पूरी दुनिया में अचानक क्यों होने लगी प्राकृतिक गैस की कमी

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लगभग पूरी दुनिया इस समय ऊर्जा संकट का सामना कर रही है. कहीं प्राकृतिक गैस तो कहीं कोयले की कमी से ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करना चुनौती बन गया है.
भारत में भी कई पावर प्लांट पर कोयले की आपूर्ति कम होने की बात कही जा रही है. राज्य सरकारें इसे लेकर चिंता जाहिर कर चुकी हैं और कई बिजली संयंत्र कोयले की कमी का सामना कर रहे हैं.
इसी तरह प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है. जहाँ एक तरफ़ इसकी आपूर्ति पर्याप्त नहीं है वहीं इसकी मांग भी बढ़ती जा रही है और कीमतों में वृद्धि हुई है.

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यूरोप के देशों की मुश्किलें
यूरोपीय देश इस समय प्राकृतिक गैस के बड़े संकट का सामने कर रहे हैं. ये देश अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए अधिकतर अक्षय ऊर्जा, प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा पर निर्भर करते हैं. इसमें सबसे ज़्यादा हिस्सा प्राकृतिक गैस का है.
लेकिन, यूरोपीय देशों में फ़िलहाल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं है. सर्दियों में ये मांग और बढ़ने वाली है, जिसकी सबसे ज़्यादा मार मध्यम और निम्न आयवर्ग के लोगों पर पड़ सकती है.
प्राकृतिक गैस के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जिसका बोझ उपभोक्ताओं पर आना लाजमी है.
ब्रिटेन में बिजली के दाम बढ़ने वाले हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में 10 लाख से भी ज़्यादा परिवार अगले साल की शुरुआत में बिजली या अन्य ऊर्जा साधन उपयोग नहीं कर पाएंगे.
ऊर्जा नियामक ऑफजेम ने आगाह किया है कि लोगों को अगले साल फिर से उर्जा के दामों में बढ़ोतरी देखनी पड़ सकती है.
पिछले महीने, इस क्षेत्र में काम करने वालीं नौ कंपनियां बंद हो गईं. वो बढ़ते दामों के चलते आई बढ़ती लागत को नहीं झेल पाईं.

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यूके स्टील के डायरेक्टर जनरल ग्रेथ स्टेस ने कहा सरकार ऊर्जा कीमतों को काबू करने में विफल हुई है.
इसके साथ ही क़ीमतों पर लगी सीमा हटाने की बात कही जा रही है ताकि कंपनियों को घाटे के कारण बंद होने से बचाया जा सके.
जर्मनी में भी पावर प्लांट बंद हुए और उसे ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ रहा है. अमेरिका में प्राकृतिक गैस के दामों में बढ़ोतरी हुई है.
किसी देश में ऊर्जा ज़रूरतों को वर्तमान ही नहीं भविष्य को ध्यान में रखकर भी पूरा किया जाता है. लेकिन, अब अचानक पूरी दुनिया ऊर्जा संकट से जूझ रही है. उत्पादन कम है और क़ीमतें बढ़ रही हैं.
जानकार इसके पीछे कोई एक कारण ज़िम्मेदार नहीं मानते बल्कि कई वजहों ने मिलकर ये स्थितियां पैदा की हैं.

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प्राकृतिक गैस की बढ़ती मांग
दुनिया भर में कई कारणों से ऊर्जा की मांग में बढ़ोतरी हुई है. विशेषज्ञ इसके पीछे कोरोना महामारी के बाद सामान्य होते जीवन में उत्पाद एवं सेवाओं की बढ़ती मांग, मौसम में बदलाव और कोयले के उत्पादन में आई कमी को ज़िम्मेदार बताते हैं.
कोरोना महामारी के दौरान अर्थव्यवस्थाएं रुक गई थीं. मांग और उत्पादन दोनों ही कम थे. अर्थव्यवस्थाओं की हालत खराब हो रही थी. लेकिन, महामारी का असर कम होने पर देशों ने अर्थव्यवस्था में तेज़ी लाने के लिए आर्थिक सुधार पैकेज दिए.
अमेरिका में आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए खरबों डॉलर का आर्थिक पैकेज दिया गया, जिसका असर अन्य उद्योगों पर भी देखने को मिला. इसने निर्माण और सेवा उद्योग में तेज़ी ला दी और यहाँ ऊर्जा की मांग बढ़ गई.
वहीं, कई जगहों पर मौसम में भी बदलाव देखने को मिला है. कई देशों में पिछली सर्दियों में ही मांग बढ़नी शुरू हो गई थी.
जैसे उत्तरी गोलार्ध में आने वाले कई इलाक़ों में लंबा ठंड का मौसम देखने को मिला, जिससे गर्मी देने वाले बिजली के उपकरण इस्तेमाल होने लगे. पिछली गर्मियों में अमेरिका और यूरोप में गर्म हवाएं चलीं, जिसने एयर कंडिशनर के इस्तेमाल को बढ़ा दिया. इससे बिजली की खपत भी बढ़ने लगी.
वहीं, कोरोना से बचाव के लिए निजी वाहनों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हुई जिससे सीएनजी की खपत बढ़ी.
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के निदेशक (कॉरपोरेट्स) विवेक जैन कहते हैं, "ऐतिहासिक रूप से मांग पहले कभी इतनी नहीं बढ़ी थी. किसी ने इतनी खपत की उम्मीद नहीं की थी. हमेशा एक से दो प्रतिशत मांग ही बढ़ रही थी. आर्थिक सुधार होने से मांग तेज़ी से बढ़ी है."

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कोयला बना बढ़ा कारण
वहीं, इसमें एक बड़ा योगदान कोयले के कम उत्पादन का है. अन्य देशों की तरह एशियाई देशों में भी ऊर्जा की खपत और मांग बढ़ी है. चीन और भारत दो ऐसे बड़े देश हैं जो दुनिया की पूरी आबादी का 40 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं.
ये दोनों ही देश अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए काफी हद तक कोयले पर निर्भर करते हैं. कोयले के आयात के मामले में चीन दुनिया में नंबर एक पर है और भारत नंबर तीन पर. वहीं, कोयले के उत्पादन के मामले में भी चीन और भारत क्रमश: नंबर एक और दो पर आते हैं.
लेकिन, हरित ऊर्जा की तरफ़ बढ़ते कदमों और निवेशकों की कोयला उत्पादन में घटती रूचि ने यहां कोयले का उत्पादन कम कर दिया है.
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया कोयले के विकल्पों पर काम कर रही है. इसके लिए सौर और पवन ऊर्जा, प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाई जा रही है. ऐसे में निवेशकों की भी कोयले में रूचि कम हो रही है, उन्हें लाभ कम मिल रहा है. इसलिए कोयले का उत्पादन बहुत कम हो गया है.
विवेक जैन बताते हैं, "ये बदलाव एक लंबे समय में आया है. कोयले और तेल में निवेश करने वाली कंपनियां कम हो गई हैं. पिछले 10 सालों में ये कंपनियां लगभग 66 प्रतिशत रह गई हैं. अगर आप खनिज को निकालने के लिए निवेश नहीं रह रहे हैं और मांग बढ़ जाती है तो असंतुलन पैदा हो जाता है."
भारत और चीन में ऊर्जा की मांग बढ़ी है और ऐसे में यहाँ कोयले से लेकर प्राकृतिक गैस दोनों की खपत बढ़ गई है. जलवायु परिवर्तन को देखते हुए चीन ने पहले कोयला उत्पादित करने की बजाय केवल आयात करने का फ़ैसला लिया था लेकिन मौजूदा स्थिति में वो भी अपनी करीब 90 खदानें शुरू करने वाला है.

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रूस की भूमिका
यूरोप में प्राकृतिक गैस संकट से निपटने के लिए रूस की भूमिका बढ़ गई है.
यूरोपीय देश अपनी करीब 43 प्रतिशत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए रूस पर निर्भर करते हैं. लेकिन, ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच रूस से होने वाली आपूर्ति भी कम हुई है.
रूस से पाइपलाइन के ज़रिए यूरोपीय देशों को प्राकृतिक गैस पहुंचाई जाती है. ये पाइपलाइन यूक्रेन और पोलैंड से होकर जाती है. लेकिन, इन दोनों देशों से रूस के संबंधों ने तनाव होता रहता है.
ऐसे में रूस ने एक पाइपलाइन तैयार की है 'नॉर्ड स्ट्रीम 2' जो सीधे जर्मनी तक जाती है. इससे गैस की आपूर्ति बेहतर हो सकती है लेकिन यूरोपीय देशों ने अभी इस पाइपलाइन को मंज़ूरी नहीं दी है.
अमेरिका भी इस पाइपलाइन का आलोचक रहा है. उसका कहना है कि अगर सीधी पाइपलाइन को मंज़ूरी दे दी गई तो यूक्रेन और पोलैंड को आर्थिक नुक़सान हो सकता है.
पहले भी यूरोप में प्राकृतिक गैस की मांग बढ़ी है तो रूस ने आपूर्ति को उसके अनुरूप बढ़ाया है. लेकिन, इस साल रूस की सरकारी ऊर्जा उत्पादन कंपनी 'गेज़प्रॉम' ने अतिरिक्त आपूर्ति के कम ऑर्डर स्वीकार किए हैं.
इसे रूस के दबाव के तौर पर भी देखा जा रहा है. आलोचकों का कहना है कि यूरोप में ऊर्जा संकट के बीच प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में 'नॉर्ड स्ट्रीम 2' की अहमियत दिखाने की कोशिश है ताकि इसकी मंज़ूरी आसान हो सके.
हालांकि, रूस इससे इनकार करता है और उसने ऊर्जा आपूर्ति की कमी में किसी भी तरह की भूमिका से इनकार किया है. रूस ने यूरोप में मांग के मुताबिक आपूर्ति बढ़ाने का आश्वासन भी दिया है.
वहीं, रूस में भी ऊर्जा की खपत बढ़ गई है और कोरोना महामारी के दौरान यहां भी उत्पादन पर असर पड़ा है.

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संकट यहां तक कैसे पहुंचा
कई बड़े देशों पर इस ऊर्जा संकट का गंभीर असर देखने को मिल सकता है. पूरी दुनिया इसके प्रभाव से गुज़र रही है. ऐसे में क्या इतने बड़े संकट का अंदाज़ा किसी को नहीं था या कहीं चूक हुई है?
विवेक जैन कहते हैं, "कोरोना महामारी के दौरान उत्पादन कम होने से कोयले की खदाने बंद की गईं. कई खदानें पहले से ही धीरे-धीरे बंद की जा रही थीं. पर जब आप खदान बंद कर देते हैं या उत्पादन घटा देते हैं तो उसे फिर से शुरू करने में या रफ़्तार पकड़ने में समय लगता है.''
''खनिज पदार्थों के उत्पादन में ऐसा नहीं होता कि आज बंद किया तो कल शुरू कर लेंगे. मान लीजिए आपने दूसरी तिमाही में फैसला किया कि इसे शुरू करना है तो शुरू होते-होते ही छह महीने लग जाएंगे. ऐसा नहीं है कि वैश्विक स्तर पर इसकी जानकारी नहीं थी लेकिन किसी ने इतनी ज़्यादा मांग की उम्मीद नहीं की थी."

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आगे क्या होगा
जानकारों का मानना है कि इस समस्या का तात्कालिक समाधान तो निकाल लिया जाएगा लेकिन दीर्घकालिक उपायों पर भी गौर करना होगा.
विवेक जैन कहते हैं कि कोयला उत्पादन बढ़ाया जा रहा है और पूरी दुनिया इस पर काम कर रही है लेकिन इन स्थितियों ने एक बात साफ कर दी है कि कोयले को अपनी ज़रूरतों से हटाना इतना आसान नहीं है.
वह कहते हैं, "बीच में एक समय आएगा जब कोयले और अन्य ऊर्जा संसाधनों के साथ जीना पड़ेगा. अभी हम 100 प्रतिशत शिफ्ट नहीं कर सकते क्योंकि प्राकृतिक गैस का उत्पादन सीमित है और नवकरणीय ऊर्जा की अपनी सीमाएं हैं."
''वहीं, दाम बढ़ गए हैं तो ये आपूर्तिकर्ताओं के लिए लाभ कमाने का अच्छा मौक़ा है. कंपनियों ने जो खदानें बंद कर दी थीं अगर वहां उत्पादन बढ़ा देते हैं तो उन्हें काफी फ़ायदा हो सकता है."

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भारत में बिजली संकट
भारत में कोयले की कमी के चलते पिछले कई दिनों से बिजली की कमी का संकट बताया जा रहा है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी आने वाले दिनों में बिजली की कमी आशंका जताते हुए केंद्र सरकार को पत्र लिखा था.
उत्तर प्रदेश में भी कोयले की कमी के कारण आठ बिजली संयंत्र बंद कर दिए गए हैं. देश में तीन या चार दिनों का कोयला बचे होने की बात भी सामने आ रही है.
हालांकि, कोयला मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि देश की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में कोयला मौजूद है.
कोयला मंत्रालय ने कहा, "बिजली आपूर्ति बाधित होने की आशंका पूरी तरह गलत है. बिजली संयंत्रों में करीब 72 लाख टन कोयला मौजूद है जो चार दिनों के लिए पर्याप्त है. वहीं, कोल इंडिया लिमिटेड के पास 400 लाख टन कोयला है जिसकी आगे आपूर्ति की जा रही है. इस साल (सितंबर 2021 तक) घरेलू कोयला आधारित बिजली उत्पादन में लगभग 24% की वृद्धि हुई है.''
हालांकि, जानकार इससे इत्तेफाक़ नहीं रखते. उनका कहना है कि ये संकट आज का नहीं बल्कि पहले से बना हुआ है.
भारत की स्थिति को लेकर वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार प्रंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं कि भारत में ऊर्जा आपूर्ति के संकट को लेकर राज्य सरकारों से लेकर बिजली कंपनियां तक चिंता जाहिर कर चुकी हैं. फिर भी सरकार इससे इनकार करती आई है.
वह कहते हैं, "भारत में ऊर्जा संकट के पीछे कई कारण ज़िम्मेदार हैं. जैसे लॉकडाउन खुलने के बाद वैश्विक और घरेलू मांग में बढ़ोतरी हो गई है. वहीं, इस साल बारिश भी ज़्यादा हुई है जिससे कोयला गीला हो गया है. कोयला वितरण करने वालीं कंपनियां भी कर्ज में डूबी हुई हैं तो उत्पादन कम हो रहा है."
''लेकिन, ये संकट रातोरात नहीं आया है. गुजरात, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और तमिलनाडु ने नाराज़गी के साथ भारत सरकार को लिखा था कि बिजली उत्पादन के कारख़ाने बंद हो जाएंगे. सबके पास दो या तीन दिन का कोयला ही बचा है. लेकिन कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी और ऊर्जा मंत्री आरके सिंह किसी भी संकट से इनकार करते रहे. कहा कि दो-चार दिनों में ठीक हो जाएगा. लेकिन, अगर संकट नहीं है तो लोग इतने चिंतित क्यों हैं.''
जानकार इन स्थितियों का फायदा कुछ कंपनियों को होने की आशंका भी जताते हैं. कोयले की मांग बढ़ने से उसके दाम बढ़ेंगे जिसका फायदा कोयला उत्पादक कंपनियां उठाएंगी.
लेकिन, फिलहाल पूरे विश्व का ध्यान इस संकट से निपटने पर हैं ताकि आने वाले समय में बिजली या अन्य ज़रूरतों में कटौती का सामना ना करना पड़े.
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