मानव पिरामिड में है इंसानी फ़ितरत का संदेश

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कुछ दिनों पहले ही मुंबई में दही-हांडी का उत्सव हुआ. एक दूसरे के ऊपर चढ़कर पिरामिड बनाते हुए 'नंदलाल' मटकियां फोड़ रहे थे.
इंसानी पिरामिड बनाने का ऐसा ही खेल, स्पेन के शहर बार्सिलोना में भी होता है. यहां के इंसानी पिरामिड की एक तस्वीर पूरी दुनिया में चर्चित हो गई.
इसमें लोगों की कलाबाज़ी के साथ-साथ इंसानी फ़ितरत का संदेश भी छुपा हुआ है. इससे हमें हौसला भी मिलता है.

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ऐसी तस्वीरें इंसान को ऊर्जा से भर देती हैं. उसे अलग तरह की ताक़त का एहसास होता है. सबसे ऊपर खड़ा इंसान अपनी बाहें फैलाकर मानो ताक़त का खुला संदेश दे रहा हो.
कला की दुनिया में इंसानी पिरामिड के साथ बहुत से प्रयोग हुए हैं.
पियर डेला फ्रांसेस्का की 1460 की पेंटिंग 'रिसरेक्शन' हो या राफ़ेल की 1505 में बनाई पेंटिंग 'मैडोना ऑफ द मेडो', लियोनार्डो दा विंची की 1503 की पेंटिंग 'द वर्जिन ऐंड चाइल्ड विद सेंट' या फिर यूजीन डेलाक्रो की 1830 की पेंटिंग, 'लिबर्टी लीडिंग द पीपल'.

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इंसानों की भीड़ वाले ये तिकोने आकार एक बड़े हौसले की तरफ़ इशारा करते हैं. देखने वाले की नज़रें ख़ुद ब ख़ुद ऊपर उठ जाती हैं.
वैसे पिरामिड को कला में जगह सिर्फ़ ऊर्जा या हौसला भरने का संदेश देने के लिए नहीं इस्तेमाल किया गया है. बहुत से कलाकारों ने इसके ज़रिए इंसानी फ़ितरत के ख़राब पहलुओं को भी रंगों से उकेरा है.
मससन, मशहूर फ्रेंच कलाकार गेरीकॉ की पेंटिंग 'राफ्ट ऑफ मेडुसा', जिसमें नाव पर सवार इंसान आख़िरकार डूब जाते हैं. यह पेंटिंग 1816 में अफ्रीकी देश मॉरीतानिया के पास डूबे फ्रेंच लड़ाकू जहाज़ मेडुसे की कहानी कहती है.
जहाज़ डूबने के बाद 147 लोगों ने नाव पर सवार होकर अपनी जान बचाने की कोशिश की, सिर्फ़ 15 इसमें कामयाब रहे. गेरीकॉ ने अपनी पेंटिंग में इसी दर्दनाक घटना का ब्यौरा पेश किया है.
इसी तरह फ्रांसिस बेकन की 'स्क्रीमिंग पोप्स' पेंटिंग भी दर्द को बयां करती है. इसी तरह पॉल सेज़ान की 1901 की पेंटिंग 'पिरामिड ऑफ स्कल्स' भी खोपड़ियों के पिरामिड को दिखाती है. जैसे कि वह हमारी नज़र इन्हीं के बीच दफ़्न हो.

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बार्सिलोना की तस्वीर के सबसे क़रीब अगर कोई पुरानी पेंटिंग है तो वो 1941 में डेनिश कलाकार हैरल्ड एंगमैन की बनाई पेंटिंग, 'ह्यूमन पिरामिड' है.
इसमें कलाकार ने यह कल्पना की है कि आज का समाज जिस बुनियाद पर खड़ा है, वो कंकालों से, लोगों के बलिदानों और क़त्ल की वजह से ख़ून से रंगी ज़मीन है. इस पेंटिंग के ज़रिए एंगमैन ने डेनमार्क पर जर्मनी के क़ब्ज़े को भी बयां किया है.

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इन तमाम कलाकृतियों को देखने से यही लगता है कि आज हम जहां कहीं भी खड़े हैं, उसके लिए वो लोग ज़िम्मेदार हैं, जो हमसे पहले आए. ठीक उसी तरह, जैसे इंसानी पिरामिड के सबसे ऊपर खड़ा शख़्स, अपने पैरों के नीचे दबे लोगों का कर्ज़दार है.
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