आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंकः संकट में याद आने वाली संस्थाओं पर किसका वर्चस्व?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इस साल वर्ल्ड बैंक और उसकी सहयोगी संस्था, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की 75वीं वर्षगांठ है. इनकी स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से 'ब्रेटन वुड्स सम्मेलन' में की गई थी.

कर्ज़ देने वाले इन बैंकों पर ग़रीब देशों को क़र्ज़दार बनाने, इन देशों में आर्थिक सुधार और उदारीकरण लाने के बहाने पश्चिमी देशों के लिए फ़ायदेमंद बनाने का आरोप शुरू से ही लगता रहा है.

दिलचस्प बात ये है कि अमेरिका और यूरोप के बीच एक अनौपचारिक समझौता है कि आईएमएफ़ का अध्यक्ष हमेशा यूरोप का होगा जबकि वर्ल्ड बैंक का प्रमुख हमेशा अमेरिकी होगा.

भारत को भी इन संस्थाओं की ज़रूरत पड़ती रहती है. मिसाल के तौर पर, 1991 के भयानक आर्थिक संकट से भारत आईएमएफ़ की ही मदद से बाहर निकला था.

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़, इस समय भारत के कई राज्यों में उसकी मदद से 127 परियोजनाओं पर काम चल रहा है जिनकी कुल लागत 28 अरब डॉलर है जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक प्रतिशत के बराबर है.

अमेरिका सब पर हावी

कई विकासशील देशों का कहना है कि केवल वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ ही नहीं, बल्कि अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ ज़्यादातर वैश्विक वित्तीय संस्थानों पर हावी है.

मसलन, स्विफ़्ट या सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशंस पर इसका पूर्ण प्रभुत्व है. माना जा रहा है कि उसने अमेरिका के दबाव में आकर एक झटके में यूक्रेन पर हमले के बाद रूस की सदस्यता स्थगित कर दी, स्विफ़्ट एक सहकारी संस्था है जो अपने प्रतिनिधियों के लिए सुरक्षित वेल्थ ट्रांसफर की सुविधा देती है.

दिल्ली में फ़ोर स्कूल के अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद कहते हैं, "स्विफ़्ट के तहत विश्व स्तर पर डॉलर के सभी लेन-देन को अमेरिका से होकर गुज़रना पड़ता है, और यह अमेरिका को अधिकार देता है कि वह किसी भी देश के लेन-देन को एकतरफा रूप से फ्रीज़ कर सके. अमेरिका ने अक्सर इस ताक़त का इस्तेमाल देशों पर प्रतिबंध लगाने के लिए किया है. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर ताज़ा प्रतिबंध इसका एक उदाहरण है. इससे बचने का एक तरीक़ा ये है कि देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करना शुरू कर दें."

रूस के 'एसपीएफएस' और चीन के 'सीआईपीएस' स्विफ़्ट के दो विकल्प हैं, लेकिन फ़िलहाल इनका दायरा बहुत सीमित है.

डब्ल्यूटीओ का गठन

इसके अलावा ग़रीब देश कहते हैं कि पश्चिमी देशों ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों और नीतियों को भी अपने फ़ायदे के लिए तैयार किया है.

डॉ फ़ैसल अहमद कहते हैं, "अगर हम डब्ल्यूटीओ को भी देखें, तो हम पाते हैं कि विश्व व्यापार संगठन के पास मतदान शक्ति की प्रणाली नहीं है, फिर भी अन्य तंत्र हैं जिनके माध्यम से अमेरिका ने बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली में अनुचित प्रभाव डाला है, मसलन, पिछले कुछ वर्षों में, ट्रंप प्रशासन के दौरान, अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन के अपीलीय निकाय (एबी) में न्यायाधीशों की नियुक्ति पर रोक लगा दी थी. डब्ल्यूटीओ विवाद निपटान प्रणाली में एबी अपील का सर्वोच्च निकाय है. न्यायाधीशों की नियुक्ति को अवरुद्ध करने के कारण, वर्तमान में एबी कार्य नहीं कर रहा है क्योंकि मामले की सुनवाई के लिए न्यायाधीश नहीं हैं."

डब्ल्यूटीओ का गठन 1995 में टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौते (गैट) को बदलने के लिए किया गया था, जिसे 1948 में शुरू किया गया था.

गैट को डब्ल्यूटीओ में बदलने की वजह ये थी कि गैट के ख़िलाफ़ शिकायत थी कि ये विकसित देशों के पक्ष में फ़ैसले करता था.

यूक्रेन को तुरंत बिना शर्त कर्ज़ मिला

इन वित्तीय संस्थाओं पर दशकों से जारी अमेरिका और इसके सहयोगी पश्चिमी देशों का प्रभाव आज भी जारी है. इन संस्थाओं पर उन्हीं की चलती है. इसकी एक झलक यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद मार्च के पहले हफ़्ते में देखने को मिली जब अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों की पहल पर वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ ने यूक्रेन को बिना शर्त के वित्तीय सहायता देने की घोषणा की.

यूक्रेन को सहायता पर किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन कुछ लोग पूछ रहे हैं कि 2003 में इराक़ पर अमेरिकी हमले से हुई तबाही के बाद ये संस्थाएं तुरंत आगे क्यों नहीं आईं.

विश्व बैंक यूक्रेन को तीन अरब डॉलर का वित्तीय पैकेज दे रहा है, जबकि आईएमएफ़ 1.4 अरब डॉलर का कर्ज़ देने जा रहा है. मार्च में आईएमएफ़, विश्व बैंक और तीन यूरोपीय बैंकों के प्रमुखों की एक आपातकालीन बैठक के बाद एक संयुक्त बयान में कहा गया कि यूक्रेन की मदद इन बैंकों की प्राथमिकता होगी, "हम यूक्रेन और उसके पड़ोसियों की सहायता करने के लिए मिलकर काम करने के महत्व को स्वीकार करते हैं. हम इस विशाल चुनौती को अंतरराष्ट्रीय सहयोग और एकजुटता को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."

वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली के पुनर्निर्माण के इरादे से की गई थी.

लेकिन इन संस्थाओं के कई ग़रीब सदस्य देश कहते हैं कि दोनों संस्थानों की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर प्रमुख निर्णय अमेरिका और कुछ हद तक ब्रिटेन ने लिए थे. उस समय बैंक और फंड की स्थापना को एक गैर-राजनीतिक प्रयास के रूप में देखा गया था, मगर एशिया और अफ्रीका में धारणा बनने लगी कि ग़रीब देशों को कर्ज़ देने वाले इन दोनों बैंकों को असल में पश्चिमी देशों, ख़ासकर अमेरिकी हितों को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

'आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक को बंद करो' का नारा

'आईएमएफ़ और विश्व बैंक को बंद करो, जनता की आवाज को नहीं', यह नारा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में गूंजता रहता है. 13 अक्टूबर, 2018 को इंडोनेशिया के बाली प्रांत में सिविल सोसाइटी और मानवाधिकार संगठनों का एक विशाल सम्मेलन हुआ था जहाँ इस नारे को अपनाया गया था.

इस सम्मेलन में मनीला-स्थित अइबोन इंटरनेशनल नाम की सामाजिक संस्था ने भाग लिया था. इसके प्रवक्ता रुडोल्फो लाहोय ने बीबीसी हिंदी से एक बातचीत में कहा, "सम्मेलन से मुख्य निष्कर्ष ये निकला था कि विश्व बैंक और आईएमएफ़ का दृष्टिकोण निजी हितों की सुविधा के लिए हमारे लोगों के अधिकारों के खिलाफ़ विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर कॉर्पोरेट का क़ब्ज़ा करना है."

वो आगे कहते हैं, "वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ पर शक्ति और प्रभाव में अमेरिका की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है. उदाहरण के लिए, सिर्फ़ आईएमएफ़ में अमेरिका के पास आपके देश भारत की 2.63 फ़ीसदी हिस्सेदारी की तुलना में 16 फीसदी वोटिंग पावर है, तो वास्तव में पश्चिमी वर्चस्व, विशेष रूप से अमेरिका का, हमारे लिए एक बड़ा मुद्दा है."

"हम अपने देशों में आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक में अमेरिका के असर को साफ़ महसूस करते हैं. ये बैंक बड़े व्यापार के लिए हमारे देशों में द्वार खोलने और निवेश करने पर ज़ोर देते हैं. यह हमारे देशों में हमारे लोगों के अधिकारों और जरूरतों की कीमत पर पश्चिमी देशों की कंपनियों के मुनाफ़े के लिए काम करते हैं. उदाहरण के लिए हमारे देश फिलीपींस में 1970 के दशक में अमेरिका के नेतृत्व वाले वर्ल्ड बैंक ने चिको बांध परियोजना का भारी समर्थन किया था. इस परियोजना के कारण पास की पूरी आबादी के डूबने का ख़तरा था. इसका हिंसक विरोध किया गया और अंततः इसे ख़ारिज कर दिया गया. इसी तरह से फिलीपींस में चावल उद्योग को उदार बनाने में विश्व बैंक का समर्थन प्राप्त है - हमारे देश को अधिक चावल से भरने की कोशिश है जिससे स्थानीय चावल उद्योग को ख़तरा है, इसके लिए हमारे देश को 370 मिलियन डॉलर दिए गए हैं."

क्या ज़्यादा पैसा लगाना तर्क?

अमेरिका के जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर देवेश कपूर आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं और उन्हें वर्ल्ड बैंक पर लिखी एक प्रसिद्ध किताब के लिए भी जाना जाता है.

उनके मुताबिक़ अमीर देशों का एक तर्क हो सकता है कि इन संस्थाओं में अधिक पैसा वो लगाते हैं तो चलनी भी उन्हीं की चाहिए.

वाशिंगटन से बीबीसी हिंदी से बातें करते हुए वो कहते हैं, "आपको (पावर का) एक बड़ा हिस्सा मिला है क्योंकि आपने अधिक संसाधन लगाए हैं, समय के साथ पश्चिमी देशों के संसाधन कम हुए हैं लेकिन वो अब भी प्रभावशाली हैं."

प्रोफ़ेसर कपूर का तर्क ये है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रभाव अधिकांश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर है. "सच तो ये कि ये केवल आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक के लिए ही सही नहीं है, अधिकांश संस्थाओं का यही सच है. ये कभी-कभी देशों के बीच राजनीतिक सौदेबाज़ी और कभी-कभी देश की आंतरिक राजनीति का परिणाम होते हैं."

आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक के प्रमुखों के चयन पर भी विकासशील देश अक्सर सवाल उठाते रहे हैं. दस साल पहले, उस समय के आईएमएफ़ के मैनेजिंग डायरेक्टर डोमिनिक स्ट्रॉस-कान पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था.

बैंक में ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के अधिकारियों ने अगले मैनेजिंग डायरेक्टर को विकासशील देश से होने का आह्वान किया, लेकिन यूरोपीय सरकारों ने इसका विरोध किया.

उन्होंने कहा कि परंपरा के अनुसार अगला निदेशक यूरोपीय होना चाहिए, और ऐसा ही हुआ.

प्रोफ़ेसर देवेश कपूर कहते हैं कि मेरिट को तरजीह नहीं दी जाती, वो कहते हैं, "ऐसा लगभग कभी नहीं होता है कि चयन करने वाला पैनल ये कहे कि इस नौकरी के लिए कौन सबसे अच्छा उम्मीदवार है और ये कि उम्मीदवार की राष्ट्रीयता मायने नहीं रखती."

जब प्रोफ़ेसर कपूर वर्ल्ड बैंक पर किताब लिख रहे थे तो उस समय बैंक और फंड की 50वीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी. उस समय भी इन बैंकों के ख़िलाफ़ एक नारा दिया गया था, "50 इयर्स इज़ एनफ़". उस समय ही दोनों संस्थाओं के काम करने के अंदाज़ और उनकी पॉलिसियों पर सवाल उठाये गए थे. अमेरिका के ज़रुरत से ज़्यादा असर पर भी सवाल किये गए थे.

अधिकतर आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि इन संस्थाों में सुधार ज़रूरी है.

प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद कहते हैं, "आईएमएफ़ एक कोटा आधारित संगठन है. 2010 में आईएमएफ़ कोटा और गवर्नेंस रिफॉर्म के लिए एक प्रस्ताव रखा गया था. जी-20 के तीव्र दबाव के कारण अमेरिका ने 2015-16 में इसकी पुष्टि की. इस सुधार का उद्देश्य आईएमएफ़ में सदस्य देशों के कोटा और मतदान शक्ति को दोबारा संतुलित करना था, और इस प्रकार इसने कई विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के कोटा और मतदान शक्ति में वृद्धि की, इस प्रकार उन्हें वैश्विक आर्थिक शासन में एक बड़ा स्थान दिया. हालाँकि, यह अभी भी विकासशील देशों के लिए पर्याप्त नहीं है."

मनीला से रुडोल्फो लाहोय का तर्क है कि इन्हें बंद कर देना चाहिए. इनका जो हमारे पास इतिहास है, उसे देखते हुए फिलीपींस में 'कॉल टू शटडाउन' लंबे समय से चल रहा है. इन संस्थानों में सुधार केवल इतना ही हो सकता है, कई ने कोशिश की है लेकिन इन संस्थानों की प्रकृति को बदले बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते. इन संस्थानों को बंद करना अधिक उचित है."

हालांकि, कई ग़रीब देशों की सरकारें इससे सहमत नहीं होंगी. पाकिस्तान हो या श्रीलंका, इन्हें वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की मदद की ज़रुरत जल्द पड़ सकती है.

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