रूस-यूक्रेन संकट: रूस से गैस नहीं आई तो ठंड से जम जाएगा यूरोप, हालात इतने ख़राब कैसे हुए?

रूस-यूक्रेन संकट, यूरोप का ऊर्जा संकट

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    • Author, अलेक्सी कालिमकोव
    • पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा

यूरोप का ऊर्जा संकट अब एक आर्थिक समस्या से राजनीतिक चुनौती में बदल गया है. पश्चिमी देश खुलेआम रूस पर 'गैस वॉर' छेड़ने का इलज़ाम लगा रहे हैं. जबकि क्रेमलिन इन आरोपों से इनकार करता है.

रूस ने पश्चिमी देशों के सामने एक तरह से अंतिम शर्त रख दी है कि यूरोप को अलग-अलग प्रभाव क्षेत्र वाले खांचों में बांटा जाए और गैस मार्केट में खेल के नियम बदले जाएं.

यूरोपीय देश अपनी आबादी और उद्योग, दोनों को ही बचाने के लिए युद्ध स्तर पर तैयारी कर रहे हैं और अमेरिका इस बात से खुश लग रहा है कि वो यूरोप को रूसी गैस के बदले ऊंची क़ीमतों पर इसकी सप्लाई का मौका मिलेगा.

वैश्विक ऊर्जा संकट की शुरुआत बीते पतझड़ के साथ ही शुरू हो गई थी. सर्दियां आते-आते हालात और बिगड़ गए. पहले गैस और अब तेल की क़ीमतों को भी आग लग गई है. यूरोप में ऊर्जा संसाधनों की इतनी कमी है कि आम लोगों से लेकर उद्योगों तक का बिजली और गैस बिल बेहिसाब बढ़ गया है.

ऐसे में ये सवाल पूछा जा सकता है कि यूरोप में अचानक क्यों गैस संकट गहरा गया और वो सर्दी में ठिठुरकर जम जाने की इंतेहा पर पहुंच गया? इसके कई कारण हैं.

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यूरोप का ऊर्जा संकट

दो वजहें तो अस्थाई किस्म की हैं. पहली कोरोना महामारी और दूसरा मौसम. और बाक़ी तीन वजहें ऐसी हैं जो काफी लंबे समय से अनसुलझी हैं. इसकी बुनियाद एनर्जी मार्केट में प्रतिस्पर्धा, यूक्रेनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और भविष्य की अर्थव्यवस्थाओं में हाइड्रोकार्बन की भूमिका को लेकर रूस और यूरोप के बीच जो सैद्धांतिक मतभेद हैं, उसी में है.

यूरोप का ऊर्जा संकट कब तक चलेगा? यूरोप को इसका नुक़सान उठाना पड़ेगा? गैस मार्केट में खेल के नियम कैसे बदलेंगे? और रूस की कमाई का प्रमुख स्रोत माने जाने वाले हाइडोकार्बन के इस्तेमाल को कम करने के लिए जिस ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा दिए जाने की बात की जा रही है, उसका भविष्य क्या है?

इन तमाम सवालों के जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि यूरोप और रूस के बीच जिन बुनियादी सवालों को लेकर मतभेद हैं, उसे कितनी जल्दी सुलझा लिया जाता है.

यूरोप को जितने प्राकृतिक गैस की ज़रूरत पड़ती है, उसका तकरीबन एक तिहाई रूस सप्लाई करता है. लेकिन बीते पतझड़ के बाद उसने गैस की आपूर्ति में बड़ी कटौती कर दी है.

15 जनवरी तक यूरोपीय देश क्रेमलिन पर 'गैस वॉर' शुरू करने का आरोप सीधे तौर पर लगाने से बचते दिख रहे थे लेकिन जैसे ही यूक्रेन को लेकर व्लादिमीर पुतिन के इरादे सामने आने लगे, पश्चिमी देशों ने यूरोप के ऊर्जा संकट के लिए रूस को सीधे जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया.

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साल 1973-74 का ऐतिहासिक तेल संकट

और कुछ समय पहले ही इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने साफ़ लफ़्जों में रूस को 'चालबाज़' करार दिया था. उनका कहना था कि यूरोप को रूस की ओर से गैस सप्लाई में कटौती और यूक्रेन को क्रेमलिन से बढ़ती धमकियों के बीच का कनेक्शन दिखाई दे रहा है.

उन्होंने कहा, "हमारा मानना है कि यूरोप के गैस मार्केट की समस्याएं रूस ने पैदा की हैं."

पिछले तीन महीनों में गैज़प्रोम ने रिकॉर्ड क़ीमतों के बावजूद यूरोप को सप्लाई की जाने वाली गैस में 25 फीसदी की कटौती की है. इतना ही नहीं यूरोप में जिन जगहों पर गैस स्टोर करके रखा जाता है, वहां भी सप्लाई रोकी गई ताकि क़ीमतें और बढ़ जाएं.

आईईए के प्रमुख का कहना है कि साल 1973-74 के ऐतिहासिक तेल संकट के बाद ये यूरोप के सामने सबसे बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा हो गया है.

साल 1973 के यॉम किप्पुर युद्ध में पश्चिमी देशों ने इसराइल का समर्थन किया था जिसके बाद अरब देशों ने पश्चिमी देशों को तेल बेचने से इनकार कर दिया था.

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आईईए की भूमिका

फातिह बिरोल की बात में काफी वजन है क्योंकि वे पश्चिमी देशों की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाले संगठन के प्रमुख हैं. आईईए का गठन इन्हीं हालात से निपटने के लिए किया गया था कि वो आने वाले संकट से विकसित देशों को आगाह कर सके और संकट से बचने के लिए साझा कोशिशों को अंज़ाम दे सके और अगर संकट पैदा हो जाए तो उसे जल्द से जल्द निपटाया जा सके.

पिछली आधी सदी में ये केवल तीन बार हुआ. दो बार जंग की सूरत में (1991 का खाड़ी युद्ध और साल 2011 का लीबिया संकट) और एक बार साल 2005 में कटरीना चक्रवात के बाद के हालात में.

एक ओर जहां पश्चिमी देश रूस पर संकट खड़ा करने का इलज़ाम लगा रहे हैं तो दूसरी ओर क्रेमलिन का कहना है कि यूरोप खुद इन हालात के लिए जिम्मेदार है.

रूस पश्चिमी देशों के आरोपों से इनकार करता है. उसका कहना है कि यूरोप के ऊर्जा संकट से उसका कोई लेना-देना नहीं है. रूस की दलील है कि यूरोपीय संघ, गैस सप्लाई करने वाली कंपनियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा लाने की कोशिशें और जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ लड़ाई इसके लिए जिम्मेदार हैं.

रूस के उपप्रधानमंत्री अलेक्ज़ेंडर नोवाक कहते हैं, "मैं इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी जैसी प्रतिष्ठित संस्था के प्रमुख से ऐसी बातें सुनकर हैरत में हूं. वे यूरोपीय उपभोक्ताओं की समस्याओं के लिए हम पर दोष मढ़ रहे हैं. न तो रूस और न ही गैज़प्रोम इसके लिए जिम्मेदार है."

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खुले बाज़ार की व्यवस्था

उधर, रूस की सरकारी गैस कंपनी गैज़प्रोम यूरोप को अतिरिक्त गैस आपूर्ति करने को लेकर कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखा रही है जबकि क़ीमतें अपने रिकॉर्ड स्तर पर हैं. पश्चिमी देशों के मन में ये विचार मजबूत हो रहा है कि रूस ने अपने कान बंद कर लेने का फ़ैसला कर लिया है.

व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, "इसका बाज़ार से कोई लेना-देना नहीं है. इसमें बाज़ार की शक्तियों की कोई भूमिका नहीं है. ये पूरी तरह से चालबाज़ी है."

यूरोपीय संघ के एंटी-ट्रस्ट नीतियों के लिए जिम्मेदार मार्ग्रेट वेस्टागेर भी कुछ ऐसी ही शंकाएं जाहिर करती हैं. वो कहती हैं, "जब मांग बढ़ने पर एक कंपनी आपूर्ति कम कर देती है तो बात समझ में आ जाती है. प्रतिस्पर्धात्मक बाज़ार में ऐसा बर्ताव शायद ही कोई करता है."

गैज़प्रोम की गैस सप्लाई का मॉडल लंबी अवधि वाले ठेकों के आधार पर चलता है. इस तरह के करार में क़ीमतें और आपूर्ति की मात्रा साल दर साल तय की जाती है. इसमें नए गैस फील्ड के विकास और नई पाइप लाइन बिछाने के लिए कर्ज़ें दिए जाने का भी प्रावधान रहता है.

लेकिन यूरोप चाहता है कि क़ीमतें बाज़ार की ताक़तें तय करें और वो खुले बाज़ार की व्यवस्था में गैस की खरीद-बिक्री का मॉडल अपनाना चाहता है जहां क़ीमतों और वॉल्यूम की कोई गारंटी नहीं होती है.

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यूरोप की ख़्वाहिश

इस व्यवस्था में मांग और आपूर्ति के आधार पर बाज़ार क़ीमत तय की जाती है. तेल बाज़ार भी इसी तरह से काम करता है. तेल बाज़ार में भी लंबी अवधि वाले कॉन्ट्रैक्ट काम करते हैं और यूरोप की ख़्वाहिश है कि उसके यहां का गैस बाज़ार भी इसी तरह से काम करे.

साल 2050 से यूरोपीय संघ ने सब कुछ स्टॉक एक्सचेंज के हवाले कर देने का लक्ष्य रखा है लेकिन रूस इस मॉडल का सख़्ती से विरोध करता है. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई मौकों पर अपना विरोध जाहिर कर चुके हैं और रूस अपने स्टैंड पर कायम है. उसके उपप्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने भी एक दिन पहले यही बात दोहराई है.

उन्होंने कहा, "यूरोपीय संघ का नज़रिया संकीर्ण है. वो लॉन्ग टर्म के कॉन्ट्रैक्ट वाली व्यवस्था की जगह शॉर्ट टर्म के स्पॉट कॉन्ट्रैक्ट वाला मॉडल अपनाना चाहता है. हमारे पास बहुत बड़े संसाधन हैं और हम आपूर्ति कर सकते हैं लेकिन उत्पादन के लिए किसी प्रोजेक्ट में निवेश की ज़रूरत होती है और किसी प्रोजेक्ट के मुनाफे वाली स्थिति में पहुंचने में वक़्त लगता है. और ये हमारी स्पष्ट रणनीति है."

रूस इस बात से भी नाराज़ है कि जर्मनी यूक्रेन को नज़रअंदाज़ करके बाल्टिक सागर से गुजरने वाली नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन की दूसरी परियोजना की मंज़ूरी को अटका रहा है. राष्ट्रपति पुतिन ने अक्टूबर में कहा था कि जैसे ही इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिलेगी यूरोप को गैस की आपूर्ति अगले ही दिन से बढ़ जाएगी.

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सर्दियां कैसे बीतेंगी?

चूंकि यूरोप ने अपने ऊर्जा संकट को बाज़ार की समस्या की जगह राजनीतिक समस्या के तौर पर देखा है इसलिए इससे लड़ने के लिए वो आपातकालीन उपाय भी कर रहा है.

मुद्रास्फीति, अर्थव्यवस्था में सुस्ती और असंतोष रोकने के लिए जनता और उद्योगों को सब्सिडी का आश्वासन दिया गया है. इटली ने इसके लिए चार अरब डॉलर और स्वीडन ने 20 लाख परिवारों के लिए 50 करोड़ डॉलर का बजट रखा है. जर्मनी भी उद्योगों को सब्सिडी का वादा किया है. उसने रूस-यूक्रेन संकट में यूरोपीय मूल्यों की रक्षा के लिए नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन छोड़ने की संभावना को भी खारिज नहीं किया है.

अभी तक यूरोप इस बात को लेकर आश्वस्त है कि भले ही रूस गैस की आपूर्ति न बढ़ाए तो भी बसंत के आने तक वो ठंड से जम नहीं जाएगा. लेकिन सवाल क़ीमत का है. ऊंची क़ीमतों ने अमेरिका को बाज़ार तलाशने का मौका दे दिया है.

अभी तक मध्य पूर्व और अमेरिका की लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) के लिए एशिया प्रमुख बाज़ार रहा था लेकिन यूरोप का बाज़ार इस समय इतना आकर्षक है कि मेक्सिको की खाड़ी से एशिया की ओर रवाना किए गए एलएनजी कैरियर्स प्रशांत महासागर के आधे रास्ते में रूट बदलकर पनामा नहर के रास्ते अटलांटिक की ओर रुख कर रहे हैं. चीन और ब्राज़ील के लिए गैस मार्केट में गुंजाइश दिख रही है.

इन सर्दियों में रूस ने यूरोप के लिए मुश्किल हालात पैदा करने की रणनीति बना ली है. आशंका इस बात की है कि ये संकट कहीं साल भर से ज़्यादा न खिंच जाए और यूरोप को इसकी बड़ी क़ीमत न चुकानी पड़ जाए.

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