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पटना के पर्दे पर दुनिया भर का सिनेमा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सात दिनों में 31 फ़िल्मों के प्रदर्शन के बाद 'पटना फ़िल्म महोत्सव-2007' कुछ बड़े सवालों और चंद छोटे विवादों के साथ गत 15 फ़रवरी को ख़त्म हो गया. कैसा रहा या कैसा लगा जैसे मूल्यांकन के आइने में यह महोत्सव न तो बहुत ही धुँधला और न ही बहुत ही चमकीला रहा. एक दर्शक की प्रतिक्रिया थी,"आयोजन की जो ख़ामियाँ थीं, वो फ़िल्मों की ख़ूबियों में छिप गईं. साथ ही कुछ खट्टे-मीठे सिनेमाई स्वाद चख लेने जैसी अनुभूति हुई." बिहार के सूचना और जनसम्पर्क विभाग की तरफ से आयोजित इस फ़िल्म महोत्सव को पिछले साल के आयोजन से थोड़ा बदलकर अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव की तरह पेश करने की कोशिश की गई थी. पटना के गाँधी मैदान से लगे दो सिनेमा घरों को आयोजन स्थल बनाया गया था जहाँ स्वीडन, पोलैंड, जापान, इटली और फ्राँस की फ़िल्मों सहित हिंदी, भोजपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं की फ़िल्में भी दिखाई गईं. भारतीय भाषाओं की फ़िल्मों में ट्रैफ़िक सिग्नल, उत्सव, हनन, जागृति, दंश, दामुल, सेनुर के लाज, शंकराभरनम् और माने जैसी फ़िल्में प्रमुख थीं. फ़िल्म संस्कृति मुंबई फ़िल्म उद्योग में अपने आप को स्थापित कर चुकी कई बिहारी हस्तियाँ जैसे प्रकाश झा, मनोज बाजपेयी, कनिका वर्मा और संजय झा तो महोत्सव में दिखीं लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा और शेखर सुमन नज़र नहीं आए. पटना फ़िल्म महोत्सव के दौरान राज्य में स्वस्थ और सुरुचिपूर्ण फ़िल्म संस्कृति को बढ़ावा देने पर सार्थक परिचर्चाएँ हुईं. इन परिचर्चाओं में दर्शकों को अपने चहते फ़िल्मकारों के साथ सीधे संवाद करने का मौका मिला.
इस अवसर पर फ़िल्म निर्देशक डॉक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने कहा कि "जब इस देश में केंद्र और राज्य की सरकारों को फ़िल्मों की सामाजिक ताकत का सही-सही अंदाज़ा मिल जाएगा तब सरकारी योजनाओं का अंग बन सकने लायक अच्छी फ़िल्मों के निर्माताओं को कटोरा लेकर भटकने की पीड़ा नहीं झेलनी पड़ेगी." युवा निर्देशक संजय झा का कहना था कि जिस दिन बिहार में फ़िल्म निर्माण के अनुकूल आधारभूत संरचना तैयार हो जाएगी उसी दिन से बिहारी सिने प्रतिभाओं का चमत्कार मुंबई में नहीं बल्कि इस राज्य में भी दिखने लग जाएगा. विविध पहलू इस फ़िल्म महोत्सव में कुछ राजनैतिक और आर्थिक पहलू भी उभर कर आये. बिहार में 15 वर्षों की लासू-राबड़ी सरकार के बाद सत्ता में आई नई सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ऐसा कोई मौका भी चूकना नहीं चाहते जिसमें यह संदेश छिपा हो कि बिहार का सांस्कृतिक माहौल भी अब बदल रहा है. इसलिए उनका दावा है कि राज्य की मंद सांस्कृतिक चेतना अब सजग हो रही है. फ़िल्म महोत्सव का समापन मकरंद देशपांडे के निर्देशन में बनी फ़िल्म 'हनन' दिखाकर किया गया. मनोज बाजपेयी की शीर्ष भूमिका वाली इस फ़िल्म का यह पहला प्रदर्शन था. कुल मिलाकर देखें तो यह फ़िल्म महोत्सव भी टिकाऊपन और बिकाऊपन के बीच का द्वंद लिए हुए बीता. | इससे जुड़ी ख़बरें बिहार के 'अपहरण उद्योग' पर फ़िल्म30 नवंबर, 2005 | पत्रिका बात तब और थी, बात अब और है02 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका सिखों का अपना फ़िल्म महोत्सव13 अक्तूबर, 2005 | पत्रिका टोरंटो फ़िल्मोत्सव का उदघाटन 'वॉटर' से09 सितंबर, 2005 | पत्रिका न्यूयॉर्क में देसी फ़िल्मों का फेस्टिवल05 नवंबर, 2005 | पत्रिका कराची में बॉलीवुड सितारों का जमावड़ा11 दिसंबर, 2006 | पत्रिका बर्लिन फ़िल्म उत्सव में भारतीय फ़िल्म सम्मानित18 फ़रवरी, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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