तुर्की में तख़्तापलट का क्या होगा असर?

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तुर्की में सेना की एक टुकड़ी ने राष्ट्रपति रैचेप तैयप अर्दोआन सरकार के तख़्तापलट की कोशिश की है और मुल्क के कई बड़े शहरों से अभी भी झड़पों की ख़बरें आ रही हैं.
बीबीसी हिंदी ने इस मामले पर अमरीका के वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में मध्य-पूर्व मामलों के प्रोफेसर अकबर अहमद से बात की और पूछा कि वो तुर्की में जारी हालात के बारे में क्या कहेंगे.
प्रोफेसर अकबर अहमद के मुताबिक़ तुर्की में मौजूदा हालात काफी अफ़रातफरी के हैं. अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि किसका पलड़ा भारी है.
एक तरफ फौजों की टुकड़ियां है, जिन्होंने हुकूमत के खिलाफ़ एक क़िस्म की बगावत की है. इस विद्रोह में पूरी सेना नहीं केवल टुकड़ियां शामिल हैं. दूसरी तरफ़ जनता है जिनमें से ज्यादातर अब भी चुनी गई सरकार के साथ है.

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इस मौजूदा घटनाक्रम में सबसे अजीब बात रही है, वो ये कि तख्तापलट के वक़्त राष्ट्रपति रैचेप तैयप अर्दोआन न अंकारा में थे न इस्तांबुल में. वह छुट्टियों पर बाहर गए हुए थे.
इस दौरान सेना ने तुरंत दोनों हवाई अड्डे बंद कर दिए. बॉस्फ़ोरस में दोनों पुल बंद कर दिए. तुर्की के अहम शहर इस्तांबुल और अंकारा बाक़ी देश से कट गए.
राष्ट्रपति रैचेप तैयप के लिए वापस आना बड़ा मुश्किल था. वह पहुंचे है तो स्थिति बदली है, क्योंकि उन्हें आवाम का काफ़ी समर्थन हासिल है.

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ग़ौरतलब है कि तुर्की में एके पार्टी के सत्ता में आने से पहले ही चार बार सेना ने इस्लामिक प्रभाव वाली सरकारों को सत्ता में आने से रोका है.
सैन्य टुकड़ियों ने अचानक देश को नियत्रंण में लेने की कोशिश की. इसके ताऱीखी कारण हैं.
फ़ौज अमूमन ऐतिहासिक तौर पर 'कमालिस्ट आइडोलॉजी' की तरफ़ अधिक झुकाव रखती है. इसका मतलब है इस्लाम को हुकूमत से दूर रखना.

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ये तुर्की को एक नया, आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र समझते हैं और उस रवैए की तरफ बढ़ रहे हैं. राष्ट्रपति अर्दोअान और उनकी स्थिति में थोड़े मतभेद हैं.
ये मतभेद आप तख्तापलट में देख रहे हैं. सेना की टुकड़ियां सेक्युलर कमालिस्ट की स्थिति चाहती हैं, इसलिए उन्होंने ये कार्रवाई की. उनकी पहली कार्रवाई इस्लामिक प्रतीकों को हटाने की रही. उधर तुर्की में इन हालातों पर जनता का समर्थन सरकार के पक्ष में अधिक है. .
अर्दोअान की पार्टी हमेशा चुनावों में जीती है. उनकी पार्टी की जीत 50 से 55 फीसदी रही. इसका मतलब है कि जनता के बीच वो काफ़ी ताक़तवर हैं.
ये तख्तापलट ज्यादा कामयाब नहीं होगा, लेकिन सेना में इस तरह के अंदरुनी मतभेद ख़तरनाक हैं, क्योंकि सेना की एक टुकड़ी हुकूमत के साथ है और एक उसके ख़िलाफ़.

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इस पूरे क्षेत्र में तुर्की का बड़ा महत्व है. तुर्की में कुर्दों के साथ अंदरूनी तौर पर एक लड़ाई चल रही है. कुर्दों का इलाक़ा बड़ा है. वो क़बायली हैं. उनकी अपनी एक संस्कृति है और अपनी तारीख़ है. ये अर्दोआन की बदकिस्मती है जो उन्हें इस मोर्चे पर झेलनी पड़ रही हैं.
दूसरा तुर्की पर आईएस और सीरिया के तरफ़ से जो बाहरी हमले हो रहे हैं. वह भी परेशानी वाली बात है.

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तीसरा दबाव तुर्की पर सीरिया के शरणार्थीयों का है. ये सीरिया से तुर्की आते हैं और यहां से फिर ग्रीस जाते है और वहां से जर्मनी और यूरोप के दूसरे मुल्कों का रूख़ करते हैं.
चौथा दबाव रूस का है. तुर्की के रूसी हवाई जहाज़ को गिराने के बाद इन दोंनों के बीच के रिश्ते काफ़ी तल्ख़ हो गए हैं.
(बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह से बातचीत पर आधारित)
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