|
बदलाव के दौर से गुजरता टॉलीवुड | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वर्ष 1901 में हीरालाल सेन की ओर से स्थापित रायल बाइस्कोप और 1919 में बनी पहली बांग्ला मूक फिल्म 'बिल्वमंगल’ से लेकर निदेशक अंजन दत्त की ताजा फिल्म 'बंग कनेक्शन’ तक टॉलीवुड के नाम से मशहूर बांग्ला फिल्म उद्योग ने काफी लंबा सफ़र तय किया है. लेकिन अब यह उद्योग बदलाव के दौर से गुजर रहा है. इस दौरान बांग्ला फिल्मों का कैनवास तो बड़ा हुआ ही है, इसमें भव्यता भी आई है. बीते खासकर एक दशक के दौरान इन फिल्मों में कथानक और तकनीकी कौशल के मामले में तेजी से बदलाव आया है. इन फिल्मों का बजट तो करोड़ों में पहुंचा ही है, कलाकारों व तकनीशियनों को को पहले के मुकाबले बेहतर पैसे भी मिल रहे हैं. पहले जहां पारंपरिक बांग्ला फिल्मों की शूटिंग दक्षिण कोलकाता के किसी स्टूडियों में बने एक ही सेट पर कुछ लाख रुपए में पूरी हो जाती थी, वहीं अब इन फिल्मों की शूटिंग भव्य विदेशी लोकेशनों में हो रही है. क्रॉसओवर फ़िल्में यही नहीं, अब यहां क्रॉसओवर फिल्मों का दौर भी शुरू हो गया है. बांग्ला की पहली फिल्म 'बिल्वमंगल’ वर्ष 1919 में बनी थी और यह मूक थी. पहली वाक बांग्ला फिल्म 1931 में बनी 'देना-पावना (लेन-देन)’ थी. बांग्ला फिल्मों का पहला सबसे लोकप्रिय हीरो होने का श्रेय प्रमथेश बरूआ को जाता है. बरूआ खुद एक निर्देशक भी थे और उन्होंने देवकी बोस के साथ मिल कर फिल्मों को एक नया आयाम प्रदान किया था. वर्ष 1932 में देवकी बोस के निर्देशन में बनी फिल्म 'चंडीदास’ ने आवाज़ की रिकार्डिंग में एक नया मुक़ाम क़ायम किया था. 1935 में प्रथमेश बरूआ ने शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित 'देवदास’ फिल्म का निर्देशन किया और इसमें हीरो की भूमिका भी निभाई थी. देवदास का हिंदी संस्करण यह फिल्म बांग्ला सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुई. इसके कोई बीस साल बाद विमल राय ने इसके हिंदी संस्करण का निर्देशन किया था. लेकिन बांग्ला फिल्मों में स्टारडम का दौर उत्तम कुमार व सुचित्रा सेन की जोड़ी के साथ शुरू हुआ. इस रोमांटिक जोड़ी को व्यावसायिक बांग्ला फिल्मों का स्वर्णिम काल शुरू करने का श्रेय दिया जाता है. उत्तम कुमार ने बाद में सुप्रिया, माधवी, अपर्णा व सावित्री जौसी कई अन्य हीरोइनों के साथ भी काम किया. उत्तम कुमार को सत्यिजत राय की फिल्म 'नायक’ में अपने अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. उसके बाद भी बांग्ला में नए निर्देशकों का आना जारी रहा. सत्यजित राय की ओर से वर्ष 1955 में बनी 'पथेर पांचाली’ का शुमार भारतीय सिनोमा की सबसे बड़ी घटनाओं में किया जाता है. राय ने इसके बाद इसी कड़ी में 'अपराजिता’और 'अपूर संसार’ नामक दो अन्य फिल्में भी बनाईं जिन्होंने भारतीय सिनेमा को दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई. राय के अलावा मृणाल सेन, बुद्धदेव दासगप्ता, गौतम घोष, ऋतुपर्णो घोष व अपर्णा सेन सरीखे निर्देशकों ने बांग्ला फिल्मों को और समृद्ध तो किया ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसको एक पहचान भी दिलाई. जाने-माने अभिनेता विप्लव चटर्जी बांग्ला फिल्मों में आए बदलाव का जिक्र करते हुए कहते हैं कि "पहले इस उद्योग में पैसा नहीं था. तमाम फिल्में किसी एक स्टूडियो में ही बने सेट या किसी गांव की हवेली में बने लोकेशऩ पर शूट की जाती थी. लेकिन अब एक ओर जहां इसके दर्शकों की पसंद बदली है, वहीं इसमें पैसा भी आया है. नतीजतन अब विदेशी लोकेशनों पर भी इन फिल्मों की शूटिंग की जा रही है". जानी-मानी निर्देशक अपर्णा सेन, जिन्होंने मिसेज एंड मिस्टर अय्यर और 15 पार्क एवेन्यू के बाद करोड़ों की लागत वाली द जापानीज वाइफ़ का निर्माण शुरू किया है, कहती हैं कि "अब बांग्ला फिल्मकार भी दर्शकों की रूचि का ध्यान रखने लगे हैं. बदलते समय के साथ दर्शकों की रूचि में बदलाव आया है और इसे ध्यान में रखते हुए बांग्ला फिल्मों का कैनवास भी बढ़ा है. इस कड़ी में द नेमसेक, बांग कनेक्शन व अनुरनन का नाम लिया जा सकता है". अपने ज़माने के मशहूर अभिनेता सौमित्र चटर्जी कहते हैं कि "हाल के वर्षो में बांग्ला फिल्मों का कैनवास व्यापक हुआ है. इनमें ग्लैमर के साथ ही भव्यता भी बढ़ी है". 'बंग कनेक्शन’ के निर्देशक अंजन दत्त कहते हैं कि "बदलते समय के साथ दर्शकों की पसंद भी बदली है. उसे ध्यान में रख कर फिल्में बनान समय की मांग है".
बांग्ला फिल्मों में अपनी पहचान बना चुकी हाल में रिलीज होने वाली बंग कनेक्शन व अनुरनन की नायिका राइमा सेन कहती हैं कि "दर्शकों की पसंद के हिसाब से फिल्मों के कथानक व कैनवास में बदलाव लाजिमी है". हॉलीवुड के स्तर की फ़िल्में जाने-माने फिल्म समीक्षक अभिजीत चटर्जी कहते हैं कि "अब निर्माता-निर्देशक दर्शकों की रूचि को ध्यान में रखते हुए हालीवुड और बालीवुड के स्तर की फिल्मों बनाने लगे हैं". बांग्ला फिल्मों के सुपर स्टार उत्तम कुमार की मौत के बाद इन फिल्मों का विकास लगभग थम गया था. लेकिन अब बढ़ते बजट व कैनवास के बाद हिंदी फिल्म उद्योग के कई बड़े नाम भी बांग्ला फिल्मों में अभिनय के लिए आगे आने लगे हैं. इनमें ओम पुरी, शबाना आज़मी, राहुल बोस और जया बच्चन का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. मौजूदा निर्देशकों की ओर से बनी फिल्मों ने इस उद्योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक पहचान दिलाई है-वह चाहे गौतम घोष की 'पार’ हो, ऋतुपर्णो की 'दोसर’ या फिर अंजन दत्त की 'बंग कनेक्शन’. कभी हफ्ते भर के भीतर ही सिनेमा हालों से उतरने वाली बांग्ला फिल्में अब मल्टीपल्केस में हफ्तों हाउसफ़ुल जा रही हैं. आखिर इसकी वजह क्या है? कोलकाता के मल्टीप्लेक्स आईनाक्स में बंग कनेक्शन देखने के लिए जुटी भीड़ में शामिल शशांक चटर्जी कहते हैं कि "पहले बांग्ला फिल्में एकरसता की शिकार थीं. लेकिन हाल के वर्षों में नए निर्देशकों के आने से यह सिलसिला टूटा है. अब यह फिल्में हिंदी व अंग्रेजी फिल्मों को टक्कर देती नजर आ रही हैं". दरअसल, यही वजह है कि बांग्ला फिल्मों का दर्शक एक बार फिर सिनेमा घरों की ओर लौट रहा है और इनमें वे लोग भी शामिल हैं जिनका शुमार एलीट क्लास में होता है. बांग्ला फिल्मों में बदलाव का ताज़ा दौर कब तक चलेगा, इसका जवाब तो आने वाले दिनों में ही मिलेगा. फ़िलहाल तो टिकट खिड़की पर उमड़ती भीड़ से निर्माता और निर्देशकों की झोली भरती नज़र आ रही है. |
इससे जुड़ी ख़बरें पटना के पर्दे पर दुनिया भर का सिनेमा18 फ़रवरी, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस प्यार के लिए दो दिन...29 जुलाई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस हीरो:अभिनय की कड़ी चुनौती से अभिनयहीनता तक05 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'भर चुके ज़ख़्मों को अब न खरोंचा जाए'07 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस समय से पहले मिला सम्मानः बेनेगल08 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस अमिताभ बच्चन को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार07 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||