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पाकिस्तान में कौन से बिल पर विपक्ष ने कहा- ये IMF के सामने सरेंडर
ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार एक गंभीर आर्थिक संकट में घिरी हुई है. पाकिस्तान को बजट घाटा और लगातार घटते विदेशी मुद्रा भंडार के कारण पिछले पाँच महीनों में 4.6 अरब डॉलर का क़र्ज़ लेना पड़ा है.
लेकिन क़र्ज़ लेने के सिलसिले का यह अंत नहीं है. पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस संकट के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अगले महीने चीन के दौरे पर जा रहे हैं. पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ से और क़र्ज़ चाहिए ताकि वो ख़ुद को डिफॉल्टर होने से बचा सके.
इसके लिए आईएमएफ़ ने कई कड़ी शर्तें रखी हैं. इन्हीं शर्तों को मानने के लिए इमरान ख़ान संसद में कुछ बिल पास करवाने की कोशिश कर रहे हैं.
ऐसे ही बिल 'स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान संशोधन बिल' (SBP) को लेकर सबसे ज़्यादा विवाद है. विपक्ष का कहना है कि यह बिल पास हो गया तो पाकिस्तान आईएमएफ़ का उपनिवेश बन जाएगा. देश के अर्थशास्त्री भी इस बिल पर सवाल उठा रहे हैं.
हाल ही में जमाते इस्लामी के सीनेटर मुशताक़ अहमद ख़ान, IMF से कर्ज़े की शर्तों को सरेंडर बता रहे हैं. उन्होंने एक स्थानीय टीवी चैनल को बताया, "ये समझौता नहीं है. ये डॉक्यूमेंट ऑफ़ सरेंडर है. इन्होंने पाकिस्तान को ग़ुलाम बना दिया है. इस समझौते के बाद स्टेट बैंक पाकिस्तानी संसद के प्रति जवाबदेह नहीं होगा. वो सीधा IMF के कब्ज़े में चला जाएगा. इससे बिजली से लेकर पेट्रोल तक सब महंगा हो जाएगा."
एसबीपी बिल या सरेंडर?
पाकिस्तान के अर्थशास्त्री डॉ कैसर बंगाली ने ट्वीट कर कहा है, ''एसबीपी संशोधन बिल पास होने के बाद सरकार पाकिस्तान के व्यावसायिक बैंकों से ही क़र्ज़ ले सकती है. इन बैंकों का स्वामित्व विदेशी हाथों में है. इससे विदेशी व्यावसायिक बैंकों के मुनाफ़े की राह खुलेगी. सरकार अपने हितों के फ़ैसले के लिए अतंरराष्ट्रीय वित्त संस्थानों की ओर देखेगी.''
''एसबीपी बिल पास होने के बाद पाकिस्तान की सरकार विदेशी व्यावसायिक बैंक के प्रति जवाबदेह होगी न कि संसद और पाकिस्तान के लोगों के प्रति. अगर कोई भी नेशनल असेंबली का सदस्य या सीनेटर इस बिल के पक्ष में वोट करता है तो वह आर्थिक आत्मसर्पण के लिए दोषी होगा. यह वैसा ही आत्मसमर्पण होगा, जैसा हमारी सेना ने दिसंबर 1971 में किया था.''
अगर यह बिल पास हो जाता है तो पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक को ज़्यादा स्वायत्तता मिल जाएगी. बिल पास हो जाने पर केंद्रीय बैंक सरकार को उधार देने से इनकार कर सकता है. स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के गवर्नर का कार्यकाल तीन साल से पाँच साल हो जाएगा.
बिल के प्रस्तावों के तहत वित्त मंत्रालय के लिए एसबीपी के गवर्नर को हटाना आसान नहीं होगा. भ्रष्टाचार के आरोप के मामले में ही वित्त मंत्रालय कुछ क़दम उठा सकता है, नहीं तो पाँच साल के पहले हटाना मुश्किल होगा. बिल में ये भी प्रावधान है कि पाकिस्तान का वित्त मंत्रालय, एसबीपी को कोई सीधे निर्देश नहीं दे पाएगा.
सरकार का बचाव
पाकिस्तान के वित्त मंत्री शौकत तरीन एसबीपी संशोधन बिल का बचाव कर रहे हैं. एसबीपी के गवर्नर के कार्यकाल तीन से पाँच साल करने पर उनका तर्क है कि इससे स्थायी नीतियों को लागू करने में मदद मिलेगी.
शौकत तरीन ने एक इंटरव्यू में कहा है कि तीन साल में कुछ भी नहीं हो पाता है. एक साल तो चीज़ों को समझने में ही लग जाता है. स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के गवर्नर, आईएमएफ़ के नॉमिनी हैं और आईएमएफ़ के प्रोग्राम ख़त्म होने के बावजूद वो पाँच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे.
शौकत तरीन का कहना है कि इससे कुछ बुरा असर नहीं पड़ेगा और इसमें कोई साज़िश खोजना बेकार की बात है.
हाल ही में शौकत तरीन ने कहा था कि अगर इस बिल के पास हो जाने के बाद स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान सरकार के नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तो संसद में साधारण बहुमत से यह संशोधन बिल वापस ले लिया जाएगा.
क्या वाक़ई इसे वापस लेने की ज़रूरत पड़ेगी?
अगर पाकिस्तान में सरकार बदलती है और वो इस बिल को आते ही ख़त्म कर देती है, तब क्या होगा? इस सवाल के जवाब में शौकत तरीन ने पाकिस्तान प्रॉफिट को दिए इंटरव्यू में कहा, ''पीटीआई की सरकार का संकल्प था कि हम वित्तीय संस्थानों को स्वायत्तता देंगे. हमारे पास विकल्प है कि इस तब्दीली का असर सकारात्मक नहीं होगा और एसबीपी बाग़ी हो रहा है, तो इस बिल को पास लिया जा सकता है.''
सरकार का एक डिफ़ेंस ये भी ही है कि बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के ज़रिए सरकार एसबीपी को कंट्रोल कर सकती है क्योंकि इसमें 10 सदस्य होंगे और छह लोगों को वित्त मंत्रालय नियुक्त करेगा.
पूरक वित्त बिल
इससे पहले इमरान ख़ान की सरकार ने संसद में पूरक वित्त बिल को 30 दिसंबर को पेश किया था. इस पूरक वित्त बिल से पाकिस्तान की सरकार को 360 अरब रुपए यानी दो अरब डॉलर के अप्रत्यक्ष कर लगाने का अधिकार मिल जाएगा.
लेकिन इसे लेकर भी विवाद गहरा गया है. वित्त राजस्व और आर्थिक मामलों पर सीनेट की स्टैंडिंग कमिटी ने महंगी जूलरी, फॉर्मूला मिल्क, साइकिल और गर्भनिरोधक समेत अन्य वस्तुओं पर 17 फ़ीसदी सेल्स टैक्स बढ़ाने के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है.
सरकार टैक्स बढ़ाने को लेकर अनिच्छुक थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ से एक अरब डॉलर के क़र्ज़ की मंज़ूरी के लिए यह ज़रूरी था. 12 जनवरी को आईएमएफ़ बोर्ड की बैठक है और इसी में पाकिस्तान को मिलने वाले क़र्ज़ पर मुहर लगनी है.
बोर्ड की बैठक से पहले पाकिस्तान ने संसद में ये बिल पेश कर दिया है. एक चिंता सता रही है कि अप्रत्यक्ष करों से कहीं महंगाई ना बढ़ जाए. अगर महंगाई बढ़ती है तो लोग सड़कों पर भी उतर सकते हैं. इमरान ख़ान की सरकार अप्रत्यक्ष कर तब बढ़ाने जा रही है जब उनकी पार्टी पीटीआई को स्थानीय निकाय चुनाव में गहरा झटका लगा है.
इमरान ख़ान सरकार की मजबूरी
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इमरान ख़ान की सरकार का नेशनल असेंबली में किसी तरह से बहुमत है. इस बात की भी आशंका है कि बिल पास हुआ तो उनकी सरकार को समर्थन देने वाली सहयोगी पार्टियां ख़ुद को अलग कर सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो सरकार गिर जाएगी.
कहा जा रहा है कि संसद में बिल पर वोटिंग के दौरान पीटीआई और सहयोगी पार्टियों के सांसद ग़ैर-हाज़िर रह सकते हैं क्योंकि 20 महीने बाद ही चुनाव है और कोई भी नेता उस बिल को समर्थन नहीं देना चाहेगा, जिससे महंगाई बढ़ सकती है.''
लेकिन सरकार अगर वित्त बिल पास नहीं करती है तो अगले महीने उसे आईएमएफ़ से एक अरब डॉलर का क़र्ज़ नहीं मिलेगा. आईएमएफ़ से पाकिस्तान को तीन साल में छह अरब डॉलर के क़र्ज़ मिलने हैं.
निक्केई एशिया से ही वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में पाकिस्तान इनिशिएटिव के निदेशक उज़ैर योनास ने कहा, ''बिना आईएमएफ़ की मंज़ूरी के पाकिस्तान को आर्थिक मदद नहीं मिलेगी. इस खालीपन को भरने के लिए न तो चीन से और न ही सऊदी से मदद मिलने वाली है. पाकिस्तान की मुद्रा रुपए पर भारी दबाव होगा, निवेशकों का विश्वास उठ जाएगा, आर्थिक अनिश्चितता नाटकीय रूप से बढ़ेगी और इसका ख़ामियाज़ा आख़िरकार आम पाकिस्तानियों को ही भुगतना होगा.''
कॉपी - रजनीश कुमार
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