रूस और यूक्रेन की लड़ाई से जुड़े तमाम सवालों के जवाब यहां जानिए

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रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुए एक महीना से अधिक समय बीत चुका है. लेकिन अभी भी रूस को यूक्रेन की ओर से भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है.
यूक्रेनी सुरक्षाबलों ने रूस से कई इलाक़ों को वापस छीनने की कोशिशें शुरू कर दी हैं और कहा जा रहा है कि इस हफ़्ते कीएव और उत्तरी शहर चेर्नीहिएव में अभियान शुरू होगा.
लेकिन इस सबके बीच 40 लाख लोग यूक्रेन छोड़ चुके हैं और देश की एक चौथाई आबादी विस्थापित हुई है.
ग्राउंड पर मौजूद बीबीसी के दो संवाददाता आपके सवालों के जवाब दे रहे हैं.
ओल्गा ग्युरिन यूक्रेन की राजधानी कीएव में हैं
जेनी हिल रूस की राजधानी मॉस्को में हैं
हाल ही में यूक्रेन ने जवाबी हमले किए और कुछ क्षेत्रों पर वापस क़ब्ज़ा हासिल कर लिया है. अगर मान लिया जाए कि यूक्रेन और रूस के बीच कूटनीतिक बातचीत फैल होती है तो क्या यह संभव है कि यूक्रेन फ़ौज की मदद से 'जीत' दर्ज करने में सफल हो जाए? - हैरी टिंसली
ओल्गा ग्युरिन लिखती हैं:
सैन्य दृष्टि से देखें तो यूक्रेन के लिए अब तक स्थिति ठीक सी है.
इसने एक विशाल और बेहतर तरीक़े से सुसज्जित सेना का दृढ़ता और कुशलता से सामना करके राष्ट्रपति पुतिन और दुनिया को चौंका दिया है.
बीते हफ़्ते हमने कीएव के बाहर युद्ध में फ़्रंटलाइन पर यूक्रेन की कामयाबी का एक उदाहरण देखा था. यूक्रेन की सेना ने हमें बताया था कि रूसियों ने बीते महीने में चार बार बढ़त क़ायम करने की कोशिश की थी लेकिन हर बार उन्हें वापस पीछे हटना पड़ा. इसके उदाहरण वो आधा दर्जन रूसी टैंक और सैन्य वाहन हैं जो राख हुए पड़े हैं.
रूस के हमले को अब छठवां सप्ताह चल रहा है लेकिन इस दौरान वो मुख्य मोर्चों को जीतने में नाकाम रहा है. इसके साथ ही न वो राजधानी कीएव में दाख़िल हो पाया है और न ही सरकार को अस्थिर कर सका है और न ही दक्षिण में खेरसोन को छोड़कर कोई बड़ा शहर हासिल कर सका है. रूस ने कुछ क़ब्ज़ाने से अधिक नुक़सान झेला है.
ये कहने के साथ ही ये बताना ज़रूरी है कि किसी भी परिणाम के बारे में अनुमान लगाना बहुत जल्दबाज़ी होगी.
हम शायद एक लंबे युद्ध की शुरुआत में हैं. रूस ने कहा है कि वो पूर्वी यूक्रेन को डोनबास क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित रखेगा. लेकिन रूस के पास अब विकल्प सीमित हैं क्योंकि वह कहीं और बढ़त हासिल करने में सफल नहीं हुआ है. लेकिन भविष्य में बाक़ी जगहों पर और अधिक क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा करने की कोशिशें की जा सकती हैं.
राष्ट्रपति पुतिन का भविष्य शायद अब इस हमले की कामयाबी और नाकामयाबी पर टिका हुआ है. वो अब शायद लंबे समय तक सेना, हथियारों और गोला-बारूद की उपलब्धता को बनाए रखेंगे.

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रूस अब जब मध्य पूर्व से लड़ने के लिए लोगों की भर्तियां कर रहा है तो क्या यह उसकी ख़ुद की सेना में आत्मविश्वास की कमी को दिखाता है? - डेविड कार्टर
जेनी हिल लिखती हैं:
रूस इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेगा. लेकिन ऐसे सबूत उपलब्ध हैं जो ये बताते हैं कि कुछ रूसी सुरक्षाबल अनुभवहीन हैं और इस मिशन के लिए तैयार नहीं थे. रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में जबरन यह स्वीकार किया था कि यूक्रेन में ज़बरदस्ती भर्ती किए गए लड़ाकों को भेजा गया है. हालांकि, पुतिन इन दावों के विपरीत अपनी बात कहते रहे हैं.
मॉस्को का दावा है कि मध्य पूर्व के 16,000 'वॉलंटियर्स' जो बीते दशक में आईएसआईएस के ख़िलाफ़ लड़ चुके हैं वो रूसी सेना के साथ लड़ने के लिए तैयार हैं. उनके पास रूसियों की तुलना में शायद अनुभवी लड़ाके हों और उनमें कुछ ऐसे विशेषज्ञ भी हो सकते हैं जिनमें शहरों को क़ब्ज़ा करने की लड़ाई की अधिक कुशलता हो.
कुछ का तर्क ये है कि वे यूक्रेनी नागरिकों को मारने या उन पर हमला करने में कम अनिच्छुक होंगे. क्योंकि अधिकतर रूसियों के यूक्रेन से नज़दीकी संबंध हैं और उनका लोगों के साथ 'भाईचारा' वाला संबंध है. वहीं, भाड़े के लड़ाके क्रूरता के लिए प्रसिद्ध हैं जो कि यूक्रेनी सुरक्षाबलों पर मानसिक प्रभाव डाल सकते हैं.
संभवत: रूसी सरकार को इस बारे में पता है, इसी वजह से वह मध्य-पूर्वी लड़ाकों के वहां पहुंचने की ख़बरों को सामने ला रहा है. हालांकि, अब तक रूस ने आधिकारिक रूप से ये नहीं कहा है कि उसने इन लड़ाकों को यूक्रेन में भेजा है.
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युद्ध के बाद यूक्रेन के लिए वो गोला-बारूद कितना बड़ा मुद्दा होंगे जिनमें धमाके नहीं हुए? क्या ऐसा होगा कि एक बड़े क्षेत्र में किसी के भी आने-जाने पर रोक लगा दी जाए? - रॉबी
ओल्ग ग्युरिन लिखती हैं:
दुख से कहना पड़ रहा है, लेकिन हां. संघर्ष में अक्सर ये होता है कि बंदूक़ों के शांत होने के बाद भी लोगों की ज़िंदगियों दांव पर होती हैं.
ये ख़तरा सिर्फ़ ज़िंदा गोला-बारूद से ही नहीं बल्कि लैंडमाइंस से भी होगा. ये कई सालों तक लोगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं जब तक कि कोई संगठन फ़्रंटलाइन के इलाक़ों को ख़ाली न कराए. कई युद्धों के बाद मैंने इन संगठनों को काम करते देखा है. इनका काम बहुत मेहनती और वक़्त लेने वाला होता है.
रूस के हमले से पहले देश के पूर्व में रूस समर्थित अलगाववादियों और यूक्रेनी सरकार के बीच जंग जारी थी जो कि 2014 से चल रही थी.
जनवरी और फ़रवरी में फ़्रंटलाइंस पर रिपोर्टिंग करते हुए हम कई माइनफ़ील्ड्स पर बचते हुए गए.
जब बर्फ़ के पिघलने के बाद मिट्टी कीचड़ बनती है तो उस दौरान माइन के अपनी असली जगह से कहीं और पहुंचने का ख़तरा अधिक होता है.
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क्या इसकी कम या अधिक संभावना है कि रूस में लोग पुतिन को उखाड़ फेंकेंगे या यह संघर्ष जितना लंबा चलेगा उतना लोगों में अधिक से अधिक अशांति पैदा होगी?
जेनी हिल लिखती हैं:
इसकी कम ही संभावना है.
जो भी युद्ध का विरोध करता है रूसी सरकार उसके ख़िलाफ़ सख़्ती से पेश आता है और कई रूसी सिर्फ़ भागने का ही सोचते हैं. लगभग रोज़ाना होने वाले विरोध प्रदर्शन कम हो गए हैं.
सरकारी ओपिनियन पोल लगातार पुतिन और उनके 'विशेष सैन्य अभियान' के समर्थन में बहुमत दिखा रहे हैं.
अधिकतर स्वतंत्र मीडिया संस्थान को या तो जबरन बंद कर दिया गया है या ब्लॉक कर दिया गया है जो कुछ सरकारी मीडिया से अलग विकल्प हैं वो भी क्रेमलिन की ही बात को आगे बढ़ा रहे हैं. उनका कहना है कि रूसी सुरक्षाबल यूक्रेन में रूसी भाषी जनसंख्या को 'जनसंहार' से बचाने के लिए गई है जिसकी साज़िश यूक्रेनी राष्ट्रवादी और नव-नाज़ी रच रहे थे.
रूस पर लग रहे प्रतिबंधों का असर दिखने लगा है और सामान के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन रूस सरकार इसको पश्चिम के हमले को एक अलग उदाहरण के तौर पर पेश कर रहा है. फ़िलहाल अभी जो हालात हैं उसके मद्देनज़र ये मुश्किल है कि सार्वजनिक नाराज़गी क्रांति में बदल पाएगी.
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मानवीय नुक़सान से अलग यूक्रेन के आधारभूत ढांचे को हुए नुक़सान के पुनर्निर्माण के लिए कौन भुगतान करेगा? - स्टीव सैंडरकॉट
ओल्गा ग्युरिन लिखती हैं:
सबसे बड़ा नुक़सान इंसान का हो रहा है जो कि दिन ब दिन बढ़ रहा है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ आम लोगों की सत्यापित मृत्यु का आंकड़ा तक़रीबन 1,200 है लेकिन असली संख्या इससे भी अधिक हो सकती है. इसमें यह तथ्य भी जोड़ देना चाहिए 40 लाख यूक्रेन भाग गए हैं और दूसरे देशों में शरणार्थी बन गए हैं.
इसके साथ ही देश में एक भयंकर विनाश भी हुआ है. दक्षिण में मारियुपोल को भारी नुक़सान हुआ है जहां पर हमने हमले के 10 दिनों को देखा है.
एक समय यह भारी हलचल वाला बंदरगाह था जहां पर ट्रेंडी कैफ़े, व्यस्त रेस्टॉरेंट और शानदार पार्क थे. सैटेलाइट तस्वीरें दिखाती हैं कि मारियुपोल धरती पर सबसे झुलसती हुई जगह है जहां पर 90 फ़ीसदी आवासीय इमारतें या तो क्षतिग्रस्त हैं या नष्ट हो चुकी हैं.
यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक़, केवल इसी शहर में तक़रीबन 5,000 लोग मारे जा चुके हैं. उनका कहना है कि मौतों का वास्तविक आंकड़ा दोगुना हो सकता है.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने वादा किया है कि वो 'हर घर, हर सड़क और हर शहर का पुनर्निर्माण करेंगे.' उन्होंने कहा है कि रूस को 'क्षतिपूर्ति शब्द सीखना होगा' और पूरी रक़म की भरपाई करनी होगी.
इस युद्ध के आख़िर में कोई भी सौदा होता है तो उसमें यूक्रेन ज़रूर क्षतिपूर्ति की मांग करेगा. अगर रूस पैसे देता है तो यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इस सौदे में किस की ज़्यादा चलती है. सैद्धांतिक रूप से जी-7 देशों ने रूसी संपत्तियों को ज़ब्त कर लिया है और नुक़सान की भरपाई के लिए इनका इस्तेमाल किया जा सकता है.
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अगर शांति समझौता होता है तो यूक्रेन/रूस क्राइमिया, डोनबास और उन क्षेत्रों के लिए कैसा सौदा होगा जो कई सालों तक रूस समर्थित विद्रोहियों के पास थे? - रायन मैकगोली
जेनी हिल लिखती हैं:
हम जानते हैं कि पुतिन चाहते हैं कि दुनिया क्राइमिया को मान्यता दे जिस पर उसने साल 2014 में क़ब्ज़ा कर लिया था. इस सप्ताह बातचीत के दौरान यूक्रेनी पक्ष ने सुझाव दिया था कि एक संपूर्ण शांति सौदे के तहत क्राइमिया के स्थिति पर अगले 15 सालों के दौरान चर्चा होगी. हालांकि पुतिन के लिए इस पर सहमत होना कठिन है.
वो यह भी चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय स्व-घोषित पीपल्स रिपब्लिक दोनेत्स्क और लुहांस्क को स्वतंत्र तौर पर मान्यता दे. हालांकि इसका मूल अर्थ 'रूस नियंत्रित' होगा.
क्रेमलिन की वर्तमान योजना पूर्वी यूक्रेन में अपने प्रयासों को तेज़ करना है ताकि पूरे डोनबास क्षेत्र को 'मुक्त' किया जा सके. हम मान सकते हैं कि पुतिन इस क्षेत्र को क़ाबू करने की कोशिश करना चाहते हैं.
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हमने देखा है कि यूक्रेनी सेना कई क्षेत्रों में काफ़ी प्रभावी रही है. फिर क्या वजह है कि वो रूसी तोपख़ाने को उसके शहरों पर बम बरसाने से रोक नहीं पा रही है? - पॉल एक्रिल
ओल्गा ग्युरिन लिखती हैं:
स्वतंत्र सैन्य विश्लेषक एक संभावित कारक की ओर इशारा करते हैं. वो कहते हैं कि रूस ट्रैक्ड वाहनों से बम बरसाता है जो कि तुरंत हमला करने के बाद एक जगह से दूसरी जगह पर जा सकते हैं और जिनको निशाना बना पाना बहुत मुश्किल होता है.
यूक्रेनी सुरक्षाबलों ने हमें कहा था कि रूस जहां से फ़ायरिंग कर रहा है वहां पर आम लोगों की मौजूदगी है जिसके कारण वो विवश हो जाते हैं. वो नहीं चाहते कि रूसी तोपख़ाने को निशाना बनाते समय अपने ही लोगों को निशाना बनाया जाए.
कीएव के इर्द-गिर्द यूक्रेनी सुरक्षाबल रूसियों को पीछे धकेलने में सफल रहे हैं और उनके तोपख़ाने के इस्तेमाल करने की गुंजाइश को सीमित कर दिया है क्योंकि सिटी सेंटर उनकी पहुंच से दूर है. पुतिन के लोग कीएव पर बमबारी करने में असमर्थ हैं जैसा कि वो मारियुपोल पर कर रहे थे और उन्होंने हवाई हमले का सहारा लिया है.
हालांकि, यूक्रेनी हवाई रक्षा अच्छे से काम कर रही है. यूक्रेन लगातार मांग कर रहा है कि रूसी ख़तरे को रोकने के लिए अधिक और बेहतर वायु रक्षा प्रणाली उसे दी जाए. और नेटो से लगातार मांग की जा रही है कि वो नो-फ़्लाई ज़ोन लागू करे.
हम ऐसे लोगों से मिले जो इरपिन में बमबामरी के कारण भाग रहे थे, वो नेटो से 'नो फ़्लाई ज़ोन' लागू करने की मांग कर रहे हैं. लेकिन कुछ का ही मानना है कि ऐसा होने की संभावना है क्योंकि ऐसा करने पर पश्चिम को एक बड़ी जंग में उलझने का डर है.

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पुतिन ने रूस में मीडिया पर भारी प्रतिबंध लगाए हुए हैं. लेकिन क्या ये संभव है कि यूक्रेन से आई ख़बरें जैसे कि सैनिकों एवं आम लोगों की मौत के आंकड़ों से जुड़ी ख़बरें क्या पूरी तरह सही हैं? - सारा, ऑक्सफोर्ड
ओल्गा ग्युरिन लिखती हैं:
दोनों पक्षों के बीच जंग के मैदान के साथ-साथ एक इन्फॉर्मेशन वॉर चल रहा है.
किसी भी संघर्ष में, युद्धरत पक्षों की ओर से आम लोगों की मौत, इलाकों पर क़ब्ज़े करने और दुश्मन पक्ष के सैनिकों की मौत से जुड़ी ख़बरों को सावधानीपूर्वक लेना चाहिए.
रूस के मामले में फिलहाल ये बात सही साबित होती दिख रही है क्योंकि रूस की सरकार ये कोशिश कर रहा है कि उसकी जनता को घटनाओं का सरकारी वर्ज़न ही पता चले. रूस अभी भी ये मानने को तैयार नहीं है कि उसने यूक्रेन पर हमला किया है और इसे अपना "विशेष सैन्य अभियान" बताता है.
हम फर्स्ट हैंड रिपोर्टिंग को प्राथमिकता देते हैं, इसी वजह से बीबीसी ने यूक्रेन के कई इलाकों में अपनी टीमों को तैनात किया हुआ है. ये टीमें ज़मीन पर मौजूद आम लोगों, स्वास्थ्यकर्मियों, स्थानीय अधिकारियों और यूक्रेन की सेना में शामिल लोगों के बयान रिकॉर्ड कर रहे हैं.
यूक्रेन ने ये बात स्वीकार की है कि उसे भारी नुकसान हुआ है. और अलग-अलग शहरों में मौजूद बीबीसी की टीमों ने युद्ध में मारे गए सैनिकों के अंतिम संस्कार पर ख़बरें भेजी हैं. हम ये पता नहीं लगा सकते है कि क्या जानो-माल के नुकसान की कितनी जानकारी सार्वजनिक की जा रही है.

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क्या रूस के कुछ लोग युद्ध का विरोध कर रहे हैं? क्या वे सुरक्षित हैं? रोआना, ब्राइटन
जेनी हिल लिखती हैं:
ये सच है कि कुछ रूसी लोग इस युद्ध का विरोध कर रहे हैं. लेकिन ये पता लगाना मुश्किल है कि ये विरोध कितना व्यापक है.
युद्ध के ख़िलाफ़ बयान देने या सिर्फ इस युद्ध, जिसे पुतिन एक विशेष सैन्य अभियान बता रहे हैं, के बारे में सच बताने पर अपराधी ठहराए जाने से लेकर जेल भी भेजा जा सकता है.
ऐसी ख़बरें आई हैं कि हमले के बाद शुरुआती तीन हफ़्तों में सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने पर 15 हज़ार से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया था.
ज़्यादातर स्वतंत्र पत्रकार और हमले का विरोध करने वाले रूसी लोग अपने देश से भागकर तुर्की, अर्मेनिया, जॉर्जिया पहुंचे हैं. रूसी सरकार इन्हें गद्दार की संज्ञा देती है और इनमें से जो लोग रूस छोड़कर नहीं गए हैं, उन्हें प्रताड़ना और हमलों का सामना करना पड़ रहा है.
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हम मोर्चे पर तैनात यूक्रेन के सैनिकों का दृष्टिकोण देख रहे हैं लेकिन क्या रूसी पक्ष का नज़रिया मिल सकता है? क्या रूस ने आप पर रिपोर्टिंग करने और जंग के मैदान में लड़ रहे रूसी सैनिकों से बात करने से मना किया है? रॉबर्ट, बिशप स्टॉर्टफ़ोर्ड
जेन्नी हिल लिखती हैं:
मैं यूक्रेन में मौजूद अपने साथियों की तरफ़ से जवाब नहीं दे सकती लेकिन रूसी सरकार रूस जाने वाली सूचनाओं के प्रवाह पर कड़ा नियंत्रण रखता है.
रक्षा मंत्रालय अक्सर अपडेट जारी करता है जो कि बार-बार इस 'विशेष सैन्य अभियान' की सफ़लता का उल्लेख करता है. रूसी सैनिकों के स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध है. और रूसी सरकार ने सेना की बदनामी करने वाली ख़बरें प्रकाशित करने और ऐसी ख़बरों को प्रसारित करने, जिसे रूस फेक न्यूज़ की संज्ञा देता हो, को अपराध का दर्जा किया है.
एक स्वतंत्र संस्था है जिसका काम सैनिकों के परिवारों तक सैनिकों से जुड़ी ख़बरें पहुंचाना है. हालांकि, उन्होंने हाल ही में हमें बताया है कि वे अपनी गतिविधियां बंद करने को लेकर सरकार की ओर से काफ़ी दबाव है.
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