क्यों सहकर्मी आपके आइडिया को चुराते हैं?

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दफ़्तर में हम अक्सर एक बात के शिकार होते हैं. हमने अपना आइडिया किसी से साझा किया और बाद में उसने उसे अपना बनाकर बेच लिया.
नौकरी करने वाला कमोबेश हर शख़्स इससे दो-चार होता है. पिछले साल अमरीका में हुए एक सर्वे के मुताबिक़, हर पांचवें बॉस ने ये माना कि उन्होंने अपने मातहतों के आइडिया को अपना बनाकर बेचा था.
क़रीब एक हज़ार लोगों के बीच हुए इस सर्वे में आधे लोगों ने कहा कि वो आइडिया चोरी के शिकार हुए हैं. अक्सर ऐसा करके दूसरों की इमेज चमकाई गई है.
बहुत बार होता है कि मीटिंग में तमाम लोग अपने आइडिया की चर्चा करते हैं. अचानक कुछ दिनों बाद किसी और के सुझाव को किसी और ने अपना बताकर वाहवाही बटोर ली.
अमरीका में हुए सर्वे में सबसे दिलचस्प बात जो सामने आई थी, उसमें सुझाव चुराने के ज़्यादातर आरोपियों को ये एहसास ही नहीं था कि उन्होंने किसी और के आइडिया को चोरी किया है.
असल में ऐसा होता है हमारे दिमाग़ में एक हल्के से खलल के चलते. वैज्ञानिकों ने इसे 'क्रिप्टोम्नेसिया' नाम दिया है.
इसका मतलब होता है छुपी हुई याददाश्त. इसमें लोग किसी याद को अपना नया ख़्याल मान बैठते हैं.

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ऐसे आइडिया चोरों से परेशान लोगों से एक सवाल है. क्या आपको याद है कि किसने आपको इमोजी के बारे में बताया था? या क्या ये याद है कि किसने पहली बार ये बताया था कि फ्रांस की राजधानी क्या है?
हम यक़ीन से कह सकते हैं कि इन सवालों का जवाब आप ना में देंगे.
आपको बहुत सी बातें मालूम हैं. लेकिन जब आप ये सोचने बैठते हैं कि पहले पहल ये बात कब, कैसे और कहां पता चली थी, तो दिमाग़ चकरा जाता है. याददाश्त धोखा दे जाती है.
इसकी वजह है हमारा दिमाग़, जो पुरानी यादों को दो हिस्सों में बांटकर रखता है. इस बात को यूं समझिए.
मान लीजिए कि आप किसी सेमीनार में गए हैं. वहां एक तरफ़ तो आपका दिमाग़ वहां हो रही बहस में शामिल है. दूसरी तरफ़ वो आपनी निजी ज़िंदगी की यादों को भी सहेज रहा है.
जैसे कि आप घर से निकलकर किस ज़रिए से वहां पहुंचे थे. आप जब सेमीनार में पहुंचे तो बारिश हो रही थी या नहीं. ये आपकी निजी याददाश्त है. इसे एपिसोडिक मेमोरी कहते हैं.
फिर, सेमीनार में क्या बात हुई, किसने क्या कहा, ये अलग जानकारी है जिसे हमारा दिमाग़ यादों के तौर पर संजो के रखता है.

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इसे सेमैन्टिक मेमोरी कहते हैं. जैसे कि किसी देश की राजधानी का नाम या फिर गणित के सवाल.
याददाश्त संजोने का ये दोहरा तरीक़ा हमारे काफ़ी काम आता है. इससे हमें ये तो याद रहता है कि फ्रांस की राजधानी क्या है.
ये हमेशा याद रखने की ज़रूरत नहीं होती कि ये बात आपको बताई किसने थी.
अब आपको फ्रांस की राजधानी का नाम मालूम है. मगर ये नहीं मालूम कि ये बात किसने आपको बतायी थी.
तो जब आप किसी और को फ्रांस की राजधानी पेरिस होने की जानकारी देंगे, तो आपको लगेगा कि ये आपका ख़ुद का ख़याल है, अपनी जानकारी है.
क्योंकि आप ये भूल चुके हैं कि आपको किसने बताया था कि फ्रांस की राजधानी क्या है.
जब आप याद करने बैठेंगे तो आपको ख़ुद लगेगा कि दिन में कई बार आपके साथ ऐसा होता है. आप किसी सुनी हुई बात को अपना कहकर दूसरों को बताते हैं.
वो भी अक्सर अनजाने में. जैसे कि आप ख़ुद दूसरों के सुनाए चुटकुले, अपना कहकर सुनाते हैं, या फिर किसी मुद्दे पर बहस के दौरान आप अख़बार में पढ़े लेख के तर्क अपना बनाकर बताते हैं.

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वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक, एलिज़ाबेथ लोफ्टस कहती हैं कि ये आम बात है. हम सब लोग अपनी याद में थोड़ा सा ख़्याली पुलाव मिलाकर बताते हैं.
लेकिन दफ़्तर में दूसरे के सुझाव की चोरी, कई बार जान-बूझकर की जाती है. अच्छे सुझावों के साथ अक्सर ऐसा हो जाता है.
इसके लिए सिर्फ़ आइडिया अच्छा होना ज़रूरी नहीं. किसी इंसान की क़ाबिलियत और उसकी विश्वसनीयता इसमें बड़ा रोल निभाती है.
दिलचस्प बात ये है कि मर्दों के आइडिया अक्सर मर्द चुराते हैं. वहीं महिलाओं के मिले दिलचस्प सुझाव उनकी महिला साथी ही चुराती हैं.
दफ़्तर का शोर-शराबे वाला माहौल, जहां लोगों को एक दूसरे की बात ठीक से नहीं सुनाई देती, वहां अक्सर लोग इसके शिकार हो जाते हैं.
अक्सर, किसी मीटिंग में बाद में बोलने वाले लोग, पहले बोल चुके लोगों के सुझाव चोरी करके उसे अपना बनाकर बेच लेते हैं.
वजह वही होती है. किसी और से सुनी बात को अपना ओरिजिनल आइडिया मान लेना.
विज्ञापन की दुनिया में तो अक्सर ऐसा होता है. जहां लोग अक्सर दूसरों से प्रेरणा लेते हैं. वहीं दूसरों के आइडिया चुराने में भी उस्तादी दिखाते हैं.

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हैप्पीनेस ब्रसेल्स ऐड कंपनी की कैरेन कॉरिगन कहती हैं कि ये अक्सर होता है.
जो लोग पुराने विज्ञापनों पर रिसर्च करते रहते हैं, वो अक्सर बाद में उन्हें अपना ओरिजिनल आइडिया बताकर बेचने की कोशिश करते हैं.
हमारी पहचान इस बात से बनती है कि हम, अपने आइडिया की चोरी होने की जानकारी होने पर कैसा बर्ताव करते हैं.
पहली बात तो ये कि आपको इस पर ख़ुश होना चाहिए. गुरूर करना चाहिए कि किसी को आपका ख़्याल इतना पसंद आया कि उसने इसे चुरा लिया.
अक्सर ये अनजाने में हुई ग़लती होती है. अच्छे लोग सिर्फ़ ये कह सकते हैं कि, 'अच्छा, मुझे पता नहीं था कि ये ख़्याल आपका है'
वैसे भी सुझाव की, आइडिया की चोरी इतनी बुरी बात नहीं. कोई भी आइडिया पूरी तरह से मौलिक नहीं होता. अक्सर किसी और सुझाव की बुनियाद पर नया ख़्याल गढ़ा जाता है.
डोंट पैनिक लंदन के निदेशक रिचर्ड बीयर कहते हैं कि हम सब कमोबेश एक जैसी पढ़ाई करते हैं. ऐसे में हमारे आपके ख़्याल मिलते हैं तो इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं.

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अब ये पता लगाना नामुमकिन है कि किसी का आइडिया जान-बूझकर चुराया गया या अनजाने में.
इससे बचने का तरीक़ा ये है कि मीटिंग के नोट बनाए जाएं. दूसरे क्या कह रहे हैं वो बातें ध्यान से सुनें.
और फिर भी अगर आइडिया की चोरी से हलकान हैं तो ये जान लीजिए कि बड़े से बड़े दिग्गजों ने दूसरे का आइडिया चुराया है.
फिर वो चाहे पाब्लो पिकासो हों, स्टीव जॉब्स, थॉमस एडिसन या फिर हेनरी फोर्ड.
इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपको आइडिया आया तो कहां से. फ़र्क़ इस बात से पड़ता है कि आपने उसका किया क्या?
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160504-why-your-colleagues-cant-help-stealing-your-ideas" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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