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उत्तर कोरिया: वर्ल्ड बैंक का मेंबर क्यों बनना चाहते हैं किम जोंग उन
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन ने शांति बहाल करने की उत्तर कोरिया की तमाम कोशिशों का उल्लेख किया था.
उन्होंने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में ये भी उम्मीद जताई थी कि कोरियाई प्रायद्वीप में जारी तनाव जल्द ही पूरी तरह समाप्त हो सकता है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स को किम जोंग-उन से हुई अपनी हालिया मुलाक़ात के बारे में मून जेई-इन ने कहा कि "किम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) और वर्ल्ड बैंक समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों में शामिल होने के इच्छुक हैं."
क्या उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन वाक़ई ऐसा चाहते हैं? इसकी पुष्टि अभी नहीं हो पाई है.
लेकिन अगर वो ये ऐसा चाहते हैं, तो उन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
अपने परमाणु कार्यक्रम की वजह से उत्तर कोरिया दशकों तक दुनिया भर के देशों से आर्थिक रूप से कटा हुआ रहा है.
ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) और वर्ल्ड बैंक जैसी वैश्विक वित्तीय एजेंसियों में उत्तर कोरिया के शामिल होने की प्रक्रिया बहुत लंबी साबित हो सकती है.
सदस्य होने के फ़ायदे क्या हैं?
ऐसे देश जिन्हें समाजवाद 'विरासत' में मिला, वो भी अमरीका के वर्चस्व वाली इन संस्थाओं में क्यों शामिल होना चाहते हैं? इसकी कुछ वजहें हैं.
सदस्यता मिलने से उत्तर कोरिया को विशेषज्ञों के एक बड़े खेमे तक पहुंच मिलेगी. उत्तर कोरिया को तकनीकी सहायता के साथ-साथ फंड भी मिलने लगेंगे.
ये सभी चीज़ें उत्तर कोरिया को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकृत करने की ओर ले जाएंगी.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का उद्देश्य अपने सदस्यों की वित्तीय और मौद्रिक स्थिरता को सुनिश्चित करना है.
जबकि वर्ल्ड बैंक सदस्य देशों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और ग़रीबी को कम करने में मदद करता है.
इन दोनों संस्थाओं का फ़ोकस भले ही अलग हो, लेकिन इनका मूल मक़सद आर्थिक कल्याण को बढ़ावा देना ही है.
आर्थिक पारदर्शिता
वर्ल्ड बैंक का वर्णन 'विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता और ज्ञान' मुहैया कराने वाली सबसे बड़ी संस्था के रूप में किया जाता है.
वर्ल्ड बैंक का सदस्य बनने के लिए किसी भी देश को पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का सदस्य बनना होता है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को चाहिए कि सदस्य देश अपनी अर्थव्यवस्था से जुड़ी जानकारियाँ उससे साझा करें, वो विदेशी मुद्रा प्रवाह को सीमित न करें, व्यापार को प्रोत्साहन देने वाली नीतियों का पालन करें और सदस्यता का भुगतान करें.
लेकिन उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था पारदर्शी नहीं है. साथ ही ये भी स्पष्ट नहीं है कि उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन इन संस्थाओं की समीक्षा और तहकीकात को कितना स्वीकार करेंगे.
इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के एक विश्लेषक अनविता बासु का कहना है कि "उत्तरी कोरिया की अर्थव्यवस्था एक 'माफ़िया राज' की तरह काम करती है. वहाँ सर्वोच्च नेताओं के अलावा अर्थव्यवस्था पर ख़ास तौर पर नज़र रखने वाले कोई संस्थान नहीं हैं."
बासु का कहना है कि "ऐसा कोई भी कारण अभी नज़र नहीं आता कि उत्तर कोरिया अपने भेद किसी को देगा. वो भेद जो कि उनकी व्यवस्था में शामिल हैं. अगर वो ऐसा करते हैं और बहुत सारी सूचनाएं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को देते हैं, तो ये उन्हें कमज़ोर कर सकता है."
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एक असामान्य अर्थव्यवस्था को मापना
उत्तर कोरिया किसी भी तरह का आर्थिक डेटा प्रकाशित नहीं करता है. एक दावे के अनुसार 1960 के दशक से लेकर अभी तक उत्तर कोरिया ने कोई आर्थिक डेटा प्रकाशित नहीं किया है.
दक्षिण कोरिया का सेंट्रल बैंक सरकारी और इनटेलिजेंस से जुटाई जानकारी के आधार पर उत्तर कोरिया की जीडीपी के आंकड़े जारी करता है. इसके अनुसार साल 2017 में उत्तर कोरिया का ग्रोथ रेट बीते 20 सालों में सबसे ख़राब रहा.
कुछ जानकारों का मानना है कि तकनीकी कमज़ोरी के कारण भी उत्तर कोरिया आर्थिक डेटा जुटाने में अक्षम है.
इसके अलावा उत्तर कोरिया में एक बड़ा काला बाज़ार स्थापित है और समाज में व्यापक भ्रष्टाचार होने की बात कही जाती है.
सोल नेशनल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर ब्यूंग-योन किम ने अनुसार एक ठेठ उत्तर कोरियाई शख़्स का घर वहाँ के स्थानीय बाज़ार की गतिविधियों से चलता है. 70 फ़ीसदी से अधिक आय लोगों की बाज़ार से होती है. इसमें क़ानूनी और अवैध आय शामिल है. एक अनुमान ये भी है कि उत्तर कोरिया में होने वाली आधे से ज़्यादा गतिविधियाँ अवैध हैं.
ऐसे हालात में उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था को मापना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
प्रोफ़ेसर ब्यूंग कहते हैं कि "उत्तर कोरिया की दोहरी अर्थव्यवस्था में वहाँ के सकल घरेलू उत्पाद को मापना बहुत बड़ा काम है. इटली जैसी अच्छी तरह से विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को मापना बहुत मुश्किल है."
ब्यूंग कहते हैं कि "उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन और उनके ऊंचे ओहदों पर बैठे अधिकारियों को विदेशी व्यापार से बहुत पैसा मिल सकता है. क्योंकि उत्तरी कोरिया का जो अभिजात वर्ग है वो वैश्विक क़ीमत की तुलना में बहुत कम क़ीमत पर अपने सामान को चीन जैसे देशों को निर्यात करता है. फिर उसके बदले में वो मोटी रिश्वत लेते हैं ताकि वैश्विक मूल्य और निर्यात की क़ीमत के बीच के अंतर को भर सकें."
इसलिए उत्तर कोरिया में इकोनॉमी के लिए 'व्यापक भ्रष्टाचार' एक बड़ी समस्या है.
मानवाधिकार रिकॉर्ड कितना अहम
वहीं वैश्विक स्तर की एजेंसियों का सदस्य बनने के लिए उत्तर कोरिया को मानवाधिकार क्षेत्र में भी काम करना होगा.
ये कई बार कहा गया है कि शांति स्थापित करने के लिए उत्तर कोरिया काम कर रहा है. वो अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद कर रहा है और स्थितियाँ ट्रंप और किम जोंग-उन की ऐतिहासिक मुलाक़ात के बाद तेज़ी से बदली हैं.
बावजूद इसके ये एक लाज़िम सवाल है कि क्या मानवाधिकारों की बुरी स्थिति से उत्तर कोरिया की सदस्यता में बाधा उत्पन्न नहीं होगी?
इसका एक संभव जवाब हो सकता है- 'नहीं'.
क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की साल 2017 की 'सदस्य सूची' में म्यांमार और अफ़गानिस्तान जैसे कुछ देशों के नाम भी शामिल हैं जिनका मानवाधिकार रिकॉर्ड संदिग्ध रहा है.
इसी बीच वर्ल्ड बैंक पर 'मानवाधिकार मुक्त क्षेत्र' होने का आरोप भी लगाया गया है.
अमरीका की स्टेनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर आंद्रे अब्रहामियन का कहना है कि "अगर उत्तर कोरिया अपने मानवाधिकार संबंधी मुद्दों में सुधार करने की कोशिश करता है और दूसरे देशों के साथ अपने राजनीतिक संबंधों को बदलने के लिए क़दम उठाता है, तो शायद उसके लिए कई अवसर खुल सकते हैं."
आख़िरकार वैश्विक राजनीति का भी इस फ़ैसले पर 'निर्णायक' असर होगा कि उत्तर कोरिया को वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ की सदस्यता दी जाये या नहीं?
आंद्रे ये भी कहते हैं कि "अगर काले बाज़ार से और अविकसित होने से ही आईएमएफ़ का हिस्सा बनने में बाधा आया करती, तो कई ऐसे देश हैं जो कभी वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ का हिस्सा नहीं बन पाते."
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