आर्थिक संकट से उबरने के लिए श्रीलंका के पास क्या-क्या विकल्प हैं

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- Author, मरियम अज़वेर
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
श्रीलंका अपने इतिहास की सबसे ख़तरनाक़ आर्थिक गिरावट से जूझ रहा है. इस हालत से निपटने के लिए अब वहां की सरकार भारत और चीन से मदद की उम्मीद लगा रही है.
श्रीलंका ने वैश्विक वित्तीय संस्थानों के बजाय अपने पड़ोसियों से सहायता जुटाना बेहतर समझा है. श्रीलंका की सरकार बीते कुछ महीनों नें महंगाई पर लगाम लगाने में असर्मथ रही है और देश भर में इस वजह से उसे आलोचना का सामना करना पड़ा है. बढ़ते बजट घाटे के बीच श्रीलंका ने कम ब्याज़ दर बनाए रखने की कोशिश में ढेर सारी मुद्रा छापी है. ये सब उस दौरान हो रहा था जब देश में विदेशी मुद्रा की तेज़ी से घटने की ख़बरें आ रही थीं.
सिकुड़ते विदेशी मुद्रा भंडार के कारण कुछ चीज़ों का आयात भी बंद कर दिया गया था. एक श्रीलंकाई अख़बार के मुताबिक देश के प्रमुख विपक्षी गठबंधन समाजी जन बलावेगाया ने पिछले साल 29 नंवबर को कहा था कि श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार "इस वक्त अपने ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर यानी 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया है."
इसी बीच पता चला है कि श्रीलंका के केंद्रीय बैंक 'सेंट्रल बैंक ऑफ़ श्रीलंका' ने अपने पास रखे आधे से अधिक गोल्ड रिज़र्व को बेच दिया है. 'द संडे टाइम्स' ने 8 जनवरी को अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है गोल्ड रिज़र्व का 54.1% प्रतिशत हिस्सा विदेशी मुद्रा भंडार को मज़बूती देने के लिए इस्तेमाल हो चुका है.
श्रीलंका के नेता इन हालात के लिए कोविड को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं लेकिन आलोचक इसके लिए सरकार को ही ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. घटते विदेशी मुद्रा भंडार, बेतहाशा बढ़ती क़ीमतों और भोजन सामग्री की कमी की संभावनाओं के बीच राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे की सरकार कुछ भी करने को तैयार है.
चीन और भारत से मदद की उम्मीद
श्रीलंका ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आर्थिक सहायता हासिल करने की काफी कोशिशें कीं. लेकिन आईएमएफ़ ने उसकी मांग को अनसुना कर दिया क्योंकि देश की मौजूदा सरकार एजेंसी के हिसाब से आर्थिक सुधार के एजेंडे पर अमल करने का इरादा नहीं रखती थी.
हालांकि श्रीलंका ने किसी और स्वरूप में विदेशी मदद हासिल करने की संभावना से इनकार नहीं किया है. अतीत की तरह इस बार भी श्रीलंका ने क्षेत्र में एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी देशों भारत और चीन से मदद की गुहार लगाई है.
तमिल अख़बार वीरकेसरी की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे ने पिछले साल दिसंबर में अपनी 'अत्यंत महत्वपूर्ण' भारत यात्रा के दौरान खाद्यान्न, दवाएं और अन्य ज़रूरी चीज़ों की खरीद के लिए लाइन ऑफ़ क्रेडिट की मियाद बढ़वा ली थी.
हाल ही में चीन के विदेश मंत्री वांग यी 8 और 9 जनवरी को कोलंबो के दौरे पर थे. श्रीलंका के राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, "विदेश मंत्री वांग यी के साथ अपनी मुलाकात में राष्ट्रपति राजपक्षे ने डेब्ट रिस्ट्रक्चरिंग (पुराने कर्ज़ों की शर्तों में बदलाव) और चीन से आयात की जाने वाली चीज़ों पर क्रेडिट दिए जाने की मांग की है."
डेली मिरर ने 5 जनवरी को अपनी रिपोर्ट में लिखा कि श्रीलंका के राष्ट्रपति साल 2022 में विदेशी कर्ज़ के भुगतान से पहले मित्रवत देशों से बातचीत के लिए एक कैबिनेट स्तर की समिति बनाने पर विचार कर रहे हैं. इस बातचीत का मक़सद इन मित्र देशों से आर्थिक मदद हासिल करने की कोशिश करना है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को इनकार?
श्रीलंकाई अख़बार डेली एफटी में 13 दिसंबर, 2021 को अपने साप्ताहिक कॉलम श्रीलंका के सेंट्रल बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर डब्ल्यूए विजेवरदेना ने इस ओर ध्यान दिलाया कि देश के कई प्रमुख और स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों ने सरकार से बार-बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मदद लेने की अपील की है.
हालांकि इस बात की कम ही संभावना है कि श्रीलंका की सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेगी. डेली मिरर अख़बार ने चार जनवरी को लिखा कि तीन जनवरी को हुई कैबिनेट मीटिंग में इस मुद्दे पर आम सहमति नहीं बन पाई.
सेंट्रल बैंक ऑफ़ श्रीलंका के गवर्नर अजित निवार्ड कैबराल बार-बार ये दोहराते रहे हैं कि श्रीलंका आईएमएफ़ की मदद नहीं लेगा. 25 नवंबर, 2021 को उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आईएमएफ़ की मदद शर्तों के साथ आएगी और एजेंसी आर्थिक सुधार के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाएगी.
न्यूज़ वेबसाइट इकोनॉमीनेक्स्ट ने गवर्नर अजित निवार्ड कैबराल के हवाले से लिखा, "इससे श्रीलंका की मुद्रा का अवमूल्यन हो सकता है. ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और सरकारी नौकरियों के मौके कम हो सकते हैं. हमारा नज़रिया ये है कि फिलहाल हमें उस रिफॉर्म एजेंडे की ज़रूरत नहीं है."
लेकिन पांच जनवरी को अख़बार डेली एफटी ने अपने संपादकीय में लिखा कि "देश की अर्थव्यवस्था की जो स्थिति है, वो पहले कभी नहीं रही थी. जनता इस समय जिस संकट का सामना कर रही है, आईएमएफ़ की शर्तें उससे बुरी नहीं हो सकती हैं."

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पारिवारिक समाधान
श्रीलंका को संकट से निकालने का जिम्मा जिस सरकार के पास है उसकी अगुवाई राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे और उनके भाई महिंदा राजपक्षे और बासिल राजपक्षे के पास है.
महिंदा राजपक्षे दो बार देश के राष्ट्रपति रह चुके हैं और इस समय प्रधानमंत्री के ओहदे पर हैं. कहा जाता है कि महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति पद रहते हुए चीन के श्रीलंका से रिश्ते काफी मजबूत हुए.
बासिल राजपक्षे अमेरिकी नागरिक हैं और इस समय देश के वित्त मंत्रालय की कमान उनके हाथ में है. बासिल को वित्त मंत्री बनाने के लिए श्रीलंका की सरकार ने 20वां संविधान संशोधन विधेयक पारित किया जिसमें विदेशी नागरिकों के लिए संसद का सदस्य बनने का रास्ता खोला गया.
बासिल राजपक्षे अपने भाई महिंदा राजपक्षे की सरकार में आर्थिक विकास मंत्री का पद संभाल चुके थे. सात जुलाई, 2021 को उन्हें वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई, इस उम्मीद से कि वे देश की आर्थिक समस्याओं का कोई हल निकाल सकेंगे.

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बासिल राजपक्षे की भूमिका
बासिल राजपक्षे की जिम्मेदारियों में से एक जिम्मेदारी साल 2021-22 के लिए देश का बजट तैयार करने की थी. इसमें उन्होंने नई नियुक्तियों पर रोक लगा दी और सरकारी क्षेत्र के गाड़ियों के आयात को बंद कर दिया.
महंगाई की मार से जूझ रही जनता को राहत देने के लिए बासिल राजपक्षे ने तीन जनवरी, 2022 को एक आर्थिक पैकेज का एलान किया. श्रीलंका की कैबिनेट ने उनके फ़ैसले का स्वागत किया लेकिन उसकी आलोचना करने वाले भी बहुत से लोग थे जिनमें विपक्षी राजनेता भी शामिल थे.
बासिल राजपक्षे के आर्थिक पैकेज पर आलोचकों ने सवाल उठाया कि इसे लागू करने के लिए सरकार को और नोट छापने की नौबत आ सकती है.
सिंहला भाषा में छपने वाले सरकारी अख़बार दिनामिना ने अपने संपादकीय में लिखा, "ये स्पष्ट है कि आम लोगों की समस्याओं और आर्थिक चुनौतियों पर सरकार ध्यान दे रही है. दो सालों तक जनता एक के बाद दूसरी आर्थिक समस्याओं से जूझती रही. राहत पैकेज के बाद ये समस्या धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी."
लेकिन इसी बीच आईलैंड अख़बार ने अपनी राय जाहिर की, "लगता है कि सरकार समस्या के कारणों को पहचान ही नहीं पाई है. उसे गंभीर आर्थिक मुद्दों पर विशेषज्ञों की सलाह सुननी चाहिए और राजनीति करने से दूर रहना चाहिए."
श्रीलंका में मीडिया ख़ासकर प्राइवेट प्रेस में सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना लगातार बढ़ती जा रही है.
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