पाक महिला खिलाड़ी का तालिबान के नाम संदेश

मारिया तूरपाके वज़ीर

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    • Author, लॉरा ट्रेवेलियान
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, न्यूयॉर्क

पाकिस्तान की नंबर एक महिला स्क्वॉश खिलाड़ी मारिया तूरपाके वज़ीर के संघर्ष की कहनी बेहद प्रेरणादायक है.

हाल ही में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में महिलाओं के अधिकारों को लेकर भाषण दिया.

बीबीसी संवाददाता लौरा ट्रिवेलियन ने न्यूयॉर्क में मारिया तूरपाके से मुलाक़ात कर उनसे बातचीत की.

दक्षिण वज़ीरिस्तान में पली-बढ़ी मारिया ने 12 साल की उम्र से ही स्क्वॉश खेलना शुरू कर दिया था.

मारिया कहती हैं कि वो बचपन से ही टॉम बॉय थीं. महज़ चार साल की उम्र से ही अपने भाई की तरह कपड़े पहनने लगी थीं ताकि वो घर से बाहर खेल सकें.

उनके मुताबिक़ वहां लड़कियों के लिए कोई आज़ादी नहीं थी. उन्हें पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था.

उस माहौल में उनका भविष्य अलग था, वो अपनी राय नहीं रख सकती थीं, कोई आवाज़ नहीं उठा सकती थीं.

मारिया तूरपाके वज़ीर

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मारिया ने बताया कि मुताबिक़ सफ़ल खिलाड़ी बनने के लिए संयम बेहद ज़रूरी है क्योंकि रेफ़री, विरोधी खिलाड़ी, दर्शक और अपनी भावनाओं से रूबरू होना पड़ता है.

मारिया को अपने खेल के लिए कई पुरस्कार मिले.

पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने उन्हें 'सलाम पाकिस्तान' अवॉर्ड से नवाज़ा था.

इसके अलावा यूथ अवॉर्ड, वुमन एक्सीलेंस अवॉर्ड और कई दूसरे पुरस्कार भी उन्हें मिले.

ये वही दौर था जब तहरीक़-ए-तालिबान से उन्हें और उनके परिवार को धमकी मिलनी शुरू हो गई थी.

तालिबान ने मारिया के पिता को चिट्ठी भेजकर और कई फोन कॉल कर धमकी दी थी.

उनके घर के चारों ओर चेकपोस्ट लगाए गए, घर से स्क्वॉश कोर्ट तक के रास्ते में चेकपोस्ट लगाए गए. वो स्क्वॉश कोर्ट नहीं जा सकती थीं.

इस डर के साये में मारिया ने तीन साल तक घर के बेडरूम में स्क्वॉश का अभ्यास किया.

मारिया कहती हैं, "मुझे तब अहसास हुआ कि मैं खेलना नहीं छोड़ सकती हूँ. ये मेरा हिस्सा है. ऐसे में मुझे पाकिस्तान से निकलना ही था."

मारिया तूरपाके वज़ीर

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मारिया कहती हैं कि उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए सभी जगह ई-मेल भेजने शुरू कर दिए.

जहां भी स्क्वॉश कोर्ट था, चाहे क्लब हो, अकादमियों, यूनिवर्सिटी, स्कूल सभी जगह मेल भेजकर उनसे ट्रेनिंग की इजाज़त मांगी.

इसके तीन साल बाद एक वर्ल्ड चैंपियन खिलाड़ी ने उन्हें प्रशिक्षण देने की इच्छा ज़ताई.

इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा. मारिया ने पाकिस्तान छोड़ दिया और कनाडा में ट्रेनिंग लेने लगीं.

पूछे जाने पर कि आज वो तालिबान को क्या संदेश देना चाहती हैं, उनका जवाब था, "अच्छाई की हमेशा जीत होती है."

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