बहरीन, सऊदी अरब और फिर तुर्की, रूस के विदेश मंत्री आख़िर किस मिशन पर हैं

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख़ अब्दुल्लाह बिन ज़ायेद अल नाहयान

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इमेज कैप्शन, पांचवें गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल की मीटिंग के दौरान रियाद में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख़ अब्दुल्लाह बिन ज़ायेद अल नाहयान

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की मंगलवार को रियाद में सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फरहान अल-सऊद से मुलाक़ात के बाद सबकी नज़रें अब ओपेक प्लस देशों के समूह पर टिकी हुई हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, रूस के विदेश मंत्रालय ने इस मुलाक़ात पर कहा है कि दोनों नेता ओपेक प्लस देशों के समूह के बीच सहयोग के स्तर को लेकर खुश हैं.

लेकिन इस बयान से पहले पश्चिमी मीडिया में ऐसी रिपोर्टें प्रकाशित हुई थीं कि ओपेक प्लस देशों के समूह के कुछ सदस्य देश और ओपेक के कुछ देश भी रूस को इस ग्रुप से बाहर करने पर विचार कर रहे हैं. ऐसे में रूसी विदेश मंत्रालय के बयान की अहमियत समझी जा सकती है.

लावरोव और फ़ैसल बिन फरहान अल-सऊद की इस मुलाक़ात से ठीक पहले यूरोपीय संघ में रूस से तेल खरीदने में बड़ी कटौती की योजना पर सहमति बनने की रिपोर्टें आई थीं.

यूरोपीय संघ का ये कदम यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर लगाई गई पाबंदियों को और सख़्त करने से जुड़ा है.

रूस के विदेश मंत्रालय ने कहा, "दोनों नेताओं ने इस बात को समझा कि रणनीतिक रूप से इस महत्वपूर्ण सेक्टर में रूस और सऊदी अरब के बीच मज़बूत सहयोग से तेल और गैस के ग्लोबल मार्केट में स्थिरता आई है."

सऊदी अरब की तरफ़ से इस मसले पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. लावरोव मंगलवार को सऊदी अरब पहुंचे थे और सऊदी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के अन्य सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों से उनकी मुलाक़ात हो सकती है. बुधवार को रियाद में उनकी मुलाकात संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख़ अब्दुल्लाह बिन ज़ायेद अल नाहयान से हुई है.

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ओपेक प्लस की भूमिका

तेल उत्पादन के मामले में ओपेक प्लस अपनी उस पुरानी योजना पर कायम है जिस पर पिछले साल दो जून को हुई बैठक में सहमति बनी थी. इस समझौते में ये तय हुआ था कि जुलाई से तेल उत्पादन 432,000 बैरल प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ा दिया जाएगा.

इस बीच वियना में ओपेक प्लस देशों की बैठक होनी है जिसमें माना जा रहा है कि ये देश पिछले साल के समझौते पर कायम रहेंगे.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि ओपेक प्लस देशों ने पश्चिमी देशों की उस अपील को ख़ारिज़ कर दिया है जिसमें तेल की बढ़ती क़ीमतों को कम करने के लिए तेज़ी से उत्पादन बढ़ाने की सलाह दी गई थी.

ओपेक प्लस देशों के समूह का गठन साल 2016 में तेल बाज़ार में मांग और आपूर्ति के संतुलन को स्थिर रखने के लिए किया गया था. ये समूह सदस्य देशों को स्थितियों के हिसाब से उत्पाद बढ़ाने या घटाने के लिए कहता है. सोवियत संघ के कुछ पुराने घटक देशों के साथ रूस इस समूह का एक प्रमुख सदस्य है.

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने ओपेक से जुड़े लोगों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ओपेक प्लस से रूस को बाहर करने पर दूसरे सदस्य देशों के लिए अपना उत्पादन बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है जैसा कि अमेरिका और यूरोपीय देश चाहते हैं.

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यूक्रेन पर रूस का हमला

बीबीसी की अरबी सेवा के मुताबिक़, सऊदी अरब ने सर्गेई लावरोव को ये भरोसा दिलाया है कि यूक्रेन संकट का राजनीतिक हल निकालने के लिए वो मदद देने को तैयार है. सऊदी अरब ने रूस को मध्यस्थता की पेशकश भी की है.

सऊदी अरब की ओर से ये बयान फ़ैसल बिन फरहान अल-सऊद के साथ सर्गेई लावरोव की मुलाक़ात के बाद आया है.

यूक्रेन के मुद्दे पर फ़ैसल बिन फरहान अल-सऊद ने ये बात ज़ोर देकर कही है कि यूक्रेन संकट पर सऊदी अरब का स्टैंड अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के अनुसार है.

उन्होंने कहा, "इन कोशिशों के लिए सऊदी अरब के समर्थन का मक़सद राजनीतिक हल तलाशना है ताकि संकट ख़त्म किया जा सके और सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित हो पाए. इस संकट के राजनीतिक हल के लिए सऊदी अरब ज़रूरी कोशिश करने के लिए तैयार है."

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खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर रूस पर बढ़ता दबाव

यूक्रेन पर हमले की वजह से रूस न केवल ओपेक के मोर्चे पर उलझा हुआ है बल्कि उसे दुनिया को खाद्य संकट की ओर धकेलने के आरोपों का भी सामना करना पड़ रहा है.

समाचार एजेंसी एएफ़पी की रिपोर्ट के अनुसार, सर्गेई लावरोव ने मंगलवार को कहा कि इस मुद्दे का हल निकालने का दारोमदार यूक्रेन और पश्चिमी देशों पर है.

यूक्रेन पर रूस के हमले और पश्चिमी देशों की पाबंदियों के कारण इन दोनों देशों से गेहूं और दूसरी ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति प्रभावित हुई है. इस वजह से दुनिया के सामने खाद्य संकट पैदा होने का जोख़िम पैदा हो गया है.

सर्गेई लावरोव ने इस मुद्दे पर रूस का पक्ष रखते हुए बहरीन में कहा था, "पश्चिमी देशों ने रूसी जहाजों के लिए अपने बंदरगाह बंद करके ये समस्या कृत्रिम रूप से पैदा की है. इससे सप्लाई चेन और वित्तीय लेनदेन का नेटवर्क बाधित हो गया है." सऊदी अरब से पहले लावरोव बहरीन गए थे.

उन्होंने आगे कहा था, "उन्हें इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है कि उनके लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है. वे खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर पीआर (जनसंपर्क अभियान चलाना) करना चाहते हैं या फिर इस समस्या का हल निकालने के लिए ठोस कदम उठाना चाहते हैं."

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लावरोव ने यूक्रेन से भी अपील की कि वो अपने तटवर्ती इलाक़ों में बिछाई गई बारूदी सुरंगे हटा दे ताकि काला सागर और एज़ोव सागर के रास्ते जहाजों का सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित हो सके.

उन्होंने कहा, "अगर बारूदी सुरंगें हटा ली जाएं तो... रूस की नौसेना इस बात को सुनिश्चित करेगी कि ये जहाज भूमध्यसागर के रास्ते अपनी मंज़िलों की ओर बेरोकटोक आ जा सके."

रूस और यूक्रेन दुनिया में गेहूं की आपूर्ति का 30 फ़ीसदी उत्पादन करते हैं. सोमवार को रूस के राष्ट्रपति पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के बीच इसी मुद्दे पर बात हुई.

पुतिन ने कहा कि पश्चिमी देशों की संकीर्ण नज़रिये की वजह से वैश्विक खाद्य संकट जैसी स्थिति पैदा हुई है और रूस समुद्र के रास्ते होने वाले कारोबार को आज़ाद कराने के लिए तुर्की के साथ काम करने को तैयार है.

सर्गेई लावरोव की आने वाले दिनों में तुर्की जाने की भी योजना है. समाचार एजेंसी एएफ़पी की रिपोर्ट के अनुसार वे 8 जून को तुर्की जाने वाले हैं.

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