रूस अब तक यूक्रेन को नहीं हरा पाया, ये है सबसे बड़ी वजह - दुनिया जहान

रूसी सेना का टैंक

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यूक्रेन पर रूस के हमले के चार दिन बाद 28 फरवरी को ली गई सैटलाइट तस्वीरों में देखा गया कि रूसी सेना का 64 किलोमीटर लंबा एक विशाल काफिला, राजधानी कीएव की तरफ बढ़ रहा था.

टैंकों, गाड़ियों और हज़ारों रूसी सैनिकों के इस काफिले का उद्देश्य था कीएव पर हमला.

लेकिन इसके एक महीने बाद भी रूस कीएव पर कब्ज़ा नहीं कर पाया है. उसकी कई टुकड़ियां ज़ीरो डिग्री से कम तापमान में फंस गईं. ट्रक या तो दलदल में फंसकर ख़राब हो गए या फिर ईंधन के बिना बेकार पड़ गए.

वहीं यूक्रेन के दूसरे इलाक़ों से भूख से परेशान रूसी सैनिकों के दुकानें लूटने की चौंकाने वाली ख़बरें आ रही थीं. की चौंकाने वाली ख़बरें आ रही थीं.

इससे रूसी सेना को लेकर सवाल पैदा होने लगा कि वो यूक्रेन को हरा क्यों नहीं पा रही. तो दुनिया जहान में इस सप्ताह सवाल ये कि जंग के एक महीने बाद भी रूस कीएव पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर पाया है.

सैटलाइट तस्वीर

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इमेज कैप्शन, 28 फरवरी 2022 को ली गई इस सैटलाइट तस्वीर में यूक्रेन के इवानकीएव के दक्षिणपूर्व की तरफ रूसी सेना का विशाल काफिला देखा जा सकता है. रूस ने 24 फरवरी को यूक्रेन पर हमले की शुरूआत की थी.
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वन मैन, वन प्लान

निकोलास मशियर ईटीएच ज्यूरिख़ युनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर सिक्योरिटी स्टडीज़ में सीनियर रिसर्चर हैं. वो कहते हैं कि ऐसा लगता है कि यूक्रेन को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की राष्ट्रवादी सोच ने रणनीतिक तौर पर फ़ैसला लेने की उनकी क्षमता को धुंधला कर दिया है.

यूक्रेन पर हमले को पुतिन युद्ध नहीं, बल्कि विशेष सैन्य अभियान कहते हैं. 24 फरवरी को जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो पुतिन को शायद ये लगा कि जीतने में उन्हें वक्त नहीं लगेगा.

वो कहते हैं, "उन्हें उम्मीद थी कि वो यूक्रेन को कुछ दिनों में हरा देंगे. लेकिन ऐसा लगता है कि राजनीतिज्ञों और सेना की एजेंसियों, यहां तक कि सेना के बीच भी अभियान को लेकर चर्चा की कमी रही. लगता है कि सेना ने युद्ध की योजना एक ऐसे विशेष अभियान के रूप में की थी, जिसके बारे में कम ही लोगों को जानकारी हो. नतीजा ये हुआ कि यूक्रेन में जब रूसी सेना का प्रतिरोध बढ़ा तो सैनिकों का मनोबल कम होने लगा."

रूस यूक्रेन युद्ध को अब एक महीना हो चुका है. यूक्रेन के कुछ इलाक़ों में रूस ने भारी तबाही मचाई है, हालांकि कुछ हिस्सों में वो आगे नहीं बढ़ पाई है. उससे ग़लतियां हो रही हैं और वजह योजना के स्तर पर है.

कई लोग जिनपर पुतिन की उम्मीदों को हक़ीकत में बदलने की ज़िम्मेदारी थी, उन्हें अंधेरे में रखा गया था. युद्ध के दौरान पकड़े गए कुछ रूसी सैनिकों का दावा था कि उन्हें लगा वो युद्धाभ्यास कर रहे हैं. कुछ का मानना था कि वो यूक्रेन की 'सरकार' से लोगों को बचा रहे हैं.

लेकिन जब यूक्रेन में उनका सामना आम नागरिकों और उनके पेट्रोल बमों से हुआ तो उनके लिए इसे समझ पाना मुश्किल था. और फिर एक ग़लती ये भी थी कि कम अनुभव वाले सैनिकों को मुहिम पर तैनात किया गया.

वीडियो कैप्शन, पुतिन क्या यूक्रेन में प्राइवेट आर्मी की मदद ले रहे हैं? - Duniya Jahan

निकोलास कहते हैं, "रूसी सेना इस तरह के अभियान के लिए तैयार नहीं थी. इसका भी नकारात्मक असर पड़ा. उत्तरपूर्व की दिशा से रूस ने सेना की जिस टुकड़ी को कीएव की तरफ भेजा, वो उनके बेहतरीन सैनिक नहीं थे. इसमें 41वीं कंबाइन्ड आर्म्स आर्मी के सैनिक थे. आधुनिक हथियार, युद्ध की तैयारी, नियुक्ति और प्रोशफ़ेशनल सैनिकों की संख्या के मामले में ये टुकड़ी सेना की प्राथमिकता नहीं रही थी. ये आश्चर्य की बात है कि रूस ने शुरुआती दौर में अपने बेहतरीन सैनिक नहीं इस्तेमाल किए."

कीएव पर नियंत्रण के पुतिन के इरादे ने और ग़लतियों के लिए रास्ता साफ़ कर दिया. उन्होंने दूसरे इलाक़ों से ध्यान हटाकर कीएव पर लगाया.

वो कहते हैं, "विश्लेषकों को ऐसी ही उम्मीद थी. रूस ने यूक्रेनी एयरफोर्स और वहां के एयरफील्ड को निशाना बनाया. लेकिन वो यूक्रेन का अधिक नुक़सान नहीं कर सका."

युद्ध के पहले के कुछ दिनों में धीमा पड़ जाना इस बात की तरफ भी इशारा करता है कि ज़मीन पर मौजूद सेना और हवाई हमले कर रही सेना के बीच समन्वय की कमी थी. और फिर हताहत होने वाले रूसी सैनिकों की संख्या भी चौंकाने वाली थी. हालांकि आधिकारिक आंकड़ा अभी नहीं आया है.

निकोलास कहते हैं, "ये आंकड़ा पुतिन के नेतृत्व में हुए किसी और अभियान की तुलना में काफी ज़्यादा था. यहां हम यूक्रेन द्वारा जारी आंकड़ों की बात नहीं कर रहे. मरने वालों में रूसी सेना के कई आला अधिकारी भी शामिल हैं."

रूस को लगा था कि ये अभियान कुछ दिनों में ख़त्म हो जाएगा, लेकिन रूसी सेना का ये आकलन ग़लत साबित हो रहा था.

लेकिन कीएव पर कब्ज़े के लिए रूस की कोशिशें भी लगातार जारी रहीं. निकोलास कहते हैं कि रूस कीएव को रणनीतिक तौर पर अहम मानता है लेकिन अब शायद उसके लिए ये केवल आत्मसंतोष की बात रह जाए.

राजधानी कीएव के बाहरी इलाक़े में तैनात यूक्रेनी सेना का एक जवान

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इमेज कैप्शन, राजधानी कीएव के बाहरी इलाक़े में तैनात यूक्रेनी सेना का एक जवान
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रूसी सेना की मुश्किलें

एमिली फ़ेरिस, रॉयल यूनाइटेड सर्विसेस इंस्टीट्यूट में रीसर्च फेलो हैं. वो कहती हैं कि यूक्रेन में मौजूद रूसी सेना, लॉजिस्टिक्स से जुड़ी दिक्कतें झेल रही है.

वो कहती हैं, "सेना को हथियार, गोलाबारूद, ईंधन, रसद और यूनिफॉर्म की सप्लाई चाहिए. साथ ही पुराने सैनिकों की जगह लेने के लिए नए सैनिक चाहिए. मुझे लगता है कि किसी और सेना के मुक़ाबले रूस आम तौर पर अपने सैनिकों और हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और रसद की सप्लाई के लिए ट्रेनों का इस्तेमाल करता है."

रूस विशाल देश है, यहां अलग-अलग जगहों पर मौसम और ज़मीनी हालात अलग-अलग हैं. सेना के लिए रेल सबसे बेहतर ज़रिया है. लेकिन किसी दूसरे देश पर हमले की सूरत में इनका इस्तेमाल हो सके, ये ज़रूरी नहीं.

एमिली कहती हैं, "समस्या ये है कि रेल गाड़ियों से आ रही सप्लाई को सैनिकों तक पहुंचाने के लिए उनके पास अधिक ट्रक नहीं हैं. इस कारण रूसी सेना के लिए यूक्रेन में भीतर तक घुस पाना मुश्किल हो रहा है. अगर ये ट्रक बेकार हो गए या फिर दुश्मन का निशाना बन गए... जैसा कि यूक्रेनी सेना कर रही है तो दुश्मन की ज़मीन पर उनकी आपूर्ति बंद हो जाएगी."

इसके अलावा समस्या एक और भी है.

वो कहती हैं, "इनमें से कई ट्रकों का रखरखाव भी बेहतर तरीके से नहीं हुआ था. मतलब ये कि अगर ट्रकों के टायर पुराने होंगे तो वो यूक्रेन को मुश्किल मौसम को झेल नहीं पाएंगे और फट जाएंगे."

रास्पुतिस्ता

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इमेज कैप्शन, साल का वो वक्त जब मौसम ख़राब होता है और दलदल की समस्या बढ़ जाती है उसे रूसी भाषा में रास्पुतिस्ता कहते हैं. इसका मतलब है ख़राब सड़कों का मौसम. 1941 में जब जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया था उस वक्त जर्मन गाड़ियां और घोड़े दलदल में फंस गए थे. और अब कहा जा रहा है कि ये यूक्रेन का वो हथियार है जो रूसी सेना को आगे बढ़ने से रोक रही है.

2020 में भ्रष्टाचार को लेकर काम करने वाली ट्रांस्पेरेन्सी इंटरनेशल की बनाई गवर्नमेंट डिफेन्स इन्टेग्रिटी इंडेक्स के अनुसार रूसी रक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार का जोखिम अधिक था. इस तरह के दावे किए गए हैं कि सेना में घोटाला बढ़ा है.

वो कहती हैं, "रूसी सैनिकों के लिए रेल के ज़रिए आम ट्रक भेजे जाने के वीडियो सामने आए हैं. इनका इस्तेमाल जंग में हो रहा है, मतलब ये है कि सेना के पास ट्रकों की कमी है जो एक गंभीर समस्या है."

लेकिन ये ट्रक केवल अच्छी सड़कों पर चल सकते हैं और सेना की क्षमता को सीमित करते हैं. हालांकि एमिली कहती हैं कि रूसी सेना के साथ परेशानियां यूक्रेन के उत्तर में दिखाई दे रही हैं, जबकि देश के अलग हिस्सों में जंग एक अलग ही स्तर पर चल रहा है.

एमिली बताती हैं, "यूक्रेन के उत्तर की तुलना में दक्षिण की तरफ रूसी सेना अधिक तेज़ी से आगे बढ़ रही है. इसके वास्तविक कारण हो सकते हैं. यूक्रेन का दक्षिणी हिस्सा अपेक्षाकृत सूखा है जबकि उत्तर में दलदल की समस्या है. दलदल में फंसकर रूसी सेना के कई ट्रक ख़राब हुए हैं."

देखा जाए तो आज, हम दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक को ऐसी मामूली ग़लतियां करते देख रहे हैं जिनकी योजना युद्ध शुरू होने से पहले ही हो जानी चाहिए थी. यही वजह है कि ये सवाल उठ रहा है क्या यूक्रेन को लेकर रूसी सेना की रणनीति कमज़ोर रही.

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सेना में सुधार

बेट्टिना रेन्ज़ नॉटिंगहैम युनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ पॉलिटिक्स एंट इंटरनेशनल रीलेशन्स में प्रोफ़ेसर हैं. वो कहती हैं कि सोवियत संघ के पतन के बाद एक वक्त ऐसा था जब रूसी सेना के पास न तो अच्छे हथियार थे और न ही पैसा.

वो कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये माना जा रहा था कि रूसी सेना महत्वपूर्ण नहीं रही थी. चेचनिया में उसे बड़ी नाकामियाबी हासिल हुई थी और इसलिए उस तरफ लोगों का ध्यान कम था."

साल 2000 में व्लादिमीर पुतिन रूस के राष्ट्रपति बने और उन्होंने जिस काम को प्राथमिकता दी, वो था सेना में सुधार.

बेट्टिना कहती हैं, "रूसी अर्थव्यवस्था में भी बड़े सुधार किए गए. साल 2000 के बाद से 2008 में वैश्विक आर्थिक मंदी के आने तक तेल और गैस की कीमतें बढ़ी और रूसी अर्थव्यवस्था और मज़बूत होती गई. इससे सेना के अधुनिकीकरण के लिए ज़रूरी आर्थिक मदद मिली."

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मानते हैं कि यूक्रेन पुराने वक्त से रूस का हिस्सा था.

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इमेज कैप्शन, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मानते हैं कि यूक्रेन पुराने वक्त से रूस का हिस्सा था.

2008 में जब पुतिन प्रधानमंत्री थे, उस वक्त जॉर्जिया के दो अलगाववादी प्रांतों को लेकर चल रहे विवाद के बाद रूस ने जॉर्जिया पर हमला किया. पांच दिन चले इस युद्ध रूस की जीत हुई लेकिन सेना की कमज़ोरियां भी सामने आईं.

वो बताती हैं, "कमांड एंड कंट्रोल को लेकर कई दिक्कतें थीं. तकनीक पुरानी हो रही थी, लड़ाई में कई विमान नष्ट हुए थे. रूस ने 2008 में सेना के आधुनिकीकरण का घोषणा की. रक्षा कंपनियों ने फाइटर जेट और टैंकों का उत्पादन बढ़ाया. हाइटेक हथियार बनाने के लिए रक्षा कंपनियों का भी आधुनिकीकरण किया गया. रक्षा उपकरणों का आयात बढ़ा. फिर 2014 में रूस पर हथियारों से जुड़ी पाबंदियां लगाई गईं जिस कारण ये आसान नहीं रहा."

लंबे वक्त तक चले सुधारों के बाद भी रूसी सेना को यूक्रेन में वो सफलता नहीं मिल रही जिसकी उसे उम्मीद थी. ज़मीन पर सेना तकनीकी परशानियों से जूझ रही है. उनके टैंक ख़राब हो रहे हैं और उनकी रणनीति को भी इंटरसेप्ट किया जा रहा है.

बेट्टिना कहती हैं, "ये साफ़ है कि सेना कमांड, कंट्रोल और कम्यूनिकेशन की दिक्कतों से जूझ रही है. ऐसा लगता है कि जॉर्जिया और चेचनिया में जो मुश्किलें आई थीं वो अभी भी बरकरार हैं. ख़बरें हैं कि यूनिट कमांडर असुरक्षित रेडियो या मोबाइल फ़ोन पर बात कर रहे हैं."

हालांकि बेट्टिना कहती हैं इन सबसे बावजूद रूस के पास बड़ी तादाद में हथियार हैं और उसके सैनिकों की संख्या भी ज़्यादा है. ऐसे में वो लोगों को मारें या तबाही फैलाएं, यूक्रेन का नुक़सान निश्चित है.

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यूक्रेन का प्रतिरोध

लीयम कॉलिन्स न्यूयॉर्क के मॉडर्न वॉर इंस्टीट्यूट के फाउंडिंग डाइरेक्टर हैं. वो यूक्रेन के पूर्व रक्षा सलाहकार रह चुके हैं.

वो कहते हैं, "2016 में यूक्रेन ने अपनी सेना और रक्षा कंपनियों की समीक्षा की, जिसके बाद राष्ट्रपति पेत्रो पोरोशेन्कों के नेतृत्व में सेना की पांच बड़ी श्रेणियों- कमांड एंड कंट्रोल, योजना, संचालन, मेडिकल और लॉजिस्टिक्स में सुधार किए गए."

यूक्रेनी सेना आज अपने मुक़ाबले एक कहीं बड़ी सेना से जंग कर रही है.

लीयम कहते हैं, "यूक्रेन की पूरी सेना रूस की उन कुछ टुकड़ियों के बराबर है जिन्होंने शुरुआती दौर में उस पर हमला किया था. उसकी सेना में एक लाख 25 हज़ार आर्मी, 35 हज़ार एयरफोर्स, 15 हज़ार नेवी, 20 हज़ार एयरबॉर्न सैनिक और एक हज़ार विषेश सैनिक हैं. रूस के साथ सटी यूक्रेन की सीमा क़रीब दो हज़ार किलोमीटर लंबी है. ऐसे में ये अंदाज़ा लगना मुश्किल होता कि अधिक ताकतवर हमला किधर से होगा. लेकिन मुझे लगता है कि यूक्रेन इसका आकलन करने में कामयाब रहा."

यूक्रेन की तैयारी, रणनीति और सैनिकों के मनोबल ने रूस की सेना की कमज़ोरियों को सामने ला दिया है. कीएव की घेराबंदी की रूस की कोशिशों को यूक्रेन ने कड़ी चुनौती दी है.

वो कहते हैं, "यूक्रेन के लिए ये लड़ाई महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके लिए ये उनकी आज़ादी की लड़ाई है. वो न तो परतंत्र बनना चाहते हैं और न ही किसी का सैटलाइट मुल्क बनना चाहते हैं. उनका मनोबल अधिक है और ज़मीन पर योजना का कार्यान्वयन भी बेहतर है."

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: रूसी अल्टीमेटम के आगे डटा यूक्रेन

इसके अलावा ये बात भी अहम है कि इस बार रूस की जंग केवल यूक्रेनी सेना के साथ नहीं है, बल्कि वहां के आम नागरिकों के साथ भी है.

लीयम कहते हैं, "यूक्रेन में वॉलंटिरिंग का एक इतिहास रहा है. 2014 में वॉलंटियर्स रूस समर्थक विद्रोहियों से लड़ने के लिए सीमा के पास पहुंच गए थे. इसके अलावा प्रशिक्षण प्राप्त रिज़र्व सैनिक भी रूस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं."

यानी रूसी सेना यूक्रेन की सेना के मुक़ाबले बड़ी तो है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कौन किस पर भारी पड़ रहा है, ये अभी पूरी तरह साफ़ नहीं है.

लेकिन ये भी सच है कि यूक्रेन को हराने के लिए रूस वहां के शहरों पर लगातार गोलाबारी कर रहा है. जिन इलाक़ों की घेराबंदी की गई है वहां हज़ारों लोग मुश्किल हालात में फंसे हुए हैं, और लाखों जान बचाकर भागे हैं.

वीडियो कैप्शन, दक्षिणी हिस्से में यूक्रेन ने अपने कुछ हिस्सों को रूसी कब्ज़े से छुड़ा लिया है.
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लौटते हैं अपने सवाल पर- रूस एक ताकतवर सेना के साथ भी यूक्रेन को हरा क्यों नहीं पा रहा?

कुछ दिनों के जंग में यूक्रेन को हराने की रूस की योजना ग़लत साबित हुई. रूसी सेना को कई स्तरों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा, सैनिकों के लिए राशन की कमी हुई, गाड़ियों को ईंधन की समस्या हुई. और फिर सेना तकनीकी खामियों से भी जूझ रही है.

ये भी सच है कि रूस इस बात का अंदाज़ा नहीं लगा पाया कि उसे यूक्रेन में अलग-अलग स्तरों पर प्रतिरोध झेलना पड़ेगा. लेकिन ये रूस के हमले की पूरी तस्वीर नहीं क्योंकि यूक्रेन के दक्षिण की तरफ रूसी सेना अपनी पकड़ मज़बूत कर रही है.

हमारी दूसरी एक्सपर्ट एमिली फ़ेरिस कहती हैं कि रूसी सेना की खामियों को देखते हुए किसी निष्कर्ष तक पहुंचना सही नहीं होगा. रूस के पास अभी भी अपनी कमज़ोरियों का पता लगाकर उनपर काम करना मुश्किल नहीं है.

और जब तक शांति कायम करने के लिए हो रही कोशिशें कामयाब न हों, इसकी आशंका बनी रहेगी कि कभी भी कुछ भी हो सकता है.

प्रोड्यूसर - मानसी दाश

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