रूस-यूक्रेन संकट के दौर में क्या होगा नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन का भविष्य

नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन

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नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन के बारे में अमेरिका की ताज़ा चेतावनी के बाद यह परियोजना एक बार फिर सुर्ख़ियों में आ गई है.

अमेरिका ने संकेत दिया कि रूस और जर्मनी के बीच की यह परियोजना अब आगे नहीं बढ़ेगी.

वहीं, बर्लिन में अधिकारियों ने कहा है कि यदि रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो इस परियोजना पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है.

यूक्रेन पर रूस के हो सकने वाले हमलों को रोकने के लिए पश्चिमी देश कोशिश कर रहे हैं.

ऐसे में क़रीब 11 अरब डॉलर की यह परियोजना सौदेबाज़ी का प्रमुख हथियार बन गई है. आख़िर यह परियोजना है क्या और यह कितना अहम है?

रूस-यूक्रेन संकट, यूरोप का ऊर्जा संकट

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क्या है नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन?

क़रीब 1,200 किलोमीटर लंबी यह गैस पाइपलाइन परियोजना बाल्टिक सागर से होकर पश्चिमी रूस से उत्तर-पूर्वी जर्मनी तक जाती है.

इस परियोजना के ज़रिए रूस से जर्मनी जाने वाली प्राकृतिक गैस की सप्लाई को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया. वर्तमान में रूस से जर्मनी जाने वाली गैस 'नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन' होकर जाती है, जिसे 2012 में बनाया गया था.

यदि यह परियोजना सफल हो जाएगी, तो इस पाइपलाइन से जर्मनी को हर साल 55 अरब घन मीटर गैस की सप्लाई हो सकेगी. इस परियोजना की मालिक रूस की सरकारी गैस कंपनी 'गज़प्रोम' है.

इस पाइपलाइन का काम 2021 के सितंबर में ख़त्म हुआ. लेकिन गैस की आपूर्ति शुरू करने से पहले गज़प्रोम को अभी यूरोप के नियामकों से मंज़ूरी मिलने का इंतज़ार है.

पुतिन

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आख़िर इसे लेकर इतना विवाद क्यों?

आलोचकों के अनुसार, यह पाइपलाइन रूस की विदेश नीति का एक ​हथियार है. इस परियोजना का अमेरिका, यूक्रेन और पोलैंड ने कड़ा विरोध किया है.

अमेरिका को डर है कि यह पाइपलाइन यूरोप को रूस की ऊर्जा पर और अधिक निर्भर बना देगी. इसके चलते, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जर्मनी और यूरोपीय संघ पर हावी हो जाएंगे. यूक्रेन भी चाहता है कि यह परियोजना बंद हो जाए.

वैसे रूस अपना अधिकांश गैस यूक्रेन के ज़रिए यूरोप भेजता है, लेकिन नॉर्ड स्ट्रीम 1 और 2 यूक्रेन होकर नहीं जाती.

इसका मतलब ये हुआ कि इस पाइपलाइन के चालू होने पर यूक्रेन को क़रीब 2 अरब डॉलर के "ट्रांजिट फ़ीस" का नुक़सान हो सकता है. इसे यह राशि अभी अपने क्षेत्र से गुजरने वाली गैस के चलते मिलती है. वहीं यूक्रेन का कहना है कि उसे पश्चिमी देशों के साथ बेहतर संबंधों के लिए दंड दिया जा रहा है.

रूस से यूरोप को गैस भेजने के लिए अपनी अनदेखी होने से पोलैंड भी नाख़ुश है. वह चाहता है कि पाइपलाइन उसके यहां से गुजरे.

रूस-यूक्रेन संकट, यूरोप का ऊर्जा संकट

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यह परियोजना इतना अहम क्यों?

नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन को रूस पर प्रतिबंध लगाने जैसा मानते हुए, टाल दिया गया. पश्चिमी देश यूक्रेन पर हमला न करने के लिए इस परियोजना के सहारे रूस पर दबाव बना सकते हैं कि हमले की भारी क़ीमत चुकानी होगी.

ब्रिटेन के रक्षा मंत्री बेन वालेस ने इस पाइपलाइन को एक ​हथियार बताते हुए कहा कि पश्चिमी देश मास्को के ख़िलाफ़ इसका उपयोग कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि यह पाइपलाइन उन हथियारों में से एक है, जो ताज़ा संकट में कारगर हो सकते हैं.

रूस के लिए यह पाइपलाइन इसलिए अहम है कि इससे यूक्रेन गए बिना गैस सीधे यूरोप जा सकती है. इससे यूक्रेन को दिए जाने वाले ट्रांजिट शुल्क की बचत होगी.

पाइपलाइन पर रोक लगाने के फ़ैसले के समर्थकों का कहना है कि इससे रूस को झटका लगेगा. इससे रूस की आय पर तो असर होगा ही उसे यूरोप को रूस की ऊर्जा पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा.

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इसके न खुलने पर क्या होगा?

यूरोप को इस पाइपलाइन के न खुलने का नुक़सान उठाना होगा. यूरोप पहले से ही ऊर्जा की बढ़ती क़ीमतें और रूसी गैस की कम आपूर्ति का सामना करना पड़ रहा है.

जर्मनी को इस पाइपलाइन से मिलने वाली गैस की सख़्त ज़रूरत है. इससे जर्मनी के 2.6 करोड़ घरों को गर्म करने में मदद मिलेगी और अक्षय ऊर्जा की ओर जर्मनी का जाना आसान हो जाएगा.

जर्मनी के वित्त मंत्री रॉबर्ट हेबेक ने बुधवार को चेतावनी देते हुए कहा, "यदि प्रतिबंध लगाए जाते हैं तो इससे जर्मनी की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी."

हालांकि जानकारों का कहना है कि यूक्रेन के ज़रिए रूस से यूरोप जाने वाली गैस पर रोक लगाने के बड़े खतरे होंगे. कई देशों के पास गैस की आपूर्ति के दूसरे विकल्प हैं. जैसे जर्मनी नॉर्वे, नीदरलैंड, ब्रिटेन और डेनमार्क से भी गैस का आयात कर सकता है.

हालांकि यूरोप में गैस देने वाला दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता नॉर्वे का कहना है कि वह यूरोप को अब और प्राकृतिक गैस देना मुश्किल है. उसने कहा कि वह रूस से बंद होने वाली गैस की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकता.

उधर अमेरिका भी यूरोप के लिए गैस आपूर्ति के दूसरे विकल्प जुटाने की कोशिश कर रहा है. उसकी कोशिश है कि रूस से यदि गैस की आपूर्ति बंद हुई तो इसका यूरोप पर कम से कम असर हो.

लेकिन प्राकृतिक गैस की ढुलाई से जुड़ी चुनौतियां भी कम नहीं हैं.

वीडियो कैप्शन, रूस और यूक्रेन -दोनों ही देशों की सीमा पर फौज की तैनाती बढ़ी है.

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