नेटो का सदस्य होने के बावजूद जर्मनी क्यों नहीं दे रहा यूक्रेन को हथियार

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- Author, नॉर्बेर्टो पारेदेस
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ संवाददाता
यूक्रेन की सीमा पर हज़ारों की संख्या में रूसी फौज की तैनाती के बाद कई मुल्कों ने कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर वो यूक्रेन की सैन्य सहायता करेंगे.
ब्रिटेन ने यूक्रेन के लिए हथियार भेजे हैं. वहीं पहले ही यूक्रेन के लिए हथियार भेज चुके अमेरिका ने अब लिथुआनिया के पास मौजूद अमेरिकी हथियारों को यूक्रेन को देने की इजाज़त दे दी है.
लेकिन अमेरिका के अहम मित्र और यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी ने एस्तोनिया को जर्मनी में बने हथियार और गोलाबारूद, यूक्रेन भेजने के लिए इजाज़त देने से मना कर दिया है.
यूक्रेन के विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा ने जर्मनी के इस फ़ैसले की आलोचना की है और इसे "दुर्भाग्यपूर्ण" बताया है. ट्विटर पर उन्होंने लिखा कि जर्मनी इस कदम से रूस का "हौसला बढ़ा" रहा है.
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जर्मनी के इस फ़ैसले ने यूरोप में रूस के कदम को लेकर मतभेद की बात सामने ला दी है. चर्चा ये हो रही है कि रूस को एक बार फिर यूक्रेन पर हमला करने से रोकने को लेकर क्या किया जाना चाहिए, इसे लेकर यूरोपीय मुल्कों में स्पष्टता नहीं है.
वहीं रूस यूरोपीय देशों में ये विभाजन को फ़ायदे का सौदा मान रहा है.

यूक्रेन को लेकर यूरोप में मतभेद
बर्लिन स्थित यूरोपीयन काउंसिल ऑफ़ फ़ॉरेन रिलेशन्स में रीसर्च डायरेक्टर जेरेमी शेपिरो ने बीबीसी मुंडो को बताया, "अगर आपके विरोध एकजुट नहीं है तो ये आपके लिए हमेशा फायदे की बात है. अमेरिका और पूरा यूरोप इस मामले में एकमत नहीं है और जर्मनी का फ़ैसला इसका उदाहरण है."
बीते सप्ताह जब ब्रिटेन ने यूक्रेन के लिए अपने एंटी-टैंक हथियार भेजे तब उसके विमान जर्मन हवाईक्षेत्र से गुज़रकर जाने की बजाय डेनमार्क से होते हुए यूक्रेन पहुंचे.
इससे हथियारों को यूक्रेन पहुंचने में कुछ अधिक घंटों का वक़्त ज़रूर लगा लेकिन ब्रिटेन के लिए जर्मनी से इजाज़त लेने की प्रक्रिया का वक़्त बच गया. माना जा रहा है कि ऐसा किया जाता तो शायद उसे और अधिक वक़्त लग सकता था.
जेरेमी शेपिरो कहते हैं कि यूरोप पूरी तरह से रूस के ख़िलाफ़ नहीं है और उसे लेकर मतभेद मामूली है. हालांकि वो कहते हैं कि अब तक जितना "मतभेद दिखा" उससे रूस "खुश" है.

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नीति, जिसका हमेशा पालन नहीं होता
यूक्रेन को हथियार देने से मना करने को लेकर जर्मन अधिकारियों ने दशकों पुरानी एक नीति का हवाला दिया और कहा कि इसके अनुसार संघर्ष में शामिल दोनों पक्षों मे से किसी को भी वो हथियार नहीं दे सकते.
ये नीति द्वितीय विश्व युद्ध के दौर की है. हालांकि शेपिरो कहते हैं कि इस नीति को लेकर भी अपवाद हैं और ऐसा नहीं है कि जर्मनी ने हमेशा "पूरी तरह इसका पालन किया है."
2020 में फ्रैंकफर्ट पीस रीसर्च इंस्टीट्यूट की एक स्टडी में साल 1990 के बाद से देश की निर्यात नीति की जांच की गई थी. इस स्टडी के अनुसार जर्मनी ने अपनी ही नीति का "बार-बार उल्लंघन" किया है और यमन युद्ध में "जर्मनी में बने हथियारों का" इस्तेमाल हुआ था.

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"जर्मनी कर रहा है ग़लती"
वॉशिंगटन के जर्मन मार्शल फंड में राजनीतिक विश्लेषक और जर्मन इतिहासकार लियाना फिक्स ने बीबीसी मुंडो को बताया कि जर्मनी के नज़र से यूक्रेन को हथियार देने की इजाज़त न देने के उसके कदम से तनाव कम करने में मदद मिलेगी.
बीते शनिवार जर्मनी की रक्षा मंत्री क्रिस्टीन लेम्ब्रैश्ट ने कहा था कि जर्मनी प्रभावी तौर पर तनाव "कम करना" चाहता है और साथ ही ये भी कहा था कि हथियारों की सप्लाई करने से मौजूदा स्थिति को बेहतर करने में "किसी तरह मदद नहीं मिल पाएगी."
एक जर्मन अख़बार में छपे इंटरव्यू में लेम्ब्रैश्ट ने कहा था कि जर्मनी हथियारों की बजाय फ़रवरी में डॉक्टरों की एक टीम यूक्रेन भेजेगा.

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इससे पहले जर्मन विदेश मंत्री एनालेना बेरबॉक ने कहा था कि तनाव कम करने को लेकर रूस के साथ चर्चा के लिए जर्मन सरकार तैयार है.
लिथुआनिया की संसदीय राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की चेयरमैन लॉरिनास कासयोनास ने एक सरकारी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था, "जर्मनी रणनीतिक तौर पर एक बड़ी ग़लती कर रहा है और अपनी प्रतिष्ठा को ख़तरे में डाल रहा है."
वहीं लियाना फिक्स कहती हैं कि यूक्रेन और रूस के बीच के तनाव के मामले में जर्मनी का फ़ैसला काफी हद तक रूस से मिलने वाली गैस पर उसकी निर्भरता से जुड़ा है.
हाल में जर्मनी ने यूरोप और अमेरिका से गुज़ारिश की थी कि यूक्रेन पर रूस के आक्रामक रवैये को देखते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने को लेकर वो "विवेकपूर्ण" फ़ैसला लें.
फिक्स ने कहा, "जर्मनी सभी विकल्पों को लेकर विचार कर रहा है लेकिन ये काफी हद तक रूसी गैस पर निर्भर करेगा न कि और देशों के फ़ैसले पर."
उर्जा उत्पादों की खपत को देखा जाए तो जर्मनी में इसका एक-चौथाई हिस्सा गैस की खपत है, जिसका आधे से अधिक रूस से आयात किया जाता है.
ऐसे में रूस के ख़िलाफ़ किसी तरह की प्रतिक्रिया देने को लेकर जर्मनी कश्मकश में है, क्योंकि वो इस मामले में रूसी प्रतिक्रिया नहीं चाहेगा.
लियाना फिक्स कहती हैं, "रूस गैस का इस्तेमाल एक राजनीतिक हथियार के रूप में कर रहा है और जर्मनी के लिए स्थिति मुश्किल होती जा रही है क्योंकि रूस के साथ तनाव बढ़ा तो देश के भीतर संकट पैदा हो सकता है."

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गैस पाइपलाइन
जर्मनी तक गैस पहुंचाने के लिए रूस और जर्मनी नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन बिछा रहे हैं. बाल्टिक सागर के होकर गुज़रने वाली 1,225 किलोमीटर लंबी इस पाइपलाइन को बनने में पांच साल का वक़्त लगा है.
माना जा रहा है इसके काम शुरू करने के बाद रूस से जर्मनी को मिलने वाली वाली गैस यूक्रेन के रास्ते नहीं आएगी और उसकी मात्रा दोगुनी हो जाएगी. अभी जर्मनी को रूस से जो गैस मिलती है वो यूक्रेन से होकर आनेवाली पाइपलाइनों से आती है, इससे यूक्रेन की भी कमाई होती है.
लियाना फिक्स कहती हैं ये स्पष्ट है कि अगर रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो जर्मनी नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन को हरी झंडी न देने पर मजबूर हो जाएगा.
वे कहती हैं, "लेकिन अगर तनाव मामूली बढ़ा तो ये देखना होगा कि जर्मनी क्या करेगा? वो इस पाइपलाइन के प्रोजेक्ट को शुरू करने की अपनी योजना पर कायम रहेगा या नहीं?"

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जटिल संबंध
यूरोपीयन काउंसिल ऑफ़ फ़ॉरेन रीलेशन्स में रीसर्च डायरेक्टर जेरेमी शेपिरो भी मानते हैं कि जर्मनी यूक्रेन को हथियार देने की इजाज़त देकर मामले को किसी सूरत में बढ़ाना नहीं चाहेगा, लेकिन अगर रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया तो जर्मनी को अपना रूख़ बदलने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.
जानकार मानते हैं कि जर्मनी के साथ रूस के संबंध "जटिल" हैं और कई स्तरों पर हैं.
वो समझाते हैं, "दोनों के बीच के व्यापार जैसे मुद्दे जर्मनी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी अपनी समस्या भी है."
हाल में दिनों में जर्मनी और रूस के भीतर सबसे बड़ा तनाव अगस्त 2020 में सामने आया था, जब पुतिन से कट्टर आलोचक रहे एलेक्सी नवेल्नी को ज़हर की सूई दी गई थी और बर्लिन में उनका इलाज हुआ था. बताया जाता है कि उन पर नर्व एजेंट से हमला किया गया था और इसके पीछे रूसी सरकार का हाथ था.
लेकिन सच ये है कि जर्मनी के एकीकरण के बाद से रूस और जर्मनी के बीच ऐतिहासिक तौर पर बेहद क़रीबी रिश्ते रहे हैं.
हालांकि लियाना फिक्स कहती हैं कि साल 2014 से, जब रूस ने क्राइमिया पर हमला कर उसे अपने कब्ज़े में लिया था तब से दोनों के बीच रिश्तों में खटास आने लगी थी और एक तरह से जर्मनी का मोहभंग होने लगा.
वो कहती हैं, "दोनों के रिश्ते अब ख़ास से केवल व्यवहारिक रह गए हैं."

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रूस को लेकर जर्मनी में जो धारणा है वो बदल रही है, हालांकि ब्रिटेन और बाल्टिक देशों के मुक़ाबले यहां ये प्रक्रिया धीमी है.
जर्मन नेवी प्रमुख काई आखन सोनबर ने हाल में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लेकर बयान दिया जिसके लिए बाद में उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
मनोहर पर्रिकर डिफ़ेंस इंस्टीट्यूट फ़ॉर डिफ़ेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस में उन्होंने कहा था कि "रूसी राष्ट्रपति पुतिन सम्मान चाहते हैं. किसी को सम्मान देने में कोई लागत नहीं लगती है. यूक्रेन में रूस की कार्रवाई का समाधान ज़रूरी है. यूक्रेन से क्रीमिया जा चुका है और यह उसे कभी वापस नहीं मिलेगा. यही सच है."
जर्मन सरकार ने तुरंत उनके इस बयान से अपना पल्ला झाड़ लिया और कहा कि उनके इस बयान को "स्वीकार नहीं किया जा सकता." लेकिन कइयों का मानना है कि इस घटना ने जर्मनी के भीतर रूस को लेकर जारी द्वंद को सामने ला दिया है.

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फिक्स कहती हैं कि जर्मनी की विदेश नीति के अनुसार उसने हमेशा रूस के साथ अच्छे संबंध रखने की कोशिश की है, लेकिन "समस्या ये है कि रूस यूक्रेन की सीमा पर पहुंच गया है और वो जर्मनी के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है."
वे कहती हैं, "वहीं ट्रांसअटलांटिक गठबंधन यानी नेटो में जर्मनी की भूमिका को लेकर जो उम्मीद है, उसके दायरे में भी जर्मनी को रूस के साथ अपने संबंधों को लेकर फिर से सोचना पड़ सकता है."
ये भी सच है कि अगर रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो जर्मनी को पश्चिमी मुल्कों के सुर में सुर मिलाना पड़ेगा और रूस के ख़िलाफ़ कड़े प्रतिबंधों को मंज़ूरी देनी होगी.
जर्मनी ने एस्तोनिया को जर्मनी में बने हथियार यूक्रेन को देने से मना कर दिया है, लेकिन रूस को चेतावनी देने के मामले में उसने पश्चिमी मुल्कों का साथ देने से मना नहीं किया. उसने भी रूस को चेतावनी दी है कि अगर हमला किया तो उसे इसके "गंभीर परिणाम" भुगतने पड़ सकते हैं.
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