मसाले खाने से हमारी इम्युनिटी अच्छी होती है?

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- Author, जेसिका ब्राउन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
इंसान सदियों से मसालों का इस्तेमाल करता आया है. हल्दी और मिर्च के बिना तो भारत में किसी पकवान की कल्पना भी नहीं की जा सकती.
बहुत से मसाले तो एशिया से ही सारी दुनिया को नसीब हुए हैं. मसाले न सिर्फ़ खाने को स्वादिष्ट बनाते हैं बल्कि हमारी सेहत के लिए भी मुफ़ीद बताए जाते हैं. इस दावे को लेकर हर तरह के मसालों पर रिसर्च भी ख़ूब हुई है.
हाल के दिनों में मसालों को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं. जैसे, नींबू का रस पानी में मिलाकर पीने से वज़न कम हो जाता है. हल्दी वाला दूध पीने से किसी भी तरह के दर्द में आराम मिलता है. गला ख़राब हो तो अदरक वाली चाय इसका रामबाण इलाज है. वग़ैरह-वगैरह.
बताया जाता है कि 2016 में अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में प्रचार के दौरान हिलरी क्लिंटन ख़ुद को बीमारियों से बचाने के लिए हर रोज़ एक लाल मिर्च खाती थीं.
हल्दी, जो एशिया में सदियों से इस्तेमाल हो रही है, अब सुपरफ़ूड की श्रेणी में आ गई है. दुनिया भर के कॉफ़ी शॉप में 'गोल्डन लाते' के नाम से हल्दी वाली कॉफ़ी परोसी जाने लगी है.

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मसालों का असल में कितना फ़ायदा?
इन दिनों तो हल्दी के गुणों को लेकर ये मैसेज ख़ूब वायरल भी हो रहा है कि हल्दी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का सबसे अच्छा माध्यम है.
क्या सच में मसाले हमारे खाने को स्वादिष्ट बनाने के साथ-साथ हमें बीमारियों से भी बचाते हैं? या कोई मसाला हमें नुक़सान भी पहुंचा सकता है?
मसालों में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होनी वाली चीज़ है -लाल मिर्च. बहुत सी रिसर्च में मिर्च से सेहत को होने वाले फ़ायदों पर भी चर्चा हुई है. लेकिन इसके फ़ायदे और नुक़सान दोनों हैं.
लाल मिर्च में सबसे अहम तत्व है- कैपसाइसिन. जब हम मिर्च खाते हैं तो कैपसाइसिन शरीर में तापमान का तालमाल बैठाने वाली कोशिकाओं के संपर्क में आता है और दिमाग़ को गर्मी महसूस करने का सिग्नल देता है.
कुछ रिसर्च का ये भी दावा है कि कैपसाइसिन इंसान को लंबे समय तक जीवित रखने में सहायक है.

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लाल मिर्च के फ़ायदे
2019 में इटली में हुई रिसर्च के मुताबिक़, जो लोग हफ़्ते में चार दिन, लाल मिर्च में बना खाना खाते हैं, उनकी समय से पहले मौत का ख़तरा कम होता है.
इसी तरह की एक और रिसर्च 2015 में चीन में की गई थी. यहां ये रिसर्च लाल मिर्च का सेवन करने वाले क़रीब पांच लाख सेहतमंद लोगों पर की गई थी.
रिसर्च में पाया गया कि जो लोग हफ़्ते में एक दिन मिर्च खाते हैं, उनकी तुलना में हर रोज़ मिर्च का सेवन करने वालों की उम्र ज़्यादा होती है. यानी ऐसे लोगों में कैंसर, दिल की बीमारियां और सांस संबंधी बीमारियां काफ़ी कम होती हैं.
मगर इस बात का ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि सेहत बचाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा लाल मिर्च का इस्तेमाल शुरू कर दिया जाए.
कहने का मतलब ये है कि मिर्च वाले खानों का सेवन करने से मेटाबॉलिक एक्टिविटी यानी खाना पचाने की क्रिया दुरुस्त रहती है. कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रहता है जिससे दिल की बीमारियों की आशंका कम हो जाती है.
एक रिसर्च में ये भी कहा गया है कि कैपसाइसिन शरीर में ऊर्जा का स्तर बढ़ा देती है जो कि हमारा शरीर किसी काम के दौरान जलाता रहता है. ये हमारी भूख को भी कम रखता है.
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बहुत ज़्यादा मिर्च खाने से भी बचें
क़तर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर ज़ुमिन शी कहती हैं कि मिर्च मोटापे की शिकायत दूर करता है और हाई ब्लड प्रेशर वालों के लिए भी सहायक है. लेकिन प्रोफ़ेसर जुमिन शी ये भी कहती हैं कि जो लोग मिर्च का सेवन ज़्यादा करते हैं उनका दिमाग़ बहुत तेज़ काम नहीं करता.
ख़ास तौर से याददाश्त के मामले तो हालत और भी ख़राब हो जाते हैं. वो कहती हैं जो लोग हर रोज़ 50 ग्राम मिर्च खाते हैं उनके लिए ख़तरा बहुत ज़्यादा है.
इसके अलावा मिर्च खाने के बाद अक्सर लोगों को जलन की शिकायत होती है. ये बात भी रिसर्चरों के लिए काफ़ी दिलचस्प है. थोड़ी बहुत जलन का होना स्वाभाविक है.
जैसा कि हम कैफ़ीन के मामले में देखते हैं. कैफ़ीन का सेवन के साथ ही हमारे मेटाबोलिज़्म को बढ़ा देता है, जिसकी वजह से हमें लगता है कि हम काम के लिए फिर से तरोताज़ा हो गए हैं.
2014 की एक रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि अभी तक ये साफ़ नहीं है कि अगर हम कम मात्रा में मिर्च लेते हैं तो उसका हमें कितना फ़ायदा होता है.

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हल्दी के कितने फ़ायदे?
इसी तरह हल्दी को सर्वगुणसंपन्न कहा जाता है. हल्दी में क्योरक्यूमिन नाम का तत्व बड़ी मात्रा में पाया जाता है. इसके छोटे-छोटे अणु जलन, तनाव, दर्द और भी कई तरह की तकलीफ़ें दूर करने में काफ़ी सहायक होते हैं.
हल्दी के अनेक गुण गिनाए जाते हैं. लेकिन इससे जुड़े दावों कई ख़ामियां हैं.
लैब में किए गए कई अध्ययनों में पाया गया है कि क्योरक्यूमिन में कैंसर जैसी घातक बीमारी से लड़ने की क्षमता होती है. लेकिन लैब का वातावरण मानव शरीर से अलग होता है.
क्योरक्यूमिन पानी में आसानी से नहीं घुलती. इसका मतलब है कि जितनी हल्दी हम खाते हैं, उसका पूरा फ़ायदा हमारे शरीर को नहीं मिलता.
रिसर्चर फ़्रीडमेन के मुताबिक़ लोगों को ऐसा खाना पसंद आता है जो गर्म, ठंडा, सूखा और नमी वाला हो. वो इन सभी के बीच संतुलन चाहता है और खाने में यही काम करती है हल्दी.
मिसाल के लिए मछली ठंडा और गीला आहार है लेकिन उसे गर्म और सूखा बनाने का काम करते हैं मसाले.
इसके अलावा मसालों का आयुर्वैदिक महत्व भी है. भारत में तो हज़ारों साल से मसालों के इस महत्व को प्राथमिकता दी गई है. पश्चिमी देशों के लिए ये खोज बिल्कुल नई है. लिहाज़ा वो इसे नए दौर की दवाओं के तौर पर देख रहे हैं.

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दवा का विकल्प नहीं हैं मसाले
फ़्रीडमेन कहते हैं कि नए समाज का मसालों के प्रति बढ़ता रुझान हमें मध्यकाल के उस दौर में ले जा रहा है जहां आधुनिक दवाओं और पारंपरिक दवाओं के बीच एक मोटी दीवार थी. उस दौर में ख़ुद को आधुनिक कहने वाले आयुर्वेद और घरेलू नुस्ख़ों को अंधविश्वास समझे जाते थे.
एक वक़्त में हल्दी के औषधीय गुणों के लेकर बहुत हल्ला मचा तो रिसर्चर कैथरीन नेल्सन ने इस पर रिसर्च की. रिसर्च में उन्होंने पाया कि जब हल्दी खाने में अन्य मसालों के साथ पकती है तो उसके रासायनिक गुण बदल जाते हैं.
साथ ही अगर हल्दी में औषधीय गुण हैं भी तो वो क्योरक्यूमिन की वजह से नहीं हैं. हल्दी का ज़्यादा इस्तेमाल करने से नुक़सान नहीं होगा लेकिन इसे एक दवा के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह भी वो नहीं देतीं.
मिर्च और हल्दी के औषधीय पहलुओं पर जितनी भी रिसर्च हुई हैं वो सभी लैब में हुई हैं. मानव शरीर में इनका असर कुछ और होता है. लिहाज़ा इन दोनों के आपसी संबंध और कारणों के बीच ताल्लुक़ में कोई सीधा रिश्ता तलाशना मुश्किल है. साथ ही ये देखना भी ज़रुरी है कि हम हल्दी औऱ मिर्च का इस्तेमाल किस शक्ल में कर रहे हैं.
किसी भी मसाले का इस्तेमाल स्वाद और इच्छानुसार किया जा सकता है. लेकिन दवा समझकर इसका सेवन बिल्कुल ना करें.
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