रूस, यूक्रेन और नेटो से जुड़े 10 सवाल और उनके जवाब

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- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन पर हमले की किसी भी योजना से महीनों तक इनकार करते रहे. वो बार-बार कहते रहे कि यूक्रेन से सटी सीमा के पास रूसी सैनिक युद्धाभ्यास कर रहे हैं.
लेकिन गुरुवार को उन्होंने यूक्रेन में 'विशेष सैन्य कार्रवाई' करने का एलान कर दिया. उनके इस एलान के बाद यूक्रेन की राजधानी कीएव सहित देश के अन्य हिस्सों में धमाके गूंजने लगे.
रूस की तरफ़ से हुई ये कार्रवाई पुतिन के 'मिंस्क शांति समझौते' को ख़त्म करने और यूक्रेन के दो अलगाववादी क्षेत्रों में सेना भेजने के सोमवार के एलान के बाद हुई. रूस की तरफ़ से इन क्षेत्रों में सेना भेजने की वजह 'शांति कायम करना' बताया गया.
इससे पहले, रूस ने पिछले कुछ महीनों से यूक्रेन की सीमा पर हज़ारों सैनिकों को तैनात कर दिया था. उसके बाद से ही यूक्रेन पर हमले की अटकलें लगाई जा रही थीं.

1. रूस आख़िर यूक्रेन से नाराज़ क्यों हुआ?
रूस लंबे समय से यूरोपीय संगठनों ख़ासकर नेटो के साथ यूक्रेन के जुड़ाव का विरोध करता रहा है.
यूक्रेन की सीमा, पश्चिम में यूरोपीय देशों और पूर्व में रूस के साथ लगती है. हालांकि पूर्व सोवियत संघ का सदस्य और आबादी का क़रीब छठा हिस्सा रूसी मूल का होने के चलते यूक्रेन का रूस के साथ गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है.
यूक्रेन ने 2014 में जब अपने रूस समर्थक राष्ट्रपति को उनके पद से हटा दिया, तो उससे नाराज़ होकर रूस ने दक्षिणी यूक्रेन के क्राइमिया प्रायद्वीप को अपने क़ब्ज़े में ले लिया.
साथ ही, रूस ने वहां के अलगाववादियों को अपना समर्थन दिया, जिन्होंने पूर्वी यूक्रेन के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया. तब से रूस समर्थक विद्रोहियों और यूक्रेन की सेना के बीच चल रही लड़ाई में 14 हज़ार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

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2. पुतिन आख़िर चाहते क्या हैं
रूस लगातार यूक्रेन पर हमला करने की योजना की अटकलों को ख़ारिज करता रहा है. लेकिन अब जब यूक्रेन के कई शहरों पर रूस के हमले हो रहे हैं, तब ये सवाल सभी के मन में उठ रहा है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चाहते क्या हैं?
इसे समझने के लिए हमें 2014 में हुए घटनाक्रम को समझना होगा. उस समय भी रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था. उस वक़्त रूस समर्थक विद्रोहियों ने यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में एक अच्छे ख़ासे इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया था और तब से अभी तक इन विद्रोहियों से यूक्रेन की सेना की भिड़ंत लगातार हो रही है.
दोनों देशों के बीच टकराव टालने के लिए 'मिंस्क शांति समझौता' भी हुआ, लेकिन उसके बाद भी दोनों देशों का टकराव ख़त्म नहीं हुआ. व्लादिमीर पुतिन का तर्क है कि वो इसी वजह से वहां सेना भेजने को मजबूर हैं.
हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने यूक्रेन के अलगाववादियों के प्रभाव वाले इलाक़ों में 'शांति क़ायम' करने के उद्देश्य से रूस के सेना भेजने के तर्क को सिरे से ख़ारिज कर दिया है.
पश्चिमी देश पहले से इस बात की आशंका जताते रहे हैं कि रूस का यूक्रेन पर हमला तय है और वो इसके लिए 'फाल्स फ्लैग' अभियान का इस्तेमाल करेगा.
फॉल्स फ्लैग ऐसी राजनीतिक या सैन्य कार्रवाई होती है जिसके तहत जानबूझकर अप्रत्यक्ष रूप से कदम उठाए जाते हैं, ताकि हमला करने की नौबत आए तो इसके लिए अपने प्रतिद्वंद्वियों को दोषी ठहराया जा सके.
हाल में रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन को चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि उसने पूर्वी हिस्से में युद्ध की कार्रवाई बंद नहीं की, तो आगे होने वाले ख़ून-ख़राबे के ज़िम्मेदार यूक्रेन ही होगा.

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3. रूस की मांग क्या है?
1994 में रूस ने एक समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए यूक्रेन की स्वतंत्रता और संप्रभुता का सम्मान करने पर सहमति जताई थी.
लेकिन 2014 में रूस ने क्राइमिया पर यह कहते हुए क़ब्ज़ा कर लिया कि उस प्रायद्वीप पर उसका ऐतिहासिक दावा रहा है. यूक्रेन सोवियत संघ का हिस्सा रह चुका है.
अब पुतिन दावा कर रहे हैं कि यूक्रेन का गठन कम्युनिस्ट रूस ने किया था. उनका मानना है कि 1991 में सोवियत संघ का विघटन ऐतिहासिक रूस के टूटने के जैसा था.
पिछले साल एक लंबे आलेख में उन्होंने रूसी और यूक्रेनी लोगों को 'समान राष्ट्रीयता वाला' बताया था.
जानकारों का मानना है कि इस बात से पुतिन की सोच का पता चलता है. उस आलेख में पुतिन ने यह भी कहा कि यूक्रेन के मौजूदा नेता 'रूस विरोधी प्रोजेक्ट' चला रहे हैं.
पूर्वी यूक्रेन में चल रहे संघर्ष के लिए 2015 में हुए मिंस्क शांति समझौते के पूरा न होने से भी रूस नाराज़ है.
मुख्यभूमि से अलग इलाक़ों के चुनावों की स्वतंत्र निगरानी के लिए अब तक कोई समझौता नहीं हो सका है. रूस उन आरोपों से इनकार करता रहा है कि यह सब लंबे संघर्ष का हिस्सा है.
हाल के घटनाक्रमों के पीछ पुतिन का तर्क है कि यूक्रेन कभी एक पूर्ण देश था ही नहीं. उन्होंने यूक्रेन पर पश्चिमी देशों के हाथों की कठपुतली बनने का भी आरोप लगाया था.
कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहने के चलते यूक्रेन का रूस के समाज और संस्कृति से गहरा जुड़ाव रहा है. वहां रूसी भाषा बोलने वालों की संख्या भी अच्छी ख़ासी है. लेकिन 2014 में रूस के हमले के बाद से दोनों देशों के रिश्ते काफ़ी ख़राब हो गए.
2014 में रूस समर्थक माने जाने वाले यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति को सत्ता छोड़नी पड़ी थी. उसके बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था.

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4. अलगाववादी इलाक़ों को मान्यता देना ख़तरनाकक्यों?
माना जाता है कि अलगाववादियों के प्रभाव वाले लुहान्स्क और दोनेत्स्क इलाक़ों पर अब तक अपने समर्थकों के ज़रिए अप्रत्यक्ष रूप से रूस ही शासन कर रहा है.
पुतिन के इन इलाक़ों को आज़ाद क्षेत्र की मान्यता देने का एलान करने का मतलब यह है कि रूस पहली बार क़ुबूल कर रहा है कि उसके सैनिक उन इलाक़ों में मौजूद हैं. इसका मतलब यह भी है कि रूस अब वहां अपने मिलिटरी बेस बना सकता है.
मिन्स्क समझौते के अनुसार, यूक्रेन को उन इलाक़ों को विशेष दर्जा देना था, लेकिन रूस की कार्रवाई के चलते अब ऐसा शायद ही हो पाएगा.
हालात इसलिए भी ख़तरनाक माने जा रहे हैं क्योंकि विद्रोही केवल दोनेत्स्क और लुहान्स्क के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों पर ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य पर अपना दावा कर रहे हैं.
व्लादिमीर पुतिन ने भी अपने बयान में कहा, "हमने उन्हें मान्यता दे दी है. इसका मतलब यह है कि हम उनके सारे दस्तावेज़ को मान्यता दे रहे हैं."
रूस काफ़ी वक़्त से यूक्रेन पर पूर्वी हिस्से में 'जनसंहार' का आरोप लगाकर युद्ध के लिए माहौल तैयार कर रहा था. उसने विद्रोही इलाक़ों में लगभग 7 लाख लोगों के लिए विशेष पासपोर्ट भी जारी किए थे. माना जाता है कि इसके पीछे रूस की मंशा, अपने नागरिकों की रक्षा के बहाने यूक्रेन पर कार्रवाई को सही ठहराना है.

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5. रूस नेटो से क्या चाहता है?
रूस चाहता है कि यूक्रेन न केवल नेटो बल्कि यूरोपीय संघ और यूरोप की अन्य संस्थाओं के साथ भी न जुड़े. नेटो को लेकर रूस की दो मांगे हैं. पहला कि यूक्रेन नेटो का सदस्य न बने और दूसरा कि नेटो की सेनाएं 1997 के पहले की तरह की स्थिति में लौट जाएं.
रूस नेटो गठबंधन से कह रहा है कि पूर्व में अब वो अपनी सेना का और विस्तार न करे और पूर्वी यूरोप में अपनी सैन्य गतिविधियां बंद कर दे. इसके लिए रूस एक पुख़्ता और क़ानूनी रूप से मज़बूत भरोसा भी चाहता है.
रूस की इन मांगों को मानने का मतलब होगा कि नेटो को पोलैंड और बाल्टिक देशों एस्टोनिया, लात्विया और लिथुआनिया से अपनी सेनाएं वापस बुलानी होगी. साथ ही, पोलैंड और रोमानिया जैसे देशों में वो मिसाइलें भी तैनात नहीं रख पाएगा.
नेटो देशों पर रूस का आरोप है कि वे यूक्रेन को लगातार हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं और अमेरिका दोनों देशों के बीच के तनाव को भड़का रहा है.
यूक्रेन को नेटो का सदस्य न बनाने के बारे में रूस के उप विदेश मंत्री सेर्गेई रिबकोव ने हाल में कहा था, "हमारे लिए यह बेहद ज़रूरी है कि यूक्रेन कभी नेटो का सदस्य न बने." पुतिन ने भी कहा कि हम पीछे नहीं हटेंगे और क्या उन्हें सच में लगता है कि हम आराम से यह सब देखते रहेंगे?
पुतिन का यह भी तर्क है कि यदि यूक्रेन नेटो का हिस्सा बनता है, तो वह क्राइमिया पर दोबारा क़ब्ज़े की कोशिश कर सकता है.

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6. पुतिन की मांग पर नेटो ने क्या कहा?
फ़िलहाल 30 देश नेटो के सदस्य हैं. उनकी नीति 'हर किसी के लिए दरवाज़े खुले रखने' की है. ये सभी देश इस नीति से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.
यूक्रेन नेटो में शामिल होने को लेकर एक तय समयसीमा और संभावना स्पष्ट करने की मांग करता रहा है. लेकिन उस समय की जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने निकट भविष्य में ऐसा कुछ होने की संभावना से साफ़ तौर पर इनकार किया था.
किसी भी नेटो सदस्य देश का सदस्यता छोड़ना भी मुमकिन नहीं दिखता.
रूस के राष्ट्रपति का मानना है कि पश्चिमी देशों ने 1990 में ये वादा किया था कि पूर्व की ओर नेटो एक इंच भी विस्तार नहीं करेगा, लेकिन इस वादे को तोड़ा गया.
पुतिन जिस वक़्त की बात कर रहे हैं, उस समय सोवियत संघ अस्तित्व में था. तत्कालीन सोवियत राष्ट्रपति मिख़ाइल गोर्बाचेव के सामने पूर्वी जर्मनी के बारे में यह बात की गई थी. गोर्बाचेव ने बाद कहा भी था कि इस बैठक में नेटो के विस्तार को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई थी.

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7. रूस अब आगे क्या करेगा?
फ़िलहाल इस मामले का कोई कूटनीतिक समाधान निकलता नहीं दिख रहा. ताज़ा कार्रवाई के बाद आशंका जताई जा रही है कि रूस की सेना, यूक्रेन के पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी इलाक़ों पर हमला करते हुए वहां की चुनी हुई सरकार को हटाने की कोशिश कर सकती है.
यूक्रेन पर कार्रवाई करने के लिए रूस, क्राइमिया, बेलारूस और यूक्रेन की उत्तरी सीमा के पास भारी संख्या में सैनिक तैनात कर सकता है. लेकिन इस दौरान रूस को प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ सकता है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में यूक्रेन ने अपनी सेना को पहले से अधिक मज़बूत बनाया है.
इसके अलावा, उन्हें जनता का भी भारी विरोध झेलना होगा. यूक्रेन की सेना ने 18 से 60 साल की उम्र के अपने सभी रिज़र्व सदस्यों को बुला लिया है.
अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारी मार्क माइली का कहना है कि रूस के सैनिकों की भारी संख्या से शहरी आबादी वाले इलाक़ों में 'ख़तरनाक' हालात पैदा हो सकते हैं.
हालांकि रूस के पास दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं. मसलन, वह यूक्रेन को 'नो फ़्लाई ज़ोन' घोषित कर सकता है. वह वहां के बंदरगाहों को ब्लॉक कर सकता है या फिर पड़ोसी मुल्क बेलारूस में अपने परमाणु हथियार तैनात कर सकता है.
यह भी हो सकता है कि रूस, यूक्रेन पर साइबर हमला कर दे. इस साल के जनवरी में, यूक्रेन सरकार की वेबसाइट ठप पड़ गई थी. फ़रवरी के मध्य में यूक्रेन के 2 सबसे बड़े बैंकों की वेबसाइट को भी निशाना बनाया गया था.

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8. पश्चिमी देशों के पास क्या हैं विकल्प?
पश्चिमी देशों ने रूस की कार्रवाई को नियमों के विरुद्ध बताते हुए इसकी कड़ी आलोचना की. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी रूस की कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता पर हमला बताया.
नेटो गठबंधन की तरफ से ताज़ा घटनाक्रमों के बाद साफ़ किया गया कि यूक्रेन में सैनिकों को भेजने की उनकी कोई योजना नहीं है. हां, यूक्रेन को सलाह, हथियार और फ़ील्ड अस्पताल के ज़रिए मदद देने की बात उन्होंने ज़रूर की है.
इन सबके बाद यही लग रहा है कि रूस की कार्रवाई के बाद दुनिया के पास अब उस पर केवल प्रतिबंध लगाने का ही विकल्प बचा है.
जर्मनी ने रूस के नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन की मंज़ूरी को फ़िलहाल रोक दिया है.
यूरोपीय संघ भी रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने जा रहा है. रूस के उन 351 सांसदों को भी निशाना बनाया जा सकता है, जिन्होंने यूक्रेन के अलगाववादी इलाक़ों को मान्यता देने के दौरान रूस की संसद में पुतिन का साथ दिया.
अमेरिका ने कहा कि वो पश्चिमी वित्तीय संस्थानों से रूस का संपर्क काट रहा है. इसके अलावा, रूस में उच्च पदों पर बैठे लोगों पर भी कार्रवाई की तैयारी है. ब्रिटेन, रूस के 5 बड़े बैंकों और 3 अरबपतियों पर कार्रवाई कर रहा है.
अमेरिका रूस के वित्तीय संस्थानों और मुख्य उद्योगों पर नज़र बनाए हुए है. वहीं यूरोपीय संघ की नज़र फाइनेंशियल मार्केट पर है.
ब्रिटेन की ओर से चेतावनी दी गई है कि क्रेमलिन से क़रीबी रखने वालो लोगों को छिपने की भी जगह नहीं मिलेगी. उसने रूसी उद्योगों के डॉलर और पाउंड में व्यापार को सीमित करने की भी कोशिश की है.
वैसे तो आर्थिक रूप से रूस पर की गई कार्रवाई से उसके बैंकिग सिस्टम का कनेक्शन इंटरनेशनल स्विफ्ट पेमेंट से कट जाएगा, लेकिन अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्था पर भी इसका काफ़ी प्रभाव पड़ सकता है.
इधर बाल्टिक देशों और पोलैंड में नेटो ने 5 हज़ार सैनिक तैनात किए हैं. इसके अलावा, रोमानिया, बुल्गारिया, हंगरी और स्लोवाकिया में भी 4 हज़ार सैनिक भेजे जा रहे हैं.

9. पश्चिमी देश यूक्रेन का कहां तक साथ देंगे?
अमेरिका ने पहले कहा था कि वो यूक्रेन की 'संप्रभुता' सुरक्षित करने में उसकी मदद के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन यूक्रेन पर आक्रमण होने के बाद वह रूस पर प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन तक हथियार पहुंचाने और सलाह देने जैसी मदद ही कर रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने रूस को चेतावनी दी थी कि रूस ने यदि यूक्रेन पर हमला किया, तो उस पर ऐसे प्रतिबंध लगाए जाएंगे, जिनके बारे में कभी देखा-सुना नहीं गया होगा. लेकिन अब जब हमला हो गया है तो वैसे प्रतिबंध क्या हो सकते हैं?
रूस के लिए सबसे बड़ा आर्थिक झटका ये हो सकता है कि रूस के बैंकिंग सिस्टम को अंतरराष्ट्रीय स्विफ़्ट पेमेंट सिस्टम से काट दिया जाए. ख़ैर ये आख़िरी उपाय हो सकता है, लेकिन लात्विया ने कहा है कि ऐसा करने से रूस को कड़ा संदेश मिलेगा.
रूस के साथ एक और सख़्ती ये भी की जा सकती है कि जर्मनी में रूस के नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन को लंबे वक्त के लिए रोक दिया जाए. जर्मनी के विदेश मंत्री एनालेना बेरबॉक ने साफ़ कहा कि रूस ने यदि कोई सैनिक कार्रवाई की तो इस पाइपलाइन पर काम शुरू नहीं हो पाएगा.
रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फ़ंड या रूबल को विदेशी मुद्रा में बदलने वाले बैंकों पर प्रतिबंध लगाने वाले क़दम भी अपनाए जा सकते हैं.

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10. क्या पश्चिमी ताक़तें मिलकर उठा पाएंगी क़दम?
अमेरिका ने पहले कहा था कि वो अपने सहयोगियों के साथ मिलकर काम करने को प्रतिबद्ध है, लेकिन अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद हैं.
यूरोपीय नेता ज़ोर देकर कहते रहे हैं कि रूस अपने भविष्य को केवल अमेरिका के साथ मिलकर तय नहीं कर सकता. फ्रांस का प्रस्ताव रहा है कि यूरोपीय शक्तियों को नेटो के साथ मिलकर चलना चाहिए और तब रूस के साथ बात होनी चाहिए.
यूक्रेन के राष्ट्रपति ने पहले प्रस्ताव दिया था कि इस संकट का हल खोजने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया जाए, जिसमें रूस के साथ फ्रांस और जर्मनी भी शामिल हों. इन चारों देशों के नेता नियमित तौर पर मुलाक़ातें करते रहे हैं, जिन्हें 'नॉरमैंडी चौकड़ी' कहा जाता रहा है.
लेकिन राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मांग है कि यूक्रेन पर कोई भी समझौता तभी होगा, जब नेटो से संबंधित उनकी मांगें मानी जाएंगी. वैसे नेटो रूस की मांग को मानता हुआ तो अभी नहीं दिख रहा.

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