उत्तर कोरिया की भयावह त्रासदी, वहाँ के लोगों की ज़ुबानी

पिछले कई महीनों से बीबीसी उत्तर कोरिया के तीन नागरिकों से गुपचुप बात करता रहा है.
इन तीन नागरिकों ने पहली बार उस तबाही से पर्दा उठाया है, जो इस वक़्त उत्तर कोरिया पर बीत रही है.
उत्तर कोरिया ने साढ़े तीन साल पहले अपनी सीमाएं बाहरी दुनिया के लिए बंद कर दी थीं. उसके बाद से वहाँ के लोग भुखमरी और हुक़ूमत की कठोर कार्रवाई झेल रहे हैं. उनके पास इस ज़ुल्म-ओ-सितम से बचकर भागने का कोई रास्ता नहीं है.
इन उत्तर कोरियाई नागरिकों की हिफ़ाज़त के लिए हमने उनके नाम बदल दिए हैं.
म्योंग सुक अपने फ़ोन पर बिज़ी हैं. उनकी पूरी कोशिश है कि वो अपना थोड़ा सा और सामान बेच लें. म्योंग सुक एक चालाक कारोबारी महिला हैं.
वो छुप-छुपकर छोटी मोटी दवाएं अपने देश में उन लोगों को बेचती हैं, जिन्हें इनकी सख़्त ज़रूरत है.
ये दवाएं, चीन से तस्करी करके उत्तर कोरिया लाई जाती हैं. दवाएं बेचने से म्योंग सुक बमुश्किल गुज़र बसर करती हैं.
वो एक बार पहले ही पकड़ी जा चुकी हैं. अब वो दूसरी बार पकड़े जाने का जोखिम नहीं ले सकती हैं. अगर म्योंग सुक दोबारा दवाएं बेचती पकड़ी गईं, तो उन्हें जेल जाने से बचने के लिए रिश्वत देनी पड़ेगी और उनके पास इतने पैसे हैं नहीं.
मगर, उन्हें हर वक़्त डर लगता रहता है. दरवाज़े पर कभी भी दस्तक हो सकती है.
ज़रूरी नहीं कि पुलिसवाले ही हों. म्योंग को तो अपने पड़ोसियों से भी डर लगता है. म्योंग सुक अब किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकती हैं. पहले ऐसा नहीं था. पहले म्योंग सुक का दवाओं का कारोबार मज़े में चल रहा था.
लेकिन, जब कोविड-19 महामारी आई, तो इससे बचने के लिए उत्तर कोरिया ने 27 जनवरी 2020 को अपने दरवाज़े बाक़ी दुनिया के लिए बंद कर लिए.
बाहर से सिर्फ़ इंसानों की आवाजाही ही नहीं, अनाज और दूसरे सामान लाने पर भी रोक लगा दी गई.
उत्तर कोरिया के नागरिकों को पहले भी अपना देश छोड़ने की इजाज़त नहीं थी.
लेकिन, अब वो अपने गाँवों, क़स्बों और शहरों में ही क़ैद हो गए. राहतकर्मी और राजनयिकों ने भी अपना बोरिया बिस्तर बांधा और उत्तर कोरिया छोड़ दिया.
अब सरहद की रखवाली करने वालों को हुक्म है कि अगर कोई सीमा के पास आता भी दिखे, तो गोली मार दें.

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दुनिया का सबसे अलग-थलग देश उत्तर कोरिया, अब सूचना के मामले में ब्लैकहोल बन चुका है.
किम जोंग उन के निरंकुश तानाशाही राज में उत्तर कोरिया के लोग बाहरी दुनिया से किसी तरह का संपर्क नहीं कर सकते.
डेली एनके नाम का संगठन उत्तर कोरिया में अपने सूत्रों का एक नेटवर्क चलाता है.
उसकी मदद से बीबीसी ने उत्तर कोरिया के तीन आम नागरिकों से बात की.
वो दुनिया को ये बताने के लिए बेक़रार हैं कि देश की सीमाएं बंद होने से उनकी ज़िंदगी में कैसी तबाही मची हुई है.
उन्हें इस बात का भी अंदाज़ा है कि अगर उनके देश की सरकार को पता चल गया कि वो हमसे बात कर रहे हैं, तो शायद उन्हें मार डाला जाए.
उनकी हिफ़ाज़त के लिए हम उनकी दी हुई जानकारियों का थोड़ा सा हिस्सा ही आपको बता सकते हैं. फिर भी इन तीनों लोगों के अनुभव से हमें अंदाज़ा लग जाता है कि इस वक़्त उत्तर कोरिया की आम जनता कितनी भयानक आपदा से जूझ रही है.
म्योंग सुक

म्योंग सुक हमें बताती हैं कि, 'हमारे यहां खाने के हालात इतने बुरे कभी नहीं थे.'
उत्तर कोरिया की ज़्यादातर औरतों की तरह म्योंग सुक भी अपने परिवार की सबसे कमाऊ सदस्य हैं.
असल में उत्तर कोरिया में मर्दों के लिए सरकार की नौकरी करना अनिवार्य है. मगर उन्हें बेहद मामूली तनख़्वाह मिलती है, जिससे घर का गुज़ारा नहीं हो सकता. इसीलिए, उनकी बीवियां घर चलाने के लिए नए-नए तरीक़े निकाल लेती हैं.
सीमाएं बंद होने से पहले म्योंग सुक, चीन से तस्करी के ज़रिए उन दवाओं का इंतज़ाम कर लेती थीं, जिनकी मांग बहुत ज़्यादा रहती है.
इसमें एंटीबायोटिक्स भी शामिल होती थीं. फिर वो ये दवाएं अपने स्थानीय बाज़ार में बेचती थीं. जब सीमा बंद की गई तो हताशा में एक बार म्योंग सुक ने ख़ुद दवाओं की तस्करी करने की कोशिश की.
लेकिन, वो पकड़ी गईं और अब उन पर लगातार नज़र रखी जाती है.
इसीलिए, वो अब उत्तर कोरिया में बनी दवाएं बेचने की कोशिश करती हैं. लेकिन, आजकल अपने देश की दवाएं मिलना भी दुश्वार है. नतीजा ये कि म्योंग सुक की आमदनी आधी रह गई है.

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अब जब उनके पति और बच्चे सोकर उठते हैं, तो वो उन्हें भुट्टे का नाश्ता कराती हैं. वो दिन तो कब के बीत चुके जब उनका परिवार नाश्ते में सादा चावल खा सकता था.
म्योंग के भूखे पड़ोसी अक्सर खाना मांगने के लिए उनके घर पर दस्तक देते रहते हैं. लेकिन, म्योंग को अक्सर उन्हें ख़ाली हाथ लौटाना पड़ता है. वो कहती हैं कि, 'हम मौत की कगार पर खड़े जी रहे हैं.'
चान हो
सीमा के क़रीब एक और क़स्बे में रहने वाले चान हो सुबह से ही खीझे हुए हैं.
कंस्ट्रक्शन क्षेत्र के कामगार चान हो बेहद ज़िद्दी इंसान हैं. वो अपना ग़ुस्सा निकालते हुए कहते हैं कि, 'मैं लोगों को बताना चाहता हूँ कि मुझे बेहद अफ़सोस है कि मैं इस मुल्क में पैदा हुआ.'

चान हो सुबह सुबह उठ जाते हैं, जिससे वो अपनी पत्नी को उनकी दुकान लगाने में मदद कर सकें.
वो पूरी ज़िम्मेदारी से अपनी पत्नी का सामान दुकान तक ले जाते हैं और फिर स्टॉल पर सजाते हैं.
इसके बाद वो अपने काम पर जाते हैं. चान हो को अच्छे से पता है कि पत्नी की इस दुकान के चलते ही वो अब तक ज़िंदा हैं.
ख़ुद चान रोज़ाना चार हज़ार वोन (4 डॉलर या तीन पाउंड) कमाते हैं. लेकिन, इतने पैसे से एक किलो चावल भी नहीं ख़रीदा जा सकता.
उनके परिवार को सरकारी राशन मिले हुए ज़माना बीत चुका है. अब तो वो उसे भूल भी चुके हैं.
चान कहते हैं कि, जिन बाज़ारों से उत्तर कोरिया के लोग अपना खाना ख़रीदते हैं, वो अब लगभग ख़ाली हैं.
चावल, मक्के और मसालों की क़ीमतें आसमान छू रही हैं. असल में उत्तर कोरिया इतना अनाज नहीं उगाता कि अपने नागरिकों का पेट भर सके.
वो दूसरे देशों से आयात के भरोसे रहता है. लेकिन, देश की सीमाएं सील करके, सरकार ने लोगों के लिए बेहद ज़रूरी अनाजों की आपूर्ति रोक दी.
इसके अलावा, खेती करने के लिए ज़रूरी खाद और मशीनरी भी बाहर से आनी बंद हो गईं.
पहले तो चान हो को ये डर लग रहा था कि वो शायद कोविड से मर जाएंगे. लेकिन, जैसे-जैसे समय बीता उन्हें भुखमरी से मरने का डर सताने लगा.
ख़ास तौर से तब और, जब उन्होंने अपने आस-पास लोगों को भूख से मरते देखा.
उनके गांव में भूख से सबसे पहले एक मां और उसके बच्चों की मौत हुई थी.

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मां बीमार हो गई थी. काम करने लायक़ नहीं बची थी. जब तक मुमकिन हुआ बच्चों ने भीख मांगकर काम चलाया. लेकिन, आख़िर में तीनों मर गए.
इसके बाद, गांव की एक और महिला की मौत हो गई. उसे क्वारंटीन के नियम तोड़ने के लिए मज़दूरी की सख़्त सज़ा दी गई थी. महिला और उसके बेटे भूख से मर गए.
अभी हाल ही में चान हो के एक परिचित के बेटे को सेना से छुट्टी दे दी गई थी. क्योंकि वो कुपोषण का शिकार था.
चान हो को आज भी उस लड़के का सूजा हुआ चेहरा याद है. वो एक हफ़्ते के अंदर मर गया था. चान हो कहते हैं कि, 'मैं जब भी सोचता हूं कि मेरे बच्चों को हमेशा, नाउम्मीदी के इसी नर्क में रहना होगा तो मेरी नींद उड़ जाती है.'
जी येओन

जी येओन, खाने-पीने का सामान बेचने वाली दुकान में काम करती हैं. इससे वो जो थोड़े बहुत पैसे कमाती हैं, उससे उन्हें अपने पति और दो बच्चों का पेट पालना पड़ता है.
पहले वो अपने मालिक की दुकान से फल और सब्ज़ियां चुराकर बाज़ार में बेच लेती थीं.
उनके पति को अपने साथियों से रिश्वत में जो सिगरेट मिलती थीं, उन्हें बेचकर भी थोड़ी कमाई हो जाती थी.
जी येओन उस पैसे से चावल ख़रीद लेती थीं. लेकिन, अब दुकान से निकलते वक़्त उनकी कड़ी तलाशी होती है. उनके पति को भी रिश्वत मिलनी बंद हो गई है. अब कोई भी इंसान कुछ दे पाने का बोझ नहीं उठा सकता.
जी येओन ग़ुस्से में कहती हैं कि, 'अब तो उन्होंने ऊपरी कमाई का हर रास्ता बंद कर दिया है.'
अब जी येओन लोगों को ये दिखाती हैं कि वो तीन वक़्त खाना खाती हैं. जबकि, सच्चाई ये होती है कि वो दिन में एक बार ही खाना खाती हैं. वो भूख तो बर्दाश्त कर सकती हैं. मगर लोगों के सामने ये सच नहीं आने देना चाहतीं कि वो ग़रीब हैं.
जी येओन आज भी उस हफ़्ते की याद करके सिहर उठती हैं, जब उन्हें पुलजुक नाम की एक लुगदी खाकर गुज़ारा करना पड़ा था.
इसे सब्ज़ियों, पौधों और घास को मिलाकर तैयार किया जाता है. पुलजुक, उत्तर कोरिया के इतिहास के सबसे बुरे दौर की मिसाल है.
वो 1990 का दशक था, जब वहां भयंकर अकाल पड़ा था. इसमें तीस लाख लोग मारे गए थे.

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जी येओन कहती हैं कि, 'हम दस दस दिन आगे की सोचकर ज़िंदा बचे हुए हैं. मैं सोचती हूं कि अगर मैं और मेरे पति भूखे रहते हैं, तो कम से कम हम अपने बच्चों का पेट तो भर सकेंगे.'
हाल ही में जी येओन को बिना खाने के दो दिन गुज़ारने पड़े थे. वो कहती हैं कि, 'मुझे लग रहा था कि मैं सोते-सोते ही मर जाउंगी और सुबह नहीं उठूंगी.'
अपनी तमाम मुश्किलों के बावजूद, जी येओन उन लोगों का ख़्याल रखती हैं, जो उनसे बुरे हाल में हैं.
अब शहर की सड़कों पर ज़्यादा भिखारी दिखाई देते हैं. वो ज़मीन पर पड़े हुए लोगों के पास ठहरकर उन्हें देखती हैं.
लेकिन, आम तौर पर उन्हें वो मरे हुए मिलते हैं. एक दिन जी येओन ने अपने पड़ोसी का दरवाज़ा खटखटाया कि उन्हें पानी दे दें.
लेकिन, अंदर से कोई जवाब नहीं मिला. तीन दिन बाद जब सरकारी कर्मचारी घर के अंदर गए, तो पूरे परिवार की भूख से मौत हो चुकी थी.
वो कहती हैं कि, 'ये तबाही है. सीमा से कोई सामान नहीं आ पा रहा है. इसलिए लोगों को समझ में नहीं आ रहा कि अपनी गुज़र बसर कैसे करें.'
हाल ही में येओन ने सुना कि लोगों ने अपने घरों में ख़ुद को मार डाला. जबकि बहुत से लोग मरने के लिए चुपके से पहाड़ों की तरफ़ चले गए.
वो शहर पर पसरी इस बेदर्दी पर दु:ख जताते हुए कहती हैं कि, 'अगर आपके बगल वाले घर में भी कोई मर जाता है, तो भी आप सिर्फ़ अपने बारे में सोचते हैं.'

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कई महीनों से ऐसी अफ़वाहें फैली हुई हैं कि लोग भूख से मर रहे हैं. जिसके बाद आशंका जताई गई कि उत्तर कोरिया में फिर से अकाल पड़ने वाला है.
उत्तर कोरिया के मामलों के जानकार अर्थशास्त्री पीटर वार्ड इन हालात को 'बेहद चिंताजनक' बताते हैं.
वो कहते हैं कि, 'ये ठीक है कि आपने लोगों को ये कहते सुना है कि लोग भूख से मर रहे हैं. लेकिन, जब आप देखें कि आपके पड़ोसी भुखमरी के शिकार हैं. इसका मतलब ये है कि हालात बेहद गंभीर हैं. शायद 1990 के दशक के अकाल से भी ज़्यादा बुरी स्थिति है.'
उत्तर कोरिया के बहुत छोटे से इतिहास में अकाल का दौर निर्णायक साबित हुआ था. इससे वहां का कठोर सामाजिक ताना-बाना चरमरा गया था.
जब हुकूमत लोगों का पेट भरने में नाकाम रही, तो उसने उन्हें थोड़ी बहुत आज़ादी दे दी, जिससे वो अपनी जान बचा सकें. हज़ारों लोग देश छोड़कर भाग निकले. उन्हें दक्षिण कोरिया, यूरोप या फिर अमेरिका में पनाह मिली.
इस दौरान निजी बाज़ार भी फले फूले. महिलाओं ने सोयाबीन से लेकर इस्तेमालशुदा कपड़े और चीन का इलेक्ट्रॉनिक सामान तक, सब कुछ बेचना शुरू किया.
तब एक असंगठित अर्थव्यवस्था जन्म हुआ और इसके साथ ही उत्तर कोरिया के नागरिकों की एक पूरी पीढ़ी पली बढ़ी, जिसने सरकार से मिलने वाली मामूली मदद से गुज़र करना सीख लिया था. एक दमघोंटू साम्यवादी देश में ये छोटे-मोटे पूंजीवादी फल-फूल रहे थे.

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जब बाज़ार ख़ाली हो गया, तो म्योंग सुक ने दिन भर की कमाई गिनी, जो काफ़ी घट गई थी.
उनको चिंता है कि हुकूमत एक बार फिर थोड़ी बहुत कमाई कर लेने वाली उनकी पीढ़ी के पीछे पड़ गई है.
म्योंग सुक को लगता है कि अधिकारियों ने महामारी के बहाने एक बार फिर आम लोगों की ज़िंदगी पर अपना शिकंजा कस दिया है, जो पहले कमज़ोर पड़ चुका था.
वो कहती हैं कि, 'अब सरकार तस्करी रोक रही है. अगर आप चीन की तरफ़ जाने वाली नदी की तरफ़ भी बढ़ते हैं, तो वो सख़्त सज़ा देते हैं.'
मकान बनाने का काम करने वाले चान हो का सब्र भी ख़त्म हो रहा है.
ये उनकी ज़िंदगी का सबसे ख़राब दौर है. वो कहते हैं कि अकाल का वक़्त बुरा था. लेकिन, तब इतने ज़ुल्म नहीं होते थे.
कड़ी सज़ाएं नहीं मिलती थीं. वो कहते हैं कि, 'तब अगर लोग भागना चाहते थे, तो सरकार कुछ ख़ास नहीं कर पाती थी. मगर आज आपका एक क़दम भी ग़लत पड़ा तो आपको गोली मार दी जाएगी.'

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हाल ही में चान हो के दोस्त के बेटे ने सरकारी अधिकारियों को कई लोगों को गोली मारते देखा था.
हर बार तीन से चार लोगों को मार डाला गया. उनका जुर्म बस इतना था कि उन्होंने भागने की कोशिश की थी.
चान हो कहते हैं कि, 'अगर मैं नियम से रहूंगा तो शायद भूख से मर जाऊंगा. लेकिन अगर मैं अपनी जान बचाने की कोशिश करूंगा, तो मुझे डर है कि मुझे गिरफ़्तार कर लिया जाएगा. फिर ग़द्दार घोषित करके मुझे गोली मार दी जाएगी. हम तो बस यहां फंसे हुए मरने का इंतज़ार कर रहे हैं.'
सीमा बंद होने से पहले उत्तर कोरिया से हर साल क़रीब एक हज़ार लोग भागकर दक्षिण कोरिया पहुंचते थे लेकिन, 2020 के बाद से बस मुट्ठी भर लोग की सुरक्षित सीमा पार कर पाए हैं.
ह्यूमन राइट्स वॉच ने सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से बताया है कि पिछले तीन वर्षों में उत्तर कोरिया ने अपनी सीमा पर कई नई दीवारें, बाड़ें और निगरानी चौकियां खड़ी कर दी हैं. इससे वहाँ से भागना लगभग असंभव हो गया है.
अब तो उत्तर कोरिया के लोगों के लिए बाहर के लोगों से संपर्क करना भी ख़तरनाक होता जा रहा है.
पहले सीमा के पास रहने वाले लोग, चीन से तस्करी करके लाए गए फ़ोन और वहाँ के मोबाइल नेटवर्क की मदद चुपके से फ़ोन कर लिया करते थे.
लेकिन, अब तो हर सामुदायिक बैठकों में चीन में बना फ़ोन रखने वाले से उसे जमा करने को कहा जाता है.
हाल ही में म्योंग सुक की एक परिचित को चीन में किसी से बात करते हुए पकड़ा गया था. इसके बाद उन्हें कई साल के लिए जेल भेज दिया गया.
बाहरी दुनिया से संपर्क करने वालों को सज़ा देकर उत्तर कोरिया, अपने नागरिकों को अपना बसर करने लायक़ भी नहीं छोड़ रहा है
नॉर्थ कोरियन डेटाबेस सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स (NKDB) की हाना सॉन्ग कहती हैं कि, 'जब खाना मिलना भी दूभर हो, तो उत्तर कोरिया की सरकार को बख़ूबी पता है कि उसकी सख़्ती का नागरिकों पर क्या असर होगा.'

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पर, इतनी सख़्ती के बावजूद उत्तर कोरिया कोरोना वायरस को अपने यहां पहुँचने से नहीं रोक सका. महामारी के क़रीब क़रीब ढाई साल बाद, 12 मई 2022 को उत्तर कोरिया अपने यहां कोरोना वायरस का पहला मरीज़ मिलने की आधिकारिक पुष्टि की थी.
चूंकि, लोगों के टेस्ट करने के संसाधन नहीं थे. तो, जिनको भी बुखार होता उन्हें दस दिन के लिए घर में क़ैद कर दिया जाता. परिवार के किसी भी सदस्य को घर से बाहर क़दम रखने की इजाज़त नहीं होती थी. जैसे जैसे संक्रमण बढ़ा, तो पूरे पूरे क़स्बे और मुहल्लों को बंद कर दिया गया. कई बार तो दो हफ़्तों से भी ज़्यादा.
प्योंगयांग में जी येओन ने देखा था कि क़ैद किए गए उनके कुछ पड़ोसियों के घर के बाहर, हर दूसरे दिन कुछ सब्ज़ियां रख दी जाती थीं. लेकिन, सीमावर्ती इलाक़ों में रहने वालों को सरकार से ऐसी कोई मदद नहीं मिली.
ऐसे हालात में म्योंग सुक बहुत डर गईं. उनके घर में खाने के लिए एक दाना तक नहीं था. उन्होंने चोरी-छुपे दवाएं बेचनी शुरू कीं. म्योंग सुक को लगा कि भुखमरी का शिकार होने से अच्छा है कि कुछ पैसे कमाए जाएं. भले ही वायरस अपना शिकार बना ले.
चान हो बताते हैं कि कुछ लोग तो लॉकडाउन के कारण मरने के कगार पर पहुंच गए. जब तक उन्हें क़ैद से रिहा किया जाता, वो अधमरे हो चुके थे. वो सिर्फ़ इसलिए ज़िंदा बचे थे, क्योंकि रात के अंधेरे में वो खाने की तलाश में बाहर निकला करते थे. जो नियम के पाबंद थे, वो ज़िंदा नहीं बचे.
चान हो ने बताया कि, 'लोग चीख़ा करते थे कि वो भूख से मर जाएंगे. कुछ दिनों तक सरकार ने अपने भंडार से कुछ चावल लोगों के लिए दिया भी. मगर वो काफ़ी नहीं था.'
जिनको वायरस ने अपना शिकार बनाया, वो सरकारी अस्पतालों के भरोसे नहीं रह सकते थे. उत्तर कोरिया के अस्पतालों की हालत बेहद बुरी है. बुनियादी दवाएं तक ख़त्म हो गईं.
सरकार लोगों को सलाह देती थी कि वो घरेलू नुस्खों से अपना इलाज करें. जब जी येओन बीमार पड़ीं तो उन्होंने अपने दोस्तों की सलाह पर हरे प्याज़ की जड़ें डालकर पानी उबाला और उसको पिया.

जी येओन कहती हैं कि उनके देश में कोविड-19 से बहुत से बुज़ुर्ग और बच्चों की मौत हुई है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, उत्तर कोरिया की 40 प्रतिशत आबादी कुपोषित है. ज़ाहिर है ऐसे में बच्चे और बुज़ुर्ग बीमार पड़े ही होंगे.
जी येओन को एक डॉक्टर ने बताया था कि प्योंगयांग में कोरोना वायरस से हर 550 में से एक आदमी की मौत हुई थी. अगर हम यही अनुपात उत्तर कोरिया की पूरी आबादी पर लागू करें, तो 45 हज़ार से ज़्यादा मौतें हुई होंगी. हालांकि उत्तर कोरिया ने कोरोना वायरस से मौत की आधिकारिक संख्या केवल 74 बताई.
हर इंसान की मौत की वजह अलग अलग बीमारी बताई गई. किसी को टीबी तो किसी को लिवर सिरोसिस.
संक्रमण फैलने के तीन महीने बाद अगस्त 2022 में उत्तर कोरिया ने महामारी पर जीत का एलान भी कर दिया था. वहां की सरकार ने कहा कि वायरस का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया गया. मगर वहां क्वारंटीन के कई नियम तो अब तक लागू हैं.
जब किम जोंग उन ने देश की सरहदें बंद करने का फ़ैसला किया, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय हैरान रह गया. परमाणु हथियारों की वजह से उत्तर कोरिया पर दुनिया में सबसे ज़्यादा पाबंदियां लगी हैं.
उत्तर कोरिया अपने संसाधन किसी को बेच नहीं सकता और अपना काम चलाने के लिए वो बाहर से ईंधन भी नहीं खऱीद सकता.

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ऐसे में सवाल उठा कि उत्तर कोरिया अपनी सीमाएं बंद करके अपने यहां तबाही क्यों लाना चाहेगा?
पीटर वार्ड कहते हैं कि, 'उत्तर कोरिया को डर था कि कहीं वायरस से लोगों की मौत न हो जाए. ऐसे लोगों की मौत, जिनका मरना उसके लिए नुक़सानदेह हो.' पीटर वार्ड का इशारा सेना और सरकार के उन मुट्ठी भर लोगों की तरफ़ है, जो किम के ख़ानदान को सत्ता में बनाए रखने के लिए बेहद ज़रूरी हैं.
चूंकि उत्तर कोरिया की स्वास्थ्य सेवा दुनिया में सबसे ख़राब है. वहां के लोग कुपोषित हैं. उनको टीके भी नहीं लगे थे. ज़ाहिर है, महामारी से बहुत बड़ी तादाद में लोग मरे होंगे.
वहीं, एनकेडीबी की हाना सॉन्ग कहती हैं कि महामारी से किम जोंग उन को लोगों की ज़िंदगी अपनी मुट्ठी में करने का बढ़िया मौक़ा मिल गया. क्योंकि वो हमेशा से अपनी जनता को दुनिया से दूर रखना चाहते थे.
प्योंगयांग में तो थोड़ा बहुत खाना खाने के बाद जी येओन, बर्तन धोकर तुरंत सोने चली गईं.

मगर, सरहद के क़रीब अपने शांत पड़ चुके क़स्बे में म्योंग सुक ने खाने के बाद मन बहलाने का थोड़ा सा मौक़ा निकाल लिया.
वो अपने परिवार के साथ बैठकर टीवी देखने लगीं. ये टीवी उस बैटरी से चलता है, जिसे उन्होंने दिन में चार्ज कर लिया था. म्योंग सुक को दक्षिण कोरिया के टीवी सीरियल अच्छे लगते हैं. हालांकि, उत्तर कोरिया में उन पर पाबंदी है.
उन्हें एसडी कार्ड में चोरी छुपे लाया जाता है. हालांकि, जब से देश की सीमा बंद हुई है, तब से म्योंग सुक कोई नया टीवी ड्रामा नहीं देख सकी हैं. क्योंकि अब बाहर से तस्करी करके लाना बहुत ख़तरनाक हो चुका है.
दिसंबर 2020 में उत्तर कोरिया ने रिएक्शनरी आइडियोलॉजी ऐंड कल्चर रिजेक्शन एक्ट पारित किया था. इस क़ानून के तहत अगर कोई बाहर से तस्करी करके वीडियो लाता है, और उसे लोगों में बांटता है, तो उसे मौत की सज़ा दी जा सकती है.
चान हो इसे सबसे डरावना क़ानून कहते हैं. क्योंकि कोई वीडियो देखते हुए भी पकड़ा जाए, तो इस क़ानून के तहत उसे दस साल क़ैद की सज़ा हो सकती है. उत्तर कोरिया के दस्तावेज़ों के मुताबिक़, इस क़ानून का मक़सद, 'एक सड़ी हुई विचारधारा को फैलने से रोकना है, जो समाज को भ्रष्ट करती है.'
चान हो बताते हैं कि ये क़ानून बनने के बाद से दक्षिण कोरिया के नाटकों के वीडियो दिखने लगभग ख़त्म हो गए. बस युवा पीढ़ी ही इन्हें देखने का साहस कर पाती है. हालांकि, इससे उनके मां-बाप की चिंता बढ़ जाती है.
जी येओन बताती हैं कि जब 22 साल का एक नौजवान दक्षिण कोरिया के गाने और फिल्में लोगों से बांटते पकड़ा गया, तो उसे दस साल सख़्त क़ैद की सज़ा दी गई थी. उसे सज़ा देने के लिए स्थानीय स्तर के नेता जमा हुए थे. जिससे जनता में कड़ा संदेश जाए.
रयू ह्यून लू उत्तर कोरिया के पूर्व राजनयिक हैं, जिन्होंने 2019 में अपना देश छोड़ दिया था वो कहते हैं कि ऐसे क़ानूनों का मक़सद ये होता है कि युवा पीढ़ी की वफ़ादारी हुकूमत के प्रति बनी रहे क्योंकि आज के नौजवान सवाल उठाते हैं. पूछते हैं कि सरकार ने उनके लिए क्या किया?

ये क़ानून लागू करने के लिए किम जोंग उन की सरकार ने अधिकारियों के दस्ते बनाए हैं. ये दस्ते लोगों के बीच जाते हैं. ऐसे लोगों को सख़्त सज़ा देते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वो समाजवाद के विरोधी हैं.
एक बार जी येओन से भी इस क़ानून के तहत पूछताछ की गई थी. उसके बाद से वो किसी पर भरोसा नहीं करतीं.
पिछले 40 साल से उत्तर कोरिया के बारे में स्टडी कर रहे प्रोफ़ेसर आंद्रेई लैंकोव इन हालात से बेहद चिंतित हैं.
वो कहते हैं कि, 'जब लोग एक दूसरे पर भरोसा ही नहीं करेंगे, तो विरोध की शुरुआत कहां से होगी. इसका मतलब है कि उत्तर कोरिया आने वाले कई बरसों और दशकों तक ऐसे ही बना रहेगा.'
इस साल जनवरी में किम जोंग उन की सरकार ने एक नया क़ानून बनाया है. इसमें लोगों के दक्षिण कोरिया की बोली वाले शब्द इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी गई है. गंभीर मामलों में ये क़ानून तोड़ने पर मौत की सज़ा भी हो सकती है.
जी येओन कहती हैं कि देश में इतने क़ानून हैं कि लोगों के लिए याद रख पाना मुश्किल है. कई बार जब लोगों को गिरफ़्तार किया जाता है, और वो पूछते हैं कि उन्होंने कौन सा क़ानून तोड़ा. तो, अधिकारी कहते हैं कि उनको ये जानने की ज़रूरत नहीं है. बस इतना समझ लें कि उन्होंने क़ानून तोड़ा है.
लिबर्टी इन नॉर्थ कोरिया संगठन, उत्तर कोरिया से भागने वालों की मदद करता है. इससे जुड़े सोकील पार्क कहते हैं कि, 'ऐसा लगता है कि उत्तर कोरिया में आज जितना दमन और तानाशाही है, वैसी पहले नहीं थी. इस वक़्त उत्तर कोरिया में भारी तबाही मची है.'
हाल के दिनों में ऐसे संकेत मिले हैं कि उत्तर कोरिया अपनी सीमाएं खोलने की तैयार कर रहा है. ज़्यादातर लोगों को कोरोना का टीका लग चुका है. वहीं, उत्तर कोरिया के कस्टम विभाग ने, चीन से अनाज और आटा आने की इजाज़त दे दी है. शायद इसका मक़सद खाने की किल्लत को दूर करना और अकाल की आशंका से बचना है.
हालांकि इस बात की उम्मीद कम ही है कि सीमाएं खुलने के बाद भी, उत्तर कोरिया की जनता को पहले जैसी आज़ादी हासिल हो पाएगी.
उत्तर कोरिया पर नज़र रखने वाला संगठन NK Pro चलाने वाले चाड ओ'कैरोल कहते हैं कि, 'नागरिकों को नियंत्रित करने के ये क़दम और सख़्त होंगे. इससे हमारे लिए वहां के हालात समझना और मुश्किल हो जाएगा. मगर अफ़सोस की बात तो ये है कि उत्तर कोरिया के लोगों के लिए ये पता लगाना तो और भी मुश्किल हो जाएगा कि उनके देश से बाहर क्या चल रहा है.'
वैसे इस बात के छोटे मोटे ही सही, मगर ऐसे संकेत दिख रहे हैं कि इन पाबंदियों का असर किम जोंग उन की तानाशाही हुकूमत पर भी पड़ेगा.
चान हो कहते हैं कि, अब लोगों ने सरकारी टीवी पर चल रहे प्रोपेगैंडा पर विश्वास करना बंद कर दिया है.
चान हो कहते हैं कि, 'सरकार हमें बताती है कि हम अपनी मां की गोद में हैं. लेकिन कौन सी मां होगी जो अपने बच्चे को इसलिए मार दे, क्योंकि भुखमरी से बचने के लिए वो चीन जाने की कोशिश कर रहा था?'
वहीं, म्योंग सुक कहती हैं कि, 'महामारी से पहले किम जोंग उन के बारे में लोग अच्छा सोचते थे. लेकिन, आज हर व्यक्ति नाख़ुश है.'

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जी येओन उन दिनों को याद करती हैं, जब 2018 में किम जोंग उन, अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप से मिले थे. वो अपने परमाणु हथियार नष्ट करने की बातचीत के लिए मिले थे. जी येओन कहते हैं कि वो ख़ुश थीं. उनके दिल में अरमान जग उठे थे कि अब ऐसा दिन क़रीब है, जब वो दूसरे देशों की यात्रा कर सकेंगी. मगर बातचीत नाकाम रही. उसके बाद से किम जोंग उन अपने देश की जो थोड़ी बहुत कमाई है, उसे नए नए परमाणु हथियार बनाने में लगा रहे हैं. 2022 में उत्तर कोरिया ने रिकॉर्ड संख्या में मिसाइल परीक्षण किए थे.
जी येओन कहती हैं कि, 'हमारे साथ धोखा हुआ. सीमाबंदी ने हमारी ज़िंदगियों को 20 साल पीछे धकेल दिया है. लोग नहीं चाहते कि हथियार बनाए जाएं. इससे पीढ़ी दर पीढ़ी ज़िंदगी मुश्किल में बीत रही है.'
चान हो इसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. वो कहते हैं कि, 'ऐसा लगता है कि संयुक्त राष्ट्र और अमरीका दोनों कमअक़्ल हैं.' जब ये बात साफ़ है कि किम अपने परमाणु हथियार नष्ट नहीं करेंगे. तो फिर उनसे बातचीत का क्या मतलब है?
चान हो चाहते हैं कि अमरीका उनके देश पर हमला कर दे. वो कहते हैं कि 'जंग हो और हमारे सारे नेता मारे जाएं. तभी हम बच सकते हैं.'
वो कहते हैं कि 'आर या पार. एक बार में फ़ैसला हो ही जाना चाहिए.' म्योंग सुक भी उनकी हां में हां मिलाती हैं.
हालांकि, जी येओन की ख़्वाहिश बहुत साधारण है. वो ऐसे समाज में रहना चाहती हैं, जहां लोग भूख से न मरें. जहां उनके पड़ोसी ज़िंदा हों और जहां लोगों को एक दूसरे की जासूसी न करनी पड़े. और, वो दिन में तीन बार चावल खाना चाहती हैं.
जब उनसे हमारी आख़िरी बातचीत हुई थी, तो उनके पास अपने बच्चे को खिलाने के लिए पर्याप्त खाना नहीं था.
हमने अपनी इस पड़ताल को उत्तर कोरिया की सरकार के सामने भी रखा. लंदन में उनके दूतावास के एक प्रतिनिधि ने कहा कि, 'आपने जो जानकारी जुटाई है, वो पूरी तरह से सही नहीं है. ये उत्तर कोरिया की सरकार के विरोधियों के फ़र्ज़ी बयानों पर आधारित है. उत्तर कोरिया ने हमेशा से ही अपनी जनता के हितों को प्राथमिकता दी है. यहां तक कि मुश्किल दौर में भी हम अपनी जनता की भलाई के लिए मज़बूती से डटे रहे हैं.'
इस प्रतिनिधि ने कहा कि, 'मुश्किल दौर और चुनौतियों के बावजूद, जनता की बेहतरी हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है.'
ये बातचीत जुटाने में हमारी मदद करने के लिए बीबीसी, ली सैंग-योंग और डेली एनके की टीम का शुक्रिया अदा करता है. हम अपनी इस पड़ताल के दौरान जुटाए गए तथ्यों की तस्दीक़ करने और उत्तर कोरिया में ली गई तस्वीरें देने के लिए, चुंग स्यूंग-येओन और एनके न्यूज़ की टीम को भी धन्यवाद देना चाहेंगे.
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