यूक्रेन संकट: कैसे पता लगेगा कि रूस के साथ जंग छिड़ चुकी है?

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दुनियाभर की निगाहें फिलहाल इस बात पर टिकी हुई है कि यूक्रेन को लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मंशा क्या है. संघर्ष बढ़ने की आशंका को देखते हुए अमेरिका अपने दूतावास के कर्मचारियों को बाहर निकाल रहा है. लेकिन रक्षा विशेषज्ञ जोनाथन मार्कस कहते हैं कि शायद यह संघर्ष पहले ही शुरू हो चुका है.
हर ओर चर्चा है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने का ख़तरा है. हर तरफ यह सवाल बरकरार है कि क्या रूस हमला करेगा? क्या राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हर कीमत पर युद्ध चाहते हैं या फिर कूटनीतिक रास्तों से शांति तक पहुंचा जा सकता है?
लेकिन रूस के राष्ट्रपति पुतिन का दिमाग़ कोई नहीं पढ़ सकता.
तो इसलिए यहां एक और सवाल खड़ा होता है कि यह कैसे पता चलेगा कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हो गया है?
टैंक घूम रहे हैं, रॉकेट दाग़े जा रहे हैं
जवाब साफ़ है.
यूक्रेन की सीमाओं को पार करते हुए रूस के टैंक, या बड़े पैमाने पर रॉकेट बैराज या यूक्रेन के ठिकानों पर रूसी हवाई हमले, यह दर्शाते हैं कि संकट बढ़ गया और संघर्ष अब नए चरण में पहुंच सकता है.
बेशक़ युद्ध छिड़ने पर पहला अलर्ट यूक्रेनी सेना की तरफ़ से ही आएगा लेकिन पश्चिमी देशों के सैटलाइट और खुफ़िया सूचना इकट्ठा करने वाले एयरक्राफ़्ट भी एक भीषण हमले की तैयारी के बारे में अच्छे से जानकारी दे सकते हैं.

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अमेरिका स्थित सेंटर फॉर नेवल एनालिसिस में रूसी सेना के विशेषज्ञ माइकल कोफ़मैन कहते हैं कि आने वाले समय में हमले के स्पष्ट संकेत देखने को मिलेंगे.
युद्ध शुरू हो चुका है यह कैसे पता लगाया जाए, इस सवाल पर माइकल कहते हैं, "पहला संकेत सैनिकों की संख्या में इज़ाफा होगा. चूंकि अभी सीमा पर सैन्यबल की बजाय भारी उपकरण तैनात किए गए हैं. इसके अलावा अन्य संकेत सैन्य बलों का हर ओर फैलाव, सहायक उपकरणों की आमद, फ़िक्स्ड-विंग और रोटरी एविएशन में बदलाव हो सकते हैं."
लेकिन इस सवाल का जवाब दूसरे तरीके से भी दिया जा सकता है. और इसके लिए हमें पीछे जाने और यूक्रेन के खिलाफ़ रूसी अभियान को पूरी तरह से देखने की ज़रूरत है.
हमें मॉस्को के पास उपलब्ध पूरे टूलकिट को देखना होगा और यह आकलन करना होगा कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है. और इसके बाद जब आप पूछेंगे कि हमें कैसे पता चलेगा कि संघर्ष शुरू हो चुका है, तो इसका जवाब हो सकता है कि यह पहले ही हो गया है.
दोनों देशों के बीच दुश्मनी पिछले कई सालों से चल रही है.

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सैन्य दबाव
वहीं से शुरू करते हैं, जहां हम हैं.
रूस पहले ही यूक्रेन का हिस्सा रहे क्रीमिया पर कब्ज़ा कर चुका है. इसके अलावा रूस डोनबास क्षेत्र में कीव विरोधी विद्रोहियों को सहायता भी प्रदान करता है.
असल में साल 2014 में यूक्रेनी सेना के ख़िलाफ रूस की भेजी बख्तरबंद और मशीनीकृत इकाइयों ने ही रूस समर्थक कीव विद्रोहियों को हार से रोका था. तब से ही छिटपुट लड़ाई जारी है.
माना जाता है कि वहां सभी पक्ष एक अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयास का समर्थन करते हैं, लेकिन इस दिशा में बहुत कम प्रगति हुई है.
भारी संख्या में सैन्य बलों की तैनाती
इस सैन्य दबाव के अलावा भारी संख्या में सैन्य बल की तैनाती का भी ख़तरा है.
यूक्रेन की सीमा के आसपास रूसी लड़ाकू फॉर्मेशन का निर्माण असाधारण है. इसमें बेलारूस में बलों की महत्वपूर्ण तैनाती भी शामिल है. बेलारूस की सीमा भी यूक्रेन से लगती है. यह यूक्रेन की राजधानी कीव की ओर हमले के लिए एक नज़दीकी बिंदु बन सकता है.
इस दबाव के अलावा, बड़ी तादाद में सैन्य बल की तैनाती का भी ख़तरा है.
यूक्रेन की सीमा के पास रूसी सैनिकों को जिस भारी संख्या में तैनात किया गया है, वो असाधारण है. बेलारूस में भी बड़ी संख्या में सेना की तैनाती भी शामिल है जिसकी सीमा यूक्रेन से लगती है. हमला करने की सूरत में वहाँ से यूक्रेन की राजधानी कीव पर धावा बोलना आसान हो सकता है.
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आसपास के देशों की सीमाओं पर सैन्य बलों की तैनाती को रूसी प्रवक्ता एक सामान्य अभ्यास बताते हैं और कहते हैं कि यह किसी को चेतावनी देने के लिए नहीं किया गया. लेकिन जिस पैमाने पर यहां सैन्य टुकड़ियां तैनात की गई हैं और जैसे इन्हें सहायता पहुंचाई जा रही है, उससे पता चलता है कि यह नियमित युद्धाभ्यास से कहीं अधिक है.
विश्लेषक उपग्रह तस्वीरों के ज़रिए इस सैन्य बल तैनाती पर नज़र बनाए हुए हैं. इंटरनेट पर मौजूद मोबाइल से बनाए गए कई वीडियो में यूक्रेन या बेलारूस की ओर उपकरणों से भरी ट्रेनों को जाते देखा जा सकता है. सोशल मीडिया पर पोस्ट हो रही सामग्री के आकलन और सीमा पर भारी मात्रा में पहुंच रहे सैन्य साजोसामान से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां चल क्या रहा है.
मॉस्को भले ही कुछ भी कहे लेकिन यूक्रेन और उसके दोस्त पश्चिमी देशों के पास चिंता के लिए एक नहीं कई वजहें हैं.
रूस बना रहा अपनी कहानी
एक तरफ़ रूस का कहना है कि वह युद्ध की तैयारी नहीं कर रहा, हालांकि बहुत हद तक वह ऐसा करता नज़र आ रहा है. लेकिन, उतनी ही महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उसके पास पेश करने के लिए एक अलग कहानी है. एक ऐसी कहानी जहां पीड़ित यूक्रेन नहीं है. बल्कि यह कहानी बताती है कि वास्तव में वह रूस है जिसे ख़तरा है.
यह अमेरिका को सौंपे गए उन दस्तावेजों का सार है, जो नेटो के विस्तार को रोकना चाहते हैं और कुछ मायनों में मास्को के लिए प्रभाव का एक नया क्षेत्र बनाना चाहते हैं.
रणनीतिक और अन्य हथियार प्रणाली को लेकर बातचीत जैसे रूस की चिंताओं के कुछ पहलुओं को अच्छे विचार के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इससे नेटो के विस्तार पर कोई बदलाव होने की संभावना नहीं है और संभवतः रूस भी यह अच्छे से जानता है.
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लेकिन रूस की कहानी का एक और उद्देश्य भी है. वो कहानी है जिसके ज़रिए वो यूक्रेन संकट पर जारी उन चर्चाओं को एक दिशा देने की कोशिश कर रहा है, जो ना सिर्फ पश्चिमी देश या उसके अपने नागरिक कर रहे हैं, बल्कि जिसकी चर्चा हम और आप भी कर रहे हैं, ये सब लिखते हुए और पढ़ते हुए.
सभी निष्पक्ष और कठोर स्वतंत्र विश्लेषणों से यह स्पष्ट है कि रूस यूक्रेन के साथ युद्ध की तैयारी कर रहा है, फिर चाहे उसके आधिकारिक प्रवक्ता कुछ भी कहें.
विध्वंस
रूसी टूलबॉक्स को लेकर एक अन्य आशंका भी मौजूद है. साइबर हमला और विध्वंस. उदाहरण के लिए संभव है कि यूक्रेन पर साइबर हमला किया गया हो. एक सप्ताह पहले ही बड़ी संख्या में सरकारी वेबसाइटों को निशाना बनाया गया था. हालांकि, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि यह हमला किधर से किया था.
हाल ही में यूके सरकार ने दावा किया था कि मॉस्को ने कीव में एक नई सरकार बनाने के लिए कुछ लोगों का चयन किया है. हालांकि, संदेह जिस भी बात का हो लेकिन इस तरह की गतिविधियों में मॉस्को के हाथ होने से संबंधित कोई ठोस सबूत नहीं है.
माइकल कोफ़मैन का कहना है कि साइबर अटैक रूसी हमले का एक अहम हिस्सा हो सकता है. क्योंकि वह सैन्य हमले को सफल करने के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को पंगु बनाकर यूक्रेन की क्षमता को बाधित कर सकते हैं.

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युद्ध और शांति साथ-साथ
जब रूस ने क्राइमिया पर कब्ज़ा किया था तो उस वक़्त "हाईब्रिड" और "ग्रे-ज़ोन वॉरफेयर" यानी ऐसा अभियान जो स्प्ष्ट नहीं था, उसकी और इससे कथित इनकार की काफ़ी चर्चा हुई थी. इसमें हिस्सा लेनेवालों ने वर्दी तो पहनी थी, मगर उनपर किसी सेना का कोई प्रतीक नहीं था.
लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ये सैनिक ही थे. और क्राइमिया पर पुराने ज़माने में जैसे सैन्य अभियान चलाए जाते थे, उसी तरह से क़ब्ज़े में किया गया था, ना कि किसी गुप्त अभियान से.
जो मौजूदा हालात हैं वह "ग्रे-ज़ोन युद्ध" के जैसे दिखते हैं, यानी जहाँ पता नहीं चलता कि युद्ध है या शांति.
मगर पश्चिम में चीज़ों को ऐसे नहीं देखा जाता.
मगर रूसी सेना ने एक ऐसी नीति में महारत हासिल कर ली है जहाँ युद्ध और शांति एक साथ नज़र आते प्रतीत होते हैं, जहाँ अलग-अलग मौक़ों पर अलग-अलग तरह के तरीक़ों को इस्तेमाल किया जाता है, कभी बारी-बारी से, कभी एक साथ, हालाँकि उन सबका रणनीतिक लक्ष्य एक ही होता है.
और इसलिए कहा जाना चाहिए की संघर्ष शुरू हो चुका है. देखना केवल ये है कि राष्ट्रपति पुतिन इस "ग्रे-ज़ोन" वाली स्थिति को कब तक खींचना चाहते हैं.
(जोनाथन मार्कस बीबीसी के पूर्व डिफेंस और डिप्लोमैटिक संवाददाता के साथ ही एक्सेटर यूनिवर्सिटी में स्ट्रैटजी एंड सिक्योरिटी इंस्टीट्यूट में मानद प्रोफ़ेसर हैं. )
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