रूस-यूक्रेन संकट को लेकर ब्रिटेन इतना परेशान क्यों है

यूक्रेन संकट

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    • Author, जेम्स लैंडेल
    • पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता

दूसरे पश्चिमी देशों की तरह ब्रिटेन भी यूक्रेन की सहायता कर रहा है. अगर रूस, यूक्रेन पर हमला करता है तो ब्रिटेन आर्थिक प्रतिबंध लगाएगा, ऐसी चेतावनी ब्रिटेन की तरफ़ से रूस को दी जा रही है.

ब्रिटेन, यूक्रेन को टैंक रोधी हथियार और बख़्तरबंद गाड़ियां भी मुहैया करा रहा है. ऐसा भी वादा किया गया है कि अगर रूस की सेना यूक्रेन की सीमा में घुसती है तो ब्रिटेन भी नेटो सैन्य गठबंधन के अपनी फौज़ भेजेगा.

आख़िर ब्रिटेन इस संभावित संघर्ष में क्यों शामिल हो रहा है?

साल 1938 में जर्मनी के चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण की कोशिश पर ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री नेविल चेम्बरलेन की टिप्पणी की लंबे समय तक आलोचना हुई थी. उन्होंने इसे कुछ इस तरह बताया था- "एक दूर के देश में उन लोगों के बीच झगड़ा जिनके बारे में हम कुछ नहीं जानते."

लेकिन उनकी ये टिप्पणी सभी नीति-निर्माताओं के लिए एक चुनौती की तरह है. ये इसलिए क्योंकि ये सोचने को मजबूर करती है कि क्या दो देशों के बीच चल रहे संघर्ष में कूटनीतिक रूप से और यहाँ तक की सैन्य रूप से शामिल होना चाहिए. इसके नतीजे दूरगामी हो सकते हैं.

यहाँ ऐसे कारणों की बात करते हैं जिसकी वजह से रूस और यूक्रेन में चल रहा गतिरोध ब्रिटेन के लिए चिंता की वजह है.

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ब्रिटेन से दूरी

यूक्रेन, यूरोपीय महाद्वीप का हिस्सा है. इसलिए ज़्यादा दूर भी नहीं है. भले ही यूक्रेन यूरोपियन यूनियन या नेटो का सदस्य नहीं है, लेकिन वो यूरोपीय देशों का सहयोगी है और वहाँ पश्चिमी देशों के समर्थन वाली सरकार है.

ज़्यादातर यूरोप की तरह, यूक्रेन में भी लोकतंत्र है. यूक्रेन के ज़्यादातर लोग अपने देश को रूस का हिस्सा बनने नहीं देना चाहते.

साथ ही यूके के साथ इसके घनिष्ठ संबंध हैं. पिछले हफ़्ते जब 2,000 एंटी-टैंक हथियार यूक्रेन को यूके की तरफ़ से दिए गए साथ ही 30 ब्रिटिश सैनिकों का दल यूक्रेनी सेना को हथियार चलाना सिखाने के लिए पहुंचा. तो यूक्रेन में ट्विटर पर ''गॉड सेव द क्वीन'' ट्रेंड करने लगा. कीव के कुछ बार और रेस्टोरेंट में तो ब्रिटेन के पासपोर्ट वाले किसी भी व्यक्ति को मुफ़्त में ड्रिंक ऑफर किए जा रहे थे.

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क़ानूनी दायित्व

यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना ब्रिटेन का कानूनी कर्तव्य है.

साल 1994 में बुडापेस्ट में हुई एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था.

इसमें ''यूक्रेन की मौजूदा सीमाओं की स्वतंत्रता और संप्रभुता का सम्मान करने'' का वादा किया गया था.

दोनों देशों ने ये भी वादा किया था कि अगर यूक्रेन को किसी तरह के आक्रमण का सामना करना पड़ा तो दोनों देश उसे सहयोग प्रदान करेंगे.

ये समझौता किसी तरह की संधि नहीं है. लेकिन ये यूक्रेन के समर्थन में ब्रिटेन की औपचारिक, सार्वजनिक और लिखित प्रतिबद्धता है.

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यूरोप की सुरक्षा

यूरोप की सीमा को किसी फौज़ के द्वारा दोबारा निर्धारित करने का ब्रिटेन विरोध करता है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप की सुरक्षा का मूल सिद्धांत था कि संप्रभु राष्ट्रों को अपनी पसंद बनाने का अधिकार है. इसे आत्मनिर्णय कहते हैं और इस सिद्धांत का शायद सबसे अहम पहलू ये है कि सीमाओं को आक्रमण करके बदला नहीं जा सकता है.

रूस ने साल 2014 में ऐसा किया था. जब उसने यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप पर कब्ज़ा कर लिया था. कई पश्चिमी नीति निर्माताओं को इस बात पर ख़ेद है कि इसे रोका नहीं जा सका लेकिन वो ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि इस तरह की घुसपैठ दोबारा न हो.

पिछले हफ़्ते एक भाषण में अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा था: ''रूस को उन सिद्धांतों का उल्लंघन करने की अनुमति देने से हम सभी और अधिक ख़तरनाक और अस्थिर समय में वापस चले जाएंगे."

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रूस की मांगों का विरोध

रूस की ज़्यादातर मांगें ब्रिटेन को अस्वीकार्य हैं. रूस चाहता है कि नेटो क़ानूनी रूप से वादा करे कि यूक्रेन कभी सदस्य नहीं बनेगा. ये भी चाहता है कि नेटो अधिकांश पूर्वी यूरोपीय देशों से अपनी सेना वापस ले ले.

लेकिन ये दोनों मांगें नेटो के प्रमुख सिद्धांतों को तोड़ देंगी. सिद्धांत ये है कि नेटो गठबंधन किसी भी ऐसे यूरोपीय देश के लिए खुला होना चाहिए जो इसमें शामिल होना चाहता है, और सभी नेटो सदस्य संप्रभु राष्ट्र होने चाहिए.

दूसरे शब्दों में, पूर्वी यूरोपीय सहयोगी देशों पर रूसी प्रभाव पड़ना यूके या नेटो के फ़ायदे में नहीं है.

जैसा कि प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने सांसदों से कहा है: "हम एक संपूर्ण और स्वतंत्र यूरोप के दृष्टिकोण से समझौता नहीं कर सकते. ऐसा नहीं है कि रूस ने यूक्रेन पर बंदूक तान रखी है तो हम यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को कमज़ोर होने देंगे.''

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व्यापक पैमाने पर युद्ध से बचना

कई विश्लेषकों का डर है कि यूक्रेन में युद्ध संभावित रूप से दूसरे यूरोप के देशों में फैल सकता है.

रूस इस संकट का इस्तेमाल नेटो देशों पर साइबर और दूसरे हाइब्रिड हमलों को शुरू करने के लिए कर सकता है. वो तीन बाल्टिक देशों - एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया में भी सेना भेज सकता है.

लड़ाई बेलारूस में फैल सकती है जहां रूसी सेना पहले से ही तैनात है. नेटो ताकतें पहले से ही गठबंधन के पूर्वी हिस्से में अपनी सेना मज़बूत करने का वादा कर रही है.

नेटो के सदस्य के तौर पर, ब्रिटेन को दूसरे नेटो सहयोगी देशों के बचाव में आना ही पड़ेगा.

बोरिस जॉनसन

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संभावित प्रवासी संकट

अगर यूक्रेन में युद्ध छिड़ गया और रूसी सेना ने देश के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया, तो वहाँ से लोग बड़े पैमाने पर भाग सकते हैं.

यूक्रेन के रक्षा मंत्री ओलेक्सी रेज़निकोफ़ ने बीबीसी हार्ड टॉक में बताया कि कई लाख लोग जा सकते हैं,

उन्होंने कहा, "ये आपदा सिर्फ़ यूक्रेन के लिए नहीं होगी, ये पूरे यूरोप के लिए होगी."

ऐसे में कुछ प्रवासी पड़ोसी देश पोलैंड और पूर्वी यूरोपीय देशों में रह सकते हैं, लेकिन कुछ लोग ब्रिटेन में भी आ सकते हैं.

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संदेश देना

पश्चिमी ताकतें इस बात से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं कि बाकी दुनिया इस संकट को करीब से देख रही है.

कुछ नेता यह देखना चाहते हैं कि एक संप्रभु राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करने के कोशिशों का पश्चिम के देश कितनी मजबूती से विरोध करते हैं.

कई विश्लेषकों का कहना है कि बीजिंग खास तौर से देख रहा है क्योंकि वह ताइवान को चीन के साथ फिर से जोड़ने की अपनी योजना तैयार करता आया है.

इस बात का डर है कि अगर रूस को यूक्रेन पर आक्रमण करने दिया जाता है तो ये दूसरे नेताओं के लिए एक संकेत हो सकता है कि दूसरे देशों में हो रहे संघर्ष में हस्तक्षेप करने वाली पश्चिमी शक्तियों के दिन खत्म हो गए हैं.

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उर्जा ''संकट'' की आशंका

ब्रिटेन को रूस से मुश्किल से ही कोई गैस मिलती है. इसका अधिकांश भाग उत्तरी सागर और नॉर्वे से आता है. लेकिन यूक्रेन में किसी भी तरह के संघर्ष से यूरोप की गैस आपूर्ति बाधित हो सकती है.

रूस से यूरोप में जो गैस आती है वो यूक्रेन के रास्ते से होकर आती है वो पाइपलाइन संघर्ष के वक्त क्षतिग्रस्त हो सकती है. रूस, पश्चिमी देशों के लिए आपूर्ति रोकने का भी तरीक़ा चुन सकता है.

यूरोप 'नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन' प्रोजेक्ट को रोक सकता है. ये गैस पाइपलाइन परियोजना बाल्टिक सागर से होकर पश्चिमी रूस से उत्तर-पूर्वी जर्मनी तक जाती है. अभी इस पाइपलाइन को रेगुलेटरी मंज़ूरी का इंतज़ार है.

इन सब व्यवधानों की वजह से यूरोप और ब्रिटेन में गैस की कीमतों में काफ़ी इजाफ़ा हो सकता है.

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