यूक्रेन की जंग: पुतिन क्या वाक़ई वैग्नर ग्रुप के लड़ाकों की मदद ले रहे हैं- दुनिया जहान

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मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन की राजधानी कीएव में 400 से अधिक भाड़े के सैनिक मौजूद हैं और वो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के इशारे पर काम कर रहे हैं. इनका उद्देश्य यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की उनकी कैबिनेट के कुछ सदस्यों और पूर्व बॉक्सिंग चैंपियन रहे क्लिचगो भाइयों की हत्या करना है.
इन रिपोर्टों की अब तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, हालांकि ये सवाल ज़रूर खड़ा हुआ है कि भाड़े के ये सैनिक हैं कौन?
यूक्रेन पहले भी देश के पूर्वी हिस्से में रूस से जुड़ी एक प्राइवेट आर्मी के सक्रिय होने का आरोप लगाता रहा है. इस प्राइवेट आर्मी का नाम है वैग्नर ग्रुप.
तो दुनिया जहान में इस सप्ताह पड़ताल इस बात की कि वैग्नर ग्रुप अख़िर क्या है और रूस-यूक्रेन युद्ध में क्या इसकी कोई भूमिका है?

प्राइवेट आर्मी की ज़रूरत क्यों?
डॉक्टर सर्गेई सुखान्किन द जेम्सटाइन फ़ाउंडेशन नाम के एक थिंकटैंक में सीनियर फ़ेलो हैं.
वो बताते हैं कि वैग्नर ग्रुप को दिमित्री उत्किन नाम के एक व्यक्ति ने बनाया था. वो 2013 तक रूसी विशेष सैन्यबल में शामिल थे.
वो कहते हैं, "वैग्नर ग्रुप में उन्होंने 35 से 50 साल की उम्र वाले ऐसे लोगों की भर्ती की जिन पर परिवार का या फिर कर्ज़ का बोझ था. ये अधिकतर छोटे शहरों से थे जहां काम के मौक़े कम थे. इनमें से कुछ चेचन्या में हुए संघर्ष और कुछ रूस-जॉर्जिया युद्ध में शामिल थे. इनके पास युद्ध का अनुभव था, लेकिन ये आम जीवन में अपनी जगह नहीं तलाश पाए थे."
सर्गेई बताते हैं कि रूसी सैन्य ख़ुफ़िया विभाग के पास एक जगह पर क़रीब तीन महीनों तक इनकी ट्रेनिंग हुई. इससे ये अंदाज़ा लगाया गया कि इस ग्रुप के तार रूसी सेना से जुड़े थे. बताया जाता है कि दुनिया के कई संघर्षग्रस्त इलाक़ों में इसी ग्रुप के लड़ाके भेजे गए.
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि वैग्नर ग्रुप की ज़रूरत क्यों पड़ी?
वो कहते हैं, "मुझे लगता है रूस इसे लेकर इसलिए उत्सुक था क्योंकि वो चेचन्या और अफ़ग़ानिस्तान में हुई ग़लती नहीं दोहराना चाहता था. पुतिन को डर था कि विदेशी ज़मीन पर सैन्य अभियानों में अधिक रूसी सैनिकों की मौत हुई तो इससे देश में लोगों की नाराज़गी बढ़ेगी."
चेचन्या और अफ़ग़ानिस्तान के सैन्य अभियानों में हज़ारों रूसी सैनिकों की जान गई थी. वैग्नर ग्रुप आधिकारिक तौर पर सेना का हिस्सा नहीं था, इसलिए इसे अभियान में शामिल करने से सैनिकों की मौतों का आंकड़ा कम रखने में मदद होती.
सर्गेई कहते हैं, "एक बड़ी वजह ये थी कि रूस इनकी ज़िम्मेदारी लेने से इनकार कर सकता था. यानी वो ये कह सकता था कि उसे इन लड़ाकों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. एक और वजह ये भी है कि किसी और देश में संवेदनशील मिशन पर सेना या पैरामिलिटरी भेजना मुश्किल होता है."


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वैग्नर ग्रुप का नियंत्रण किसके पास
किरिल मिख़ायलोव कीएव में कॉन्फ़्लिक्ट इन्टेलिजेंस टीम में खोजी पत्रकार हैं. उत्किन के नेतृत्व में वैग्नर ग्रूप 2014 में पूर्वी यूक्रेन में सक्रिय दिखा. वो रूस समर्थक अलगाववादियों की मदद कर रहा था. जब जून 2014 में यूक्रेन का एक सैन्य विमान हादसाग्रस्त हुआ, तो आरोप वैग्नर ग्रुप पर लगा.
वो कहते हैं, "यूक्रेनी सुरक्षा एजेंसी ने पूर्वी यूक्रेन में विद्रोही कमांडरों और रूसी अधिकारियों की फ़ोन पर जो बातें सुनीं उसके अनुसार ये वैग्नर ग्रुप का काम था. दिमित्री उत्किन को फ़ोन पर विमान गिराए जाने की पुष्टि की गई थी."
उस वक्त इस बात की पुख़्ता जानकारी नहीं थी कि वैग्नर ग्रुप का नियंत्रण किसके हाथों में था. हालांकि इसके बाद ये ग्रुप डेबाल्टसवा के अभियान में शामिल हुआ.
डेबाल्टसवा पूर्वी यूक्रेन के दो महत्वपूर्ण इलाक़ों दोनेत्स्क और लुहांस्क को जोड़ने वाला रेलवे हब है. इसे रणनीतिक तौर पर अहम माना जाता है.
किरिल कहते हैं, "ये शहर यूक्रेन के क़ब्ज़े में था. रूसी सेना के समर्थन से विद्रोही इस पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश में थे. उस वक्त वहां रूसी टैंकों का इस्तेमाल किया गया था. हाल में पता चला है कि वो वैग्नर ग्रुप के थे."
मिख़ायलोव कहते हैं कि खोजी पत्रकारों को पता चला है कि दिमित्री उत्किन, डेबाल्टसवा और पूर्वी यूक्रेन के दूसरे हिस्सों के बारे में जीआरयू यानी रूसी सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी को जानकारी दे रहे थे. तो क्या इसका मतलब ये है कि वैग्नर ग्रुप का नियंत्रण असल में जीआरयू के हाथों में था?
वो कहते हैं, "उन पर सीधे तौर पर जीआरयू का नियंत्रण था, वो उन्हें रिपोर्ट करते थे. कम से कम उस वक्त ऐसा ही था."
हालांकि डेबाल्टसवा की लड़ाई के वक्त तक वैग्नर ग्रुप उतना बड़ा नहीं था. लेकिन सीरिया में ये स्थिति बदल गई.

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सीरिया में वैग्नर ग्रुप की भूमिका
किरिल कहते हैं, "हमने कभी इस बात के सबूत नहीं देखे कि यूक्रेन की तरह प्रोफ़ेशनल रूसी सैनिकों ने लड़ाई के मैदान में पहली कतार में हिस्सा लिया हो. सीरिया में ये भूमिका वैग्नर ग्रुप ने निभाई थी. यूक्रेन में छोटे पैमाने पर अभियान के बाद वैग्नर ग्रुप अब कई बटालियन बड़ा हो चुका था. इनके पास आधुनिक हाथियार और हर बटालियन में क़रीब 400 लड़ाके थे. ये ज़मीन पर रूसी सेना की जगह ले रहे थे."
वैग्नर ग्रुप सीरियाई सेना के साथ जंग में था. ग्रुप के कुछ लोगों के अनुसार कथित चरमपंथी समूह इस्लामिक स्टेट के क़ब्ज़े से छुड़ाए इलाकों में सबसे पहले इसी ग्रुप के सदस्य घुसते थे.
लेकिन फिर इसका नुक़सान भी था, मौतों की संख्या बढ़ रही थी.
वो कहते हैं, "खोजी पत्रकारों की रिपोर्टों के अनुसार, उस वक्त रूस के रक्षा मंत्री वैग्नर ग्रुप से काफ़ी नाराज़ थे क्योंकि मरने वालों के रिश्तेदार उनके बारे में सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे थे. ये बात सार्वजनिक होने लगी कि सीरिया में रूसी सैनिक लड़ रहे हैं. हथियारों के लिए वैग्नर ग्रुप को मिल रही मदद बंद हो गई."
वॉशिंगटन पोस्ट और एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार वैग्नर ग्रुप ने अपनी रणनीति बदली और सीरियाई सरकार के साथ समझौता कर लिया. उन्हें पूर्व में मौजूद तेल और गैस के कुंओं को अमेरिका के समर्थन वाले कुर्द बलों के क़ब्ज़े से छुड़ाना था.
और फिर अहम मोड़ आया फ़रवरी 2018 में, सीरिया के कोनोको गैस प्लांट के नज़दीक कुर्द बलों के साथ तैनात अमेरिकी कमांडरों ने एक बड़ी फ़ौज को अपनी तरफ़ आते देखा. रेडियो पर उन्होंने लोगों को रूसी भाषा में बात करते सुना. ये वैग्नर ग्रुप के लड़ाके और सीरियाई सैनिक थे.
किरिल कहते हैं, "यहां ख़ूनी संघर्ष छिड़ गया. अमेरिकी सैनिक रूसी लड़ाकों पर हमले कर रहे थे. इससे रूस और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने का ख़तरा पैदा हो गया."
पेंटागन ने बताया कि रूसी अधिकारियों ने उन्हें भरोसा दिया है कि उस इलाक़े में उनका कोई सैनिक नहीं था.
वो कहते हैं, "फ़रात नदी के पश्चिम के इलाक़े और तेल के कुंए सीरियाई सरकार और वैग्नर ग्रुप के नियंत्रण में आ गए. वहीं पूर्वी इलाक़े अमेरिकी सेना समर्थित समूहों के क़ब्ज़े में थे. ये देखा गया कि तेल के कई कुंए अब भी कुर्द बलों के क़ब्ज़े से नहीं छुड़ाए जा सके थे."
यहीं से स्थिति थोड़ी जटिल हुई. अब तक ये पता नहीं चल सका है कि इस अभियान की इजाज़त किसने दी थी, या फिर वैग्नर ग्रुप अपनी मर्ज़ी से फ़ैसले ले रहा था.
लेकिन इसके बाद ग्रुप की रणनीति फिर एक बार बदल गई. अब ये सैन्य अभियानों की बजाय आर्थिक क्षेत्र में पंजे फैलाने लगा.

प्राकृतिक संसाधनों में दिलचस्पी
नटालिया एंटोनोवा बेलिंगकैट नाम की एक खोजी पत्रिका की संपादक रही हैं. जुलाई 2018 सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक में जिन तीन रूसी पत्रकारों को गोली मारी गई थी उनमें से एक उनके मित्र एलेक्ज़ेंडर थे जिन्हें साशा के नाम से जाना जाता था.
वो बताती हैं, "वो बर्बर हत्या थी, मैंने उनके शव की तस्वीरें देखी थीं. उनके सीने में गोली के निशान थे."
2017 में संयुक्त राष्ट्र ने सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक पर हथियारों को लेकर लगे प्रतिबंध हटाए और रूस को आधिकारिक तौर पर सरकारी सैन्यबलों को प्रशिक्षित करने और हथियार देने की इजाज़त दी.
वो कहती हैं, "साशा उस टीम का हिस्सा थे जो वहां चल रही गतिविधियों की पड़ताल कर रही थी. शक़ जताया जा रहा था कि विद्रोहियों वाले इलाक़े में हीरे और सोने की खदानों की सुरक्षा वैग्नर के लड़ाके कर रहे हैं."
सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक के अलावा सूडान और लीबिया में भी वो अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे. वो वहां हीरे, सोने और तेल की खदानों पर नियंत्रण की कोशिश कर रहे थे.
मतलब ये कि रूसी सरकार से जुड़े लोग और वहां के रईस दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपने पैर पसार रहे हैं और इसके लिए उन्हें सुरक्षा का भरोसा चाहिए. यहीं से वैग्नर ग्रुप की ज़रूरत दिखती है.
यानी दुनिया के ऐसे इलाक़े जहां सालों से संघर्ष चल रहा है और जो प्राकृतिक संसाधनों में धनी हैं, वहां वैग्नर भी मौजूद है. लेकिन क्या ये प्राइवेट आर्मी अब यूक्रेन में है?

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पुतिन और वैग्नर ग्रुप
किम्बरले मार्टिन, कोलंबिया यूनिवर्सिटी के बार्नर्ड कॉलेज में राजनीति शास्त्र की प्रोफ़ेसर हैं. वो कहती हैं कि पुतिन और वैग्नर ग्रुप को चलाने वालों के बीच क़रीबी रिश्ते बताए जाते हैं, लेकिन यूक्रेन में इनका इस्तेमाल जोख़िमभरा हो सकता है.
वो कहती हैं, "अगर मैं पुतिन की जगह होती तो मैं ऐसे लोगों का इस्तेमाल क़तई नहीं करती जो सीधे तौर पर मुझसे आदेश न लेते हों. हो सकता है कि पुतिन, ज़ेलेन्स्की की हत्या करवाना चाहते हैं. लेकिन उनकी जगह मैं होती तो अपने सबसे प्रशिक्षित ख़ुफ़िया अधिकारियों को भेजती."
किम्बरले कहती हैं कि इस तरह की भी ख़बरें हैं कि रूस युद्ध के लिए वॉलंटियर के रूप में मिलिटरी बैकग्राउंड वाले लोगों को बुला रहा है.
वो कहती हैं, "कुछ अफ़वाहें तो ये भी हैं कि वो सज़ायाफ़्ता लोगों, बेरोज़गारों और हिंसा में शामिल होने वालों को भी बुला रहे हैं. ये भी संभव है कि वो यूक्रेन में अफ़रातफ़री फैलाना चाहते हों. लेकिन ऐसा नहीं लगता कि पुतिन ऐसे लोगों को यूक्रेन में अहम अभियान की ज़िम्मेदारी देंगे. ये युद्ध पुतिन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और यहां जीतने के लिए उन्हें ऐसे ज़िम्मेदार और अनुशासित लोग चाहिए जो उनके आदेशों का पालन करें."
हालांकि किम्बरले कहती हैं कि स्पष्ट तौर पर ये कहना मुश्किल है कि यूक्रेन में वैग्नर ग्रुप मौजूद है या नहीं. वो कहती हैं कि यूक्रेन में फ़िलहाल दो स्तर पर जंग जारी है- पहला, सैन्य अभियान और दूसरा, इंफ़ॉर्मेशन वॉर.
वो कहती हैं, "आपको मानना होगा कि कुछ प्रोपेगैंडा भी है क्योंकि पुतिन रूस के लोगों को ये भरोसा दिलाना चाहेंगे कि युद्ध में हिस्सा लेने यूक्रेन गए उनके रिश्तेदार वहां से जीवित लौटेंगे. दूसरी तरफ़ वो ये भी चाहेंगे कि रूस के ज़्यादा सैनिक युद्ध में मारे न जाएं."

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अब किस हाल में है वैग्नर ग्रुप
हाल में ब्रितानी सैन्य ख़ुफ़िय़ा एजेंसी ने कहा था कि यूक्रेन में बड़ी संख्या में रूसी सैनिक हताहत हो रहे हैं और रूस उनकी जगह नए सैनिक भेजने की योजना बना रहा है. इसके लिए प्राइवेट आर्मी की मदद ली जा रही है.
वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि दो साल पहले तक वैग्नर ग्रुप असल में वैसा नहीं रहा जैसा पहले था. 2020 की शुरूआत से, इसका ढांचा कुछ ऐसा बन गया है कि रूसी सेना इसके ज़रिए ज़रूरत पड़ने पर निजी कॉन्ट्रैक्टर भाड़े पर लेती है. ये एक लचीली व्यवस्था है, कोई संस्था या ग्रुप नहीं."
किम्बरले मार्टिन मानती हैं कि वैग्नर ग्रुप, अब सच्चाई कम और कहानी ज़्यादा बन गया है. 2016 के बाद से, दिमित्री उत्किन की सार्वजनिक तौर पर कोई तस्वीर नहीं आई. हमें ये नहीं पता कि वो अभी इसके कमांडर हैं या नहीं, और ये भी कि वो जीवित हैं या नहीं.
किम्बरले कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि वैग्नर ग्रुप सच नहीं है, इसकी शुरुआत एक छोटी प्राइवेट आर्मी के तौर पर हुई थी जिसके कमांडर एक पूर्व जीआरयू अधिकारी थे. लेकिन वक्त के साथ ये ग्रुप अब इन्फ़ॉर्मेशन वॉर में शामिल हो गया है. वो रूसी लोगों को बताता है कि रूस को विदेशी अभियानों में सफलता मिल रही है. लेकिन मुझे लगता कि दुश्मनों के ख़िलाफ़ भी इसका इस्तेमाल किया जाता है."
मार्च 2016 में फ़ोन्टांका नाम की एक वेबसाइट ने दिमित्री उत्किन की एक तस्वीर पोस्ट की थी. वेबसाइट का दावा था कि उस वक्त को सीरिया या फिर रूस के मोल्किनो में हो सकते हैं. मोल्किनो में जीआरयू (रूसी सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसी) के दसवें इंडिपेन्डेंट स्पेशल फ़ोर्सेस ब्रिगेड का सैन्य अड्डा है.
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लौटते हैं अपने सवाल पर- वैग्नर ग्रुप आख़िर क्या है और इसके लड़ाके क्या वाकई यूक्रेन में मौजूद हैं?
ये ग्रुप ऐसे पूर्व सैनिकों को लेकर शुरू हुआ था जिन्होंने युद्ध और हिंसा देखी थी. वो या तो आम ज़िंदगी से तालमेल नहीं बिठा पाए थे या फिर क़र्ज़ में डूब गए थे.
उनके कमांडर रूस की ताक़तवर सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसी के पूर्व अधिकारी थे. इस ग्रुप ने पूर्वी यूक्रेन से लेकर सीरिया और सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक जैसे संघर्षग्रस्त इलाक़ों में अपने पैर फैलाए. ये संघर्ष में शामिल हुए, सोने-हीरे की खदानों की सुरक्षा में भी लगाए गए.
हो सकता है कि इस ग्रुप के लड़ाके अभी यूक्रेन में हों, या फिर न हों. शायद इससे फ़र्क़ भी नहीं पड़ता. हालांकि ये भी सच है कि युद्ध के मैदान में सच जान पाना आसान नहीं.
लेकिन युद्ध से संबंधित इन्फ़ॉर्मेशन वॉर में वैग्नर ग्रुप दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है. इसके ज़रिए रूसी नागरिकों को बताया जा रहा है कि रूसी सैनिकों की जगह दूसरे अनुभवी लड़ाके जंग लड़ रहे हैं.
वहीं दूसरी तरफ़ विरोधियों को ये समझने देना कि अपने क्रूर तरीकों के लिए जाने जाने वाले वैग्नर ग्रुप के लड़ाके यूक्रेन में हैं, उन्हें ये इशारा देना है कि पुतिन हर हाल में इस युद्ध को जीतना चाहते हैं.
प्रोड्यूसर - मानसी दाश
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