हल्दी से कैंसर का इलाज, क्या मुमकिन है?

हल्दी के गुणों पर कई प्रयोग किए गए

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भारत समेत सभी दक्षिणी एशियाई देशों की रसोई में हल्दी का इस्तेमाल होता है. लेकिन क्या हल्दी सिर्फ स्वाद के लिए इस्तेमाल होता है या फिर ये हमारा स्वास्थ्य बेहतर करने से लेकर हमें कैंसर तक से बचा सकती है.

आपको हजारों ऐसे लेख मिल जाएंगे, जिनमें ये बताया गया है कि हल्दी किस तरह से सीने में जलन,अपच से लेकर गंभीर बीमारियों-डाइबिटीज, डिप्रेशन,अलजाइमर तक का इलाज कर सकती है. यहां तक कि इससे कैंसर का भी इलाज हो सकता है.

हल्दी पर हजारों अध्ययन हो चुके हैं. माना जाता है कि इसमें मौजूद एक यौगिक इसके औषधीय गुणों के लिए जिम्मेदार है. यह है- करक्यूमिन.

चूहों पर हुए प्रयोग में पाया गया है कि करक्यूमिन की काफी अधिक मात्रा उनमें कई तरह के कैंसर को बढ़ने से रोकने में सफल रही है. लेकिन हल्दी में दो-तीन फीसदी करक्यूमिन होता है और जब हम इसे खाते हैं तो उतनी भी मात्रा में ये हमारे शरीर में अवशोषित नहीं होती. हालांकि लिखित अध्ययनों में बहुत कम जगह ये बताया गया है भोजन में हल्दी की सामान्य मात्रा कितनी होनी चाहिए.

इसलिए क्या थोड़ी मात्रा में हल्दी का लगातार इस्तेमाल हमारे स्वास्थ्य को बेहतर सकता है या फिर हमें हल्दी मिले सप्लीमेंट या करक्यूमिन का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि बीमारियां दूर रहें.

माइकल मोज़ली, प्रेजेंटर, बीबीसी टू

कैसे की गई रिसर्च?

ये जानने के लिए हमने ब्रिटेन में हल्दी के स्वास्थ्य पर होने वाले असर के बारे में हो रही रिसर्च का जायजा लिया.

हमने न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर एक रिसर्च शुरू की. इसमें 100 वॉलंटियर्स को शामिल किया गया. इनमें लोगों को तीन समूहों में बांटा गया.

पहले समूह को हर दिन एक चम्मच हल्दी खिलाई गई. दूसरे समूह को इतनी ही हल्दी सप्लीमेंट के तौर पर दी गई. तीसरे समूह को हल्दी बता कर कोई और चीज दी गई.

हमने उनके ब्लड सैंपल पर तीन टेस्ट किए. पहले टेस्ट में यह देखा गया कि हल्दी खाने वाले शख्स की रक्त कोशिकाओं ने जलन (Inflamation) का किस तरह प्रतिरोध किया और ये बताया कि उसका इम्यून सिस्टम कितना स्वस्थ है.

इससे ये जानने में मदद मिल सकती थी कि क्या हल्दी जलन को इतना अधिक घटा सकता है कि डाइबिटीज जैसी लंबी बीमारियों पर असर पड़ सके. यह टेस्ट न्यूकैसल यूनिवर्सिटी में पीबी बायोसाइंस ने विकसित किया था. इसे ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस टेस्ट कहते हैं.

दूसरे दौर के टेस्ट में श्वेत रक्त कोशिकाओं की गिनती की गई . डीएनए टेस्ट के लिए इसके नतीजों की जरूरत थी. लेकिन इसके विश्लेषण ने हमें रिसर्च में शामिल लोगों के इम्यून सिस्टम की स्थिति का भी संकेत दिया.

तीसरा टेस्ट यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की ओर से विकसित किया गया था. इसमें डीएनए के मेथिलेशन का पता लगाया गया. हल्दी के कैंसर रोधी गुण का पता लगाने के लिए यह रिसर्च की गई थी.

हल्दी पर प्रयोग
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न्यूकैसल यूनिवर्सिटी में जो ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस टेस्ट विकसित किया गया था. उसके मुताबिक रिसर्च में शामिल किए तीनों समूहों के लोगों में ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस का लेवल बराबर है.

हमारे इम्यून सिस्टम पर मौसम के बदलाव का असर होता है. सनबर्न ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस को बढ़ा देता है. छह सप्ताह में इस तरह का बदलाव सभी तीन ग्रुप के लोगों में दिखने लगा था.

श्वेत रक्त कोशिकाओं की गिनती से ये पता चला कि तीनों समूहों में इम्यून कोशिकाओं की कमी आई है. सभी समूहों में यह बराबर घटा है.

हल्दी के नाम पर कुछ और लेने वाले और हल्दी सप्लीमेंट लेने वालों के डीएनए मेथिलेशन में कोई अंतर नहीं था. लेकिन जो लोग भोजन में हल्दी का इस्तेमाल कर रहे थे उनके मेथिलेशन पैटर्न में अंतर था.

यूसीएल के रिसर्चर ने एक जीन में नाटकीय बदलाव दिखा. और यह जीन चिंता, अस्थमा एक्जिमा और कैंसर के जोखिम से जुड़ा था. इस जीन की गतिविधियों में बदलाव दिख रहा था.

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क्या रहे नतीजे?

ये कहना जल्दबाजी होगी कि इसका सकारात्मक असर होता है या नकारात्मक है लेकिन हल्दी की वजह से जीन की गतिविधियों में ये बदलाव फायदेमंद साबित हो सकता है.

लेकिन यहां एक बात बता देना जरूरी है. रिसर्चरों ने रिसर्च में शामिल लोगों के ब्लड सैंपल में करक्यूमिन ( और हल्दी से जुड़े दूसरे यौगिक) के स्तर का विश्लेषण नहीं किया था .

एक वजह यह भी हो सकती है कि जो लोग भोजन बनाने में हल्दी का इस्तेमाल कर रहे थे उन्होंने अपना आहार बदला हो. इससे मेथिलेशन बदल गया. हालांकि यह हल्दी का असर नहीं था.

हल्दी का पौधा

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भोजन में हल्दी और हल्दी सप्लीमेंट के इस्तेमाल में क्या फर्क है?

यह समझा जाता है कि भोजन बनाने में हल्दी का इस्तेमाल हमारे शरीर में करक्यूमिन अवशोषित करने का स्तर तय करता है. करक्यूमिन लिपोफिलिक होता है. इसका मतलब यह वसा से बंधा होता है. लिहाजा जब हम भोजन बनाने में तेल का इस्तेमाल करते हैं करक्यूमिन तेल से बंध जाता है और यह आसानी से हमारे पेट में अवशोषित हो जाता है. काली मिर्च भी यह काम कर सकती है. इसमें मौजूद पिपरिन नाम का एक यौगिक ये काम कर सकता है. यह हमारे शरीर में और अधिक करक्यूमिन अवशोषित कराने में मदद करता है. इसलिए हल्दी, काली मिर्च और तेल को मिलाकर खाना बनाने अच्छा कॉम्बिनेशन साबित हो सकता है.

रिसर्च को लेकर काफी उत्साह था क्योंकि इसके जरिये यह पता किया गया था कि हल्दी हमारे जीन के व्यवहार पर किस तरह का असर डाल रहा है और इससे हमारे स्वास्थ्य को पहुंचाने का इसका क्या मैकेनिज्म है.

इन अध्ययनों से पता चला कि कैंसर विकसित होने से रोकने वाली चीज के तौर पर हल्दी पर आगे रिसर्च किया जा सकता है. यानी इसमें कैंसर का विकास रोकने की क्षमता हो सकती है.

हल्दी

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हल्दी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकती है

हालांकि कैंसर ( या हृदय रोग) जैसी लंबे समय में विकसित होने वाली बीमारियों का जोखिम घटाने का रास्ता तलाशना काफी मुश्किल होता है. इसलिए कोई भी ऐसी जांच जो इन बीमारियों के बारे में शुरुआती चेतावनी सही-सही देती हो या फिर जो इतनी संवेदनशील हों कि इससे जुड़े जोखिम में हल्के परिवर्तन के के बारे में बताती हो, काफी अहम होती है.

रिसर्च के नतीजे ये भी बताते हैं कि कम मात्रा में हल्दी लगातार खाने पर हमारे शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. अभी यह रिसर्च शुरुआती दौर में है.

लेकिन यह कहा जा सकता है कि हल्दी आपको कई पुरानी बीमारियों से बचाने में मदद कर सकती है. इसलिए भोजन में हल्दी का इस्तेमाल आपके स्वास्थ्य को बेहतर बना सकता है.

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