ड्रामे 'शकुंतला', 'दीवार', 'पठान', 'ग़द्दार', 'आहुति', 'कलाकार', 'पैसा' और 'किसान' पेश किये. ये तमाम ड्रामे समाज में होने वाली बुराइयों के ख़िलाफ़ थे. 'शकुंतला' तो क्लासिक होने की वजह से लिया गया. 'दीवार' हिंदुस्तान के बटवारे के ख़िलाफ था. 'पठान' हिंदु-मुस्लिम इत्तेहाद का एक बेमिसाल नमूना था. सदभाव की बेहतरीन मिसाल इत्तेहाद के मौज़ू पर हिंदू मुस्लिम दोस्ती की इससे बढ़िया मिसाल शायद ही कहीं मिले. 'आहुति' भी बहुत ही पुरअसर ड्रामा था. उसमें बटवारे के बहुत ही दर्दनाक नताइज की कहानी थी. नफ़रत के उस दौर में आम हिंदु-मुसलमान दोनों कैसे-कैसे हौलनाक हालात से गुज़रे, यह 'आहुति' में दिखाया गया था.
'ग़द्दार' भी हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मौज़ू पर था. जब हम साउथ इंडिया की टूर पर कोचीन पहुंचे तो मुस्लिम लीगियों ने 'ग़द्दार' की मुख़ालफ़त की और कहा, " अगर यह ड्रामा खेला गया तो हम थिएटर को आग लगा देंगे". पृथ्वीराज जी ने उन्हें बुलाया और कहा "आप आइए और ड्रामा देखियए. अगर ड्रामा आपको ग़लत लगे तो बेशक आपका जो जी चाहे वह कीजिए". चुनांचे वे लोग ड्रामा देखने आए और ड्रामा देखने के बाद उन्हीं लोगों ने, जो थिएटर को जलाने की धमकी दे रहे थे, स्टेज पर आकर पृथ्वीराज जी को गले से लाया और मुबारकबाद दी. 'ग़द्दार' में यह दिखाया गया था कि हिंदुस्तान में एक आम आदमी की हालत जो हिंदुस्तान में है वही पाकिस्तान में भी है. आज हिंदुस्तान और पाकिस्तान की दोस्ती के लिए कोशिश की जा रही है जो बड़ी हद तक कामयाब भी हो रही है. शायद पृथ्वीराज जी इस दोस्ती की अहमियत बरसों पहले ही समझ गये थे. गाँव और शहर 'कलाकार' में इस बात को उजागर किया गया था कि देहात की मासूमियत और भोलपन शहर में आकर किस तरह तबाह होते हैं. यह वाक़ई दिल को छू जाने वाला ड्रामा था. 'किसान' का थीम था कि इतनी मेहनतो-मुशक़्क़त करने के बावजूद किसान कितनी तकलीफ़ें झेलता है. 'पैसा' यह बताता था की दौलत का लालच इनसान में कैसी तब्दीलियां पैदा करता है.
ग़रज़ यह कि कोई भी ड्रामा ऐसा नहीं था जिसमें सिर्फ़ तफ़रीह के अलावा कुछ न हो. हर ड्रामे में तफ़रीह के अलावा कुछ न कुछ सबक़ भी था. अफ़सोस कि उस वक़्त किसी को ख़्याल नहीं आया कि उन ड्रामों को रिकार्ड कर लिया जाए ताकि ये ड्रामे आने वाली नस्लों तक भी पहुंच सकें. वैसे भी उस वक़्त वीडियो का वजूद भी नहीं था और न ही किसी को इन ड्रामों की अहमियत का इतना एहसास था कि उन्हें फ़िल्म की तरह शूट कर लिया जाता. हम लोगों में यह कमज़ोरी है कि अपने आर्ट को डाक्युमेंट करना नहीं जानते. शायद इसी लिए यह क़ाबिले-फ़ख़्र ड्रामे हमेशा के लिए महफूज़ नहीं हो सके...अफ़्सोस!!! (शौकत कैफ़ी फ़िल्म और थिएटर जगत की जानीमानी अभिनेत्री हैं. उनका यह लेख उनकी किताब 'याद की रहगुज़र' का एक हिस्सा है. यह पुस्तक राजकमल प्रकाशन ने छापी है) | इससे जुड़ी ख़बरें उज़रा बट्ट, अभिनय और पृथ्वी थिएटर02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'भाग्यशाली हूँ कि कपूर ख़ानदान में पैदा हुआ'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'आलमआरा' से 'ओंकारा' तक का सफ़र02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'इस ख़ून में ही कुछ ख़ास बात है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'यादें, जो कभी धुंधली नहीं पड़ सकतीं'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||