मोदी के आत्मनिर्भर भारत का सपना कितना हक़ीक़त बन सकता है?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दशकों बाद भारत की अर्थव्यवस्था मंदी में है. लेकिन भारत सरकार इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी. हालाँकि, अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने इसकी घोषणा कर दी है.

बुधवार को आईएमएफ़ ने कहा कि साल 2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था 4.5 प्रतिशत की नकारात्मक वृद्धि दर्ज करेगी. इसका ऐलान आईएमएफ़ की अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने वॉशिंगटन में विश्व आर्थिक आउटलुक अपडेट जारी करते हुए की. इससे पहले अप्रैल के अपडेट में आईएमएफ़ ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर शून्य प्रतिशत होने का अनुमान लगाया था

गीता गोपीनाथ ने भारतीय अर्थव्यवस्था की इस दशा की वजह बताते हुए कहा कि कोरोना वायरस के कारण लागू किए गए लॉकडाउन की अवधि लंबी है और दूसरा कारण है कि महामारी अब भी जारी है जिसका अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ेगा ही.

आईएमएफ़ ने बुरी ख़बर दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को भी दी. इसके अनुसार वैश्विक अर्थव्यवस्था -4.9 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी. चीन की अर्थव्यवस्था केवल एक प्रतिशत के हिसाब से बढ़ेगी.

लेकिन आईएमएफ़ की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, 2021 भारत के लिए अच्छा साल होगा जब इसकी विकास दर 6 प्रतिशत होगी. चीन की अर्थव्यवस्था 8.2 प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ती हुई सबसे आगे रहेगी.

सरकार इससे कैसे निपटेगी?

अंग्रेज़ी में एक कहावत है- Desperate Times Call for Desperate Measures अर्थात मुश्किल घड़ी में मुश्किल फ़ैसले लेने पड़ते हैं. भारत में बुधवार 25 जून को लगातार 19वें दिन ईंधन की कीमतें बढ़ाई गईं. ये सरकार के ख़ज़ाने में तुरंत पैसे बढ़ाने का सबसे आसान और सीधा तरीक़ा है.

अर्थशास्त्रियों के अनुसार पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ने का कारण है सरकार की गिरती कमाई को रोकना ताकि इसका राजकोषीय घाटा कम हो सके.

ये तो केवल शुरुआत है. विशेषज्ञ कहते हैं न केवल पेट्रोल और डीज़ल के दाम आगे भी बढ़ते रहेंगे बल्कि सरकार आने वाले दो-तीन सालों में लगातार आय कर और जीएसटी बढ़ाएगी. ये देश के मध्यम वर्ग और वेतनभोगी लोगों के बीच बेहद अलोकप्रिय साबित हो सकता है.

वित्त वर्ष 2021 के लिए भारत का राजकोषीय घाटा (सरकार का ख़र्च उसकी आय से अधिक है) 3.8 प्रतिशत होने का अनुमान है जो 5 प्रतिशत तक भी पहुँच सकता है क्योंकि आने वाली तिमाहियों में सरकारी ख़र्च बढ़ने और कमाई घटने की पूरी संभावना है.

भारत की अर्थव्यवस्था बड़े संकट की तरफ़ जा रही है?

स्विट्ज़रलैंड स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट डवलपमेंट (आईएमडी) हर साल दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं की प्रतिस्पर्धा की रैंक जारी करता है.

आईएमडी ने मंगलवार को जारी अपने नवीनतम सर्वेक्षण में भारत 43वें स्थान पर बना हुआ है. अमरीका और चीन, दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ, आपसी व्यापार युद्ध के कारण इस रैंकिंग में पायदान से नीचे गिरीं.

आईएमडी रैंकिंग रोज़गार, जीवन स्तर और सरकारी ख़र्च सहित सैकड़ों कारणों पर आधारित होती है और इस साल इसने 63 अर्थव्यवस्थाओं को इसमें शामिल किया था.

अर्थशास्त्रियों के लिए ये सर्वेक्षण रिपोर्ट भले ही अधिक अहमियत न रखती हो, लेकिन क्या मोदी सरकार के लिए ये महत्वपूर्ण है? शायद हाँ, क्योंकि सरकार अक्सर पश्चिम में स्थित कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा रिपोर्ट को महत्व देती है बशर्ते कि रिपोर्ट सकारात्मक हो.

तो क्या सरकार को ख़ुश होना चाहिए कि उसकी रैंकिंग में बदलाव नहीं हुआ, जिसका मतलब है कि उसकी अर्थव्यवस्था ठीक रास्ते पर चल रही है? या ये दुखद है कि इसकी रैंकिंग पिछले साल की तुलना में ऊपर नहीं गई?

लेकिन सरकार को हाल की अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्ट पर शायद अधिक चिंता हो. उदाहरण के लिए, विश्व बैंक की 8 जून की एक रिपोर्ट, जिसने चालू वर्ष में प्रति व्यक्ति आय में 3.6 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया है.

इसके मुताबिक़, "इस साल लाखों लोग अत्यधिक ग़रीबी का शिकार होंगे." विश्व बैंक समूह के उपाध्यक्ष सेला पेज़रबाशियालू ने कहा, "यह एक चिंताजनक बात है, क्योंकि इस संकट (कोरोना महामारी) का असर लंबे समय तक रहेगा और हमें वैश्विक स्तर पर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा."

इसी तरह पिछले महीने, रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने भारत की रेटिंग को घटा दिया. इसका तर्क ये था कि भारत की विकास दर एक लंबे समय तक के लिए कम रहेगी, सरकार की राजकोषीय स्थिति बिगड़ेगी और इसके वित्तीय क्षेत्र में अनिश्चितता बनी रहेगी.

अप्रैल में, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर, शक्तिकांत दास ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अर्थव्यवस्था का एक गंभीर दृष्टिकोण लिया था और स्वीकार किया था कि 2020-21 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि नकारात्मक रहने की उम्मीद है.

आगे और भी झटके लग सकते हैं. भारत की आर्थिक विकास दर के लिए रेटिंग एजेंसी इक्रा का प्रोजेक्शन मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में -16 प्रतिशत और -20 प्रतिशत के बीच है.

आत्मनिर्भरता को लक्ष्य बनाना कितना सही?

भारत सरकार यह तर्क दे सकती है कि विश्व बैंक और रेटिंग एजेंसियाँ स्थिति को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को आश्वस्त कर चुके हैं कि अर्थव्यवस्था के मूल तत्व मज़बूत हैं और इसलिए भारत किसी बड़े नुक़सान के बिना कोरोना से पैदा हुए आर्थिक संकट से बाहर निकल जाएगा. इसे प्राप्त करने के लिए पीएम मोदी पिछले महीने से लगातार कई बार अपने भाषणों में आत्मनिर्भरता पर ख़ासतौर से ज़ोर दे रहे हैं.

ये कहना मुश्किल है कि यह राजनीतिक बयानबाज़ी है या वास्तविक नीतिगत बदलाव. लेकिन अब तक जो संकेत मिले हैं, उससे ये पॉलिसी परिवर्तन ही लगता है.

अर्थशास्त्रियों और विदेशी निवेशकों की इस पर अब तक टिप्पणियाँ नकारात्मक और निराशाजनक हैं.

'बैड मनी' सहित कई पुस्तकों के लेखक और अर्थशास्त्री विवेक कौल इसे चिंताजनक मानते हैं.

वो कहते हैं, "जिस तरह से आत्मनिर्भरता को लागू करने की बात की जा रही है, ये तय है कि आयात की जाने चीज़ों पर अधिक से अधिक टैरिफ़ (आयातों पर) बढ़ाते जाएँगे और इसका सीधा अर्थ होगा कि भारतीय ग्राहकों को भारतीय उत्पाद ख़रीदने के लिए मजबूर किया जाएगा. दूसरी तरफ़ ये कहा जा रहा है कि भारतीय कंपनियों को निर्यात बढ़ाना होगा और इन्हें सप्लाई चेन का हिस्सा बनना पड़ेगा. लेकिन प्रतियोगिता के अभाव में आप वैश्विक सप्लाई चैन का हिस्सा कैसे बन सकते हैं? और अगर आप भारतीय मार्किट में प्रतियोगी नहीं हैं तो वैश्विक मार्किट में कॉम्पिटिटिव कैसे हो सकते हैं?"

जिनेवा इंस्टीट्यूट ऑफ जिओपॉलिटिकल स्टडीज़ (जीआईजीएस) के अकादमिक निदेशक प्रो अलेक्जेंडर लैंबर्ट कहते हैं कि अगर भारत आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहता है तो उसे अपने औद्योगिक आधार को मज़बूत करने के लिए एक विशाल और आधुनिक बुनियादी ढाँचा तैयार करना होगा.

वो कहते हैं, "आपको अगर आत्मनिर्भरता हासिल करनी है तो औद्योगिक आधार ज़बरदस्त होना चाहिए. आपकी घरेलू खपत उचित हो. इसके अलावा निर्यात के लिए आपकी अतिरिक्त मूल्य वाली वस्तुएँ मज़बूत होनी चाहिए तो आत्मनिर्भरता कम करती हैं."

लेकिन विवेक कौल को डर है कि अगर आत्मनिर्भरता का मतलब संरक्षणवाद है तो भारत को बहुत सारी समस्याएँ होंगी.

विवेक कौल कहते हैं, "अब अगर आपको निश्चित रूप से याद है 1991 से पहले वाला भारत, जब हमारी अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरता पर आधारित थी और जब चीज़ें भारत में ही बनती थीं तो हमें कितनी समस्याएँ होती थीं. केवल जब अर्थव्यवस्था खुली तो हमने तेज़ी से तरक़्क़ी करनी शुरू की. हमें ये सीख याद रखनी चाहिए."

फिर कैसे बनेगा आत्मनिर्भर भारत

लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रियरंजन दास का मानना है कि अगर इसे गंभीरता से और बिना किसी राजनीतिक बयानबाज़ी के लागू किया जाए, तो आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है.

वो कहते हैं, "भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश और उद्यमशीलता की ताक़त के बलबूते पर आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है. आत्मनिर्भरता पाने के लिए एक मज़बूत आर्थिक रणनीति होनी चाहिए, सियासी बयानबाज़ी कोई विकल्प नहीं है. अब तक जो नीतियाँ सामने आई हैं, वो विकास की गारंटी नहीं हैं."

वो आगे कहते हैं, "घरेलू बाज़ार का विस्तार, छोटे उपभोक्ताओं के बीच बढ़ती डिमांड और निवेश की मांग एक कारगर विकास रणनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं."

लेकिन प्रियरंजन दास मोदी के नेतृत्व पर भरोसा नहीं करते हैं. वो कहते हैं, "मोदी सरकार पर ये विश्वास नहीं है कि वो ये काम अंजाम दे सकेगी."

मोदी सरकार का आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने का फ़ैसला इस तथ्य पर आधारित है कि एक समय भारत गेहूँ और चावल तक का आयात किया करता था, लेकिन अब देश के अन्न भंडार अनाज से भरे पड़े हैं. जेनेरिक दवाओं का भी यही हाल है.

आर्थिक अक्षमता

लेकिन मार्किट गुरु अजीत दयाल ने हाल ही में एक भारतीय अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि मोदी सरकार में आर्थिक क्षमता की कमी है.

वो लिखते हैं, "अफ़सोस की बात है कि मोदी सरकार ने आर्थिक मामलों से निपटने के दौरान अपनी अनुभवहीनता और अक्षमता साबित कर दी है. चुनाव जीतने और राज्य सरकारों को गिराने में उनकी महारत अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है. इससे इसे सामाजिक शक्ति और उसकी धार्मिक सोच हावी हो सकती है. ये ग़रीबों और मध्यम वर्ग के लोगों के पेट नहीं भर सकती."

विशेषज्ञ उदाहरण के साथ मानते हैं कि चार घंटे के नोटिस के साथ 24 मार्च की मध्यरात्रि से लॉकडाउन का फ़ैसला, ठीक 2016 में अचानक नोटबंदी लागू करने की तरह लापरवाही भरा रहा है. भारत में निवेश करने वाली विदेशी कंपनियों को ये नज़र आया होगा कि किस तरह लॉकडाउन के दौरान लाखों लाचार मज़दूर सड़कों पर निकल आए और सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय करके अपने घरों को निकल पड़े.

दयाल कहते हैं कि केवल पाँच प्रतिशत कंपनियों के पास छह महीने तक वेतन देने के लिए पैसा है. आने वाली तिमाहियों में लाखों मज़दूर बेरोज़गारी का शिकार होंगे और जिन लोगों को अत्यधिक ग़रीबी से निकाला गया था, वो उसी ग़रीबी में लौट चुके होंगे.

आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश मंदी की तरफ़ जा रहा है. सच तो ये है कि कोरोना महामारी के पहले से ही भारत की पिछले तीन दशकों की कामयाब अर्थव्यवस्था की रफ़्तार तेज़ी से धीमी होने लगी थी.

विशेषज्ञ इसका मुख्य कारण प्रधानमंत्री की 2016 में नोटबंदी की अचानक घोषणा और जीएसटी को जल्दबाज़ी में लागू करना बताते हैं. लेकिन आईएमएफ़ के अनुसार कोरोना के बाद दूसरे देशों की तरह भारत भी बुरी तरह से प्रभावित होगा इसकी अर्थव्यवस्था काफ़ी हद तक सिकुड़ जाएगी.

करोड़ों लोग ग़रीबी की तरफ़ लौट रहे हैं

कोरोना महामारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भारतीय अर्थव्यवस्था को 2024-25 तक 5 खरब डॉलर बनाने के सपने को भी खटाई में डाल दिया है.

दरअसल, 2016 के बाद से जब चीज़ें ग़लत होने लगीं, उसके पहले तक भारत का करोड़ों लोगों को अत्यधिक ग़रीबी से निकालने का रिकॉर्ड रहा है.

वर्ष 2005 और 2016 के बीच कुछ 27 करोड़ लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाला गया था. विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, "2011 और 2015 के बीच, 9 करोड़ से अधिक लोग अत्यधिक ग़रीबी से बच गए और मज़बूत आर्थिक विकास की बदौलत उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ."

इसमें कोई संदेह नहीं कि ये उम्दा रिकॉर्ड केवल अर्धसत्य था. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ 36 करोड़ से अधिक भारतीय अब भी ग़रीबी की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं.

आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने अप्रैल में शायद सच कहा था कि "मानवता इस समय सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है."

लेकिन अर्थशास्त्रियों के बीच एक भावना है कि उन्होंने जो क़दम उठाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने जो आर्थिक घोषणाएँ की थीं वो एक बड़ी निराशा थीं.

'20 लाख करोड़ रुपए' के आर्थिक पैकेज ने अधिकतर सप्लाई साइड को मज़बूत किया. शायद सरकार की सोच ये होगी कि अब जबकि अर्थव्यवस्था दोबारा खुल रही है, लोगों और कंपनियों को क़र्ज़ों की ज़रूरत होगी, इसलिए सरकार ने इस पैकेज के तहत बैंकिंग और क़र्ज़ देने वाली संस्थाओं में नक़दी बढ़ाई.

लेकिन इस आर्थिक पैकेज ने सीधे उपभोक्ताओं के हाथों में नक़दी पैसे देने से परहेज़ किया. प्रधानमंत्री के पैकेज की घोषणा को पाँच हफ़्ते से ज़्यादा हो गए हैं लेकिन डिमांड अब भी बढ़ नहीं रही है और बग़ैर डिमांड के अर्थव्यवस्था की हालत नहीं सुधर सकती.

मोदी सरकार की कंजूसी

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि संकट से निपटने में आर्थिक रूप से मोदी बेहद रूढ़िवादी साबित हुए. उनका मानना है कि एक अभूतपूर्व संकट के समय अभूतपूर्व उपायों की ज़रूरत थी.

लोगों के हाथों में नकदी डालने के बजाय, प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों पर अधिक नज़र रखी. सरकार अपनी औक़ात से अधिक पैसे ख़र्च करे, तो रेटिंग एजेंसियाँ ऐसी अर्थव्यवस्थाओं की रेटिंग घटा देती हैं जिसके कारण ऐसे देशों को वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ जैसी संस्थाओं से महंगे ब्याज़ दर पर क़र्ज़ मिलते हैं.

अजीत दयाल ने सुझाव दिया कि सरकार को जीडीपी का चार प्रतिशत (9 लाख करोड़ रुपए) ख़र्च करने की ज़रूरत है, जो छह महीने के लिए 10,000 रुपए प्रति माह सबसे अधिक ज़रूरतमंदों को देना चाहिए.

उन्होंने कहा कि इसमें 15 करोड़ लोग शामिल होंगे. इससे डिमांड बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी.

साल 2024-25 तक 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था संभव?

आर्थिक मामलों के अधिकतर जानकार इस बात से सहमत हैं कि भारत में ग़रीबों को ग़रीबी रेखा से बाहर निकालने के लिए और अधिक समृद्ध समाज विकसित करने के लिए इसकी अर्थव्यवस्था को सात-आठ प्रतिशत की दर से विकसित करना होगा.

लेकिन ये भी वित्तीय साल 2024-25 तक 5 खरब की अर्थव्यवस्था बनने के सपने को साकार करने के लिए काफ़ी नहीं है. अर्थशास्त्री रघुवीर मुखर्जी कहते हैं, "इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था को 12-13 प्रतिशत के हिसाब से अगले चार साल तक विकास करना होगा."

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार प्रियरंजन दास को उम्मीद है कि ये लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.

वो कहते हैं, "क्या ये असंभव है? क्या भारत में 2025 तक 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की क्षमता है? निश्चित रूप से. यह इसके बावजूद है कि हम इस समय एक वैश्विक महामारी के दौर में हैं और भारत में एक पूर्ण संकट तो हमारे आगे है, हमने अभी इसे पीछे छोड़ा है."

लेकिन उनके अनुसार ये लक्ष्य उसी समय पूरा हो सकेगा, जब भारत अपनी समझदारी का पूरा इस्तेमाल करेगा यानी ये जनसांख्यिकीय लाभांश और उद्यमशीलता की ताक़त का सही से इस्तेमाल कर सकेगा.

विवेक कौल को संदेह है कि ये लक्ष्य अब पूरा किया जा सकेगा. वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि 5 ट्रिलियन सिर्फ़ एक दूर का सपना है. साल 2024-25 के बारे में भूल जाइए, मुझे यक़ीन नहीं है कि यह साल 2026-27 तक भी हासिल हो सकेगा. इसके अलावा, होने ये जा रहा है कि डॉलर के ख़िलाफ़ रुपए के मूल्य में कमी आने वाली है. इससे डॉलर का लक्ष्य हासिल करना और भी मुश्किल हो जाएगा."

अंदाज़ा है कि 2034 तक भारत के मध्यम वर्ग की आबादी एक अरब हो जाएगी और 30 करोड़ नौकरियों की आवश्यकता होगी.

भारत की अर्थव्यवस्था को एक लंबी छलांग मारने की ज़रूरत होगी. प्रोफे़शनल सर्विसेज़ की सबसे बड़ी वैश्विक कंपनी अर्न्स्ट एंड यंग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत को एक 'बड़ी जीत की छलांग' लगानी पड़ेगी.

इस छलांग में मानव और भौतिक पूंजी दोनों में निवेश करने की ज़रूरत होगी. ये जीत की छलांग रिसर्च, विकास और नई खोज में निवेश पर केंद्रित होगी.

विशेषज्ञों का कहना है कि "यह एकमात्र ऐसा परिदृश्य है जो 2030 तक भारत के भविष्य को सुरक्षित कर सकेगा."

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