श्रीलंका में चीन के राजदूत जाफ़ना के हिंदू मंदिर में पहुँचे, क्या है भारत के लिए संदेश?

चीन के राजदूत ची झेंगहोंग

इमेज स्रोत, @ChinaEmbSL

इमेज कैप्शन, जाफ़ना के एक मंदिर में श्रीलंका में चीन के राजदूत ची झेंगहोंग (बाएं से तीसरे) अपने अधिकारियों के साथ
    • Author, पवन सिंह अतुल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दक्षिण एशिया में बीते कुछ वर्षों में चीनी प्रभाव भारतीय रणनीतिकारों के लिए चिंतन-मंथन का एक प्रमुख विषय रहा है. पाकिस्तान और चीन की क़रीबियाँ साफ़ दिखती हैं लेकिन भारत के दक्षिण के दो पड़ोसियों श्रीलंका और मालदीव में चीन की मौजूदगी तेज़ी से बढ़ रही है.

श्रीलंका में चीन के राजदूत ची झेंगहोंग इन दिनों तमिल बहुल उत्तरी श्रीलंका के इलाक़ों का दौरा कर रहे हैं.

कोलंबो में चीनी दूतावास इस यात्रा को काफ़ी तव्वजो दे रहा है. दूतावास के ट्विटर हैंडल से उनकी यात्रा की तस्वीरें और बयान लगातार साझा किए जा रहे हैं.

एक तस्वीर में ची को एक हिंदू मंदिर के बाहर प्रसाद की टोकरी लिए देखा जा सकता है. ये चित्र जाफ़ना के ऐतिहासिक नल्लूर कंडास्वामी कोविल मंदिर के हैं. एक हिंदू श्रद्धालु की वेशभूषा में चीनी राजदूत, मंदिर के बाहर खड़े लोगों में फलों का प्रसाद बाँटते दिख रहे हैं.

मंदिर के अलावा चीनी राजदूत उत्तरी श्रीलंका के उच्च अधिकारियों से भी मिल रहे हैं.

छोड़िए X पोस्ट, 1
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 1

वे श्रीलंका नॉर्दर्न प्रॉविंसज़ के गवर्नर जीवन त्यागराजा से भी मिले हैं. उन्होंने कहा है कि ये मुलाक़ात परस्पर सहयोग बढ़ाने और स्थानीय तमिल समुदाय की कमाई के साधन बेहतर करने के लिए की गई है.

चीनी अधिकारियों ने जाफ़ना और मन्नार में मछुआरों के बीच जाकर फ़िशिंग का सामान और फ़ेस मास्क भी वितरित किए और कहा कि वे कोविड के ख़िलाफ़ जंग के मुश्किल वक़्त में उनके साथ हैं. उन्होंने जाफ़ना की विख्यात 'जाफ़ना पब्लिक लाइब्रेरी' को लैपटॉप और पुस्तकें भी भेंट की हैं. चीनी राजदूत के इस दौरे को कुछ लोग भारत से जोड़कर भी देख रहे हैं.

उत्तरी श्रीलंका तमिल बहुल इलाक़ा है जहाँ तीन दशकों तक एक हिंसक पृथकतावादी आंदोलन चला, जिसमें हज़ारों की जानें गईं. भारतीय के तमिलनाडू राज्य में श्रीलंकाई तमिलों का मुद्दा काफ़ी संवेदनशील रहा है. शायद यही वजह है कि श्रीलंका के इस हिस्से में भारत भी लोगों की मदद करता रहा है.

एक ऐसा क्षेत्र जो भारत के श्रीलंका के साथ संबंधों में महत्वपूर्ण है, वहाँ का दौरा करके चीनी राजनयिक क्या कोई संदेश देना चाह रहे हैं?

ये भी पढ़ें:

चीन के राजदूत ची झेंगहोंग

इमेज स्रोत, @ChinaEmbSL

इमेज कैप्शन, श्रीलंका में चीन के राजदूत ची झेंगहोंग जाफ़ना में स्थानीय मछुआरों को फ़ूड पैकेट देते हुए

क्या ये भारत के लिए कोई संदेश है?

चीनी दूतावास की ये यात्रा अपने आप में कई संदेश देती है. श्रीलंका के उत्तरी हिस्से का सांस्कृतिक, धार्मिक और नस्लीय तौर पर भारत से गहरा जुड़ाव है. भारत के प्रभाव वाले क्षेत्र में चीन के जाने को विश्लेषक किस तरह देखते हैं?

डॉक्टर एस सतीसमोहन इंग्लैंड में पढ़े हैं और अब वे कोलंबो की कोटलेवाला डिफ़ेंस यूनिवर्सिटी के स्ट्रेजिक विभाग में पढ़ाते हैं. बीबीसी ने कोलंबो में उन्हें फ़ोन किया और पूछा कि वो इस यात्रा को किस तरह से देखते हैं.

डॉक्टर एस सतीसमोहन ने बताया, "देखिए चीन श्रीलंका के सिंहला बहुल इलाक़ों में अपना प्रभाव डालने में सफल रहा है लेकिन तमिल आबादी से ऐसा कोई रिश्ता फ़िलहाल क़ायम नहीं था. चीन सारे देश में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है इसलिए अब वो उत्तरी इलाक़ों में जा रहा है."

छोड़िए X पोस्ट, 2
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 2

लेकिन सतीसमोहन कहते हैं कि इस यात्रा में शायद भारत के लिए भी संदेश छिपा है, "वो कहना चाह रहे हैं कि भले ही इस क्षेत्र भारत के रिश्ते ऐतिहासिक हैं लेकिन अब हम भी यहाँ है. और हम भी तमिल लोगों के दिलो-दिमाग़ में जगह बनाना चाहते हैं. ये एक किस्म की डिप्लोमेटिक वॉर्निंग सरीखा है. विशेष रुप हिंदू मंदिर में हिंदू वेशभूषा में जाना भी एक संदेश ही है."

तमिलनाडु की मद्रास यूनिवर्सिटी की साउथ एशियन स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर एस मनिवसाकन कहते हैं कि इससे भारत को निश्चित तौर पर चिंतित होना चाहिए.

प्रोफ़ेसर मनिवसाकन ने बीबीसी को बताया, "चीन की रणनीति बिल्कुल साफ़ है. उसे आर्थिक गतिविधियों के लिए बाज़ार चाहिए. और वो हर वक्त इसी कोशिश में रहता है कि कैसे अपनी अर्थव्यवस्था को विस्तार दे पाए. भारत को अपने पड़ोसी मुल्कों से संबंध सुधारने चाहिए ताकि इस क्षेत्र में चीन, भारत का आर्थिक नुक़सान न कर पाए. चीनी बहुत चालाक हैं. वे भारत के पड़ोस में आकर, उसकी आर्थिक संभावनाओं को ठेस पहुँचाना चाहते हैं."

श्रीलंका

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, श्रीलंका में चीन कई बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा है. एयरपोर्ट से बंदरगाहों तक चीन श्रीलंका में अपनी छाप छोड़ रहा है. इस तस्वीर में चीन के शांगडोंग से श्रीलंका के लिए डीज़ल इंजिन भेजा जा रहा है.

उत्तरी श्रीलंका भारत के लिए क्यों अहम

श्रीलंका का उत्तरी हिस्सा तमिल बहुसंख्यक है, जो बाक़ी श्रीलंका पर हमेशा से सौतेले व्यवहार का आरोप लगाता रहा है. इस क्षेत्र में तीन दशकों तक एक बेहद हिंसक पृथकतावादी आंदोलन चला. इस आंदोलन में कई हथियारबंद गुट थे लेकिन सबसे ताक़तवर था, प्रभाकरण के नेतृत्व वाला लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल इलम यानी एलटीटीई.

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिलानाडु में मई 1991 में एक आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई थी. इस हत्या के लिए एलटीटीई के लड़ाकों को दोषी पाया गया था और उनमें से कुछ अब भी भारतीय जेलों मे हैं.

उत्तर के तमिल विद्रोहियों और सिंहला समुदाय के दबदबे वाली श्रीलंकाई सरकार के बीच युद्ध 2009 में प्रभाकरण की मौत के साथ ख़त्म हुआ था. तमिल लोगों ने इस जंग की भारी क़ीमत चुकाई थी. संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक़ इस युद्ध के आख़िरी दौर में क़रीब 40,000 लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर तमिल ही थे.

ऑडियो कैप्शन, श्रीलंका में भारतीय फ़ौज की दास्तां

इस क्षेत्र की राजनीति और संस्कृति पर ख़ासा भारतीय प्रभाव है. पिछले महीने ही उत्तरी श्रीलंका के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले तमिल नेशनल अलांयस (टीएनए) ने भारत और संयुक्त राष्ट्र से श्रीलंका के तमिल और सिंहला लोगों के बीच विवाद के राजनीतिक हल के लिए सहयोग करने को कहा था.

भारतीय समाचार पत्र द हिंदू के मुताबिक़ टीएनए का एक प्रतिनिधिमंडल वॉशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से भी मिला था.

उत्तरी श्रीलंका से भारत के रिश्ते सांस्कृतिक और धार्मिक डोर से बंधें है, जिसका असर वहाँ की राजनीति पर भी होता है. इसलिए ये इलाक़ा भारत के लिए महत्वपूर्ण है.

कोलंबो की कोटलेवाला डिफ़ेंस यूनिवर्सिटी के डॉक्टर सतीसमोहन कहते हैं, "भारत एकमात्र देश है, जो 1983 से श्रीलंकाई तमिलों के हित की आवाज़ बुलंद करता रहा है. 2009 में ख़त्म हुई जंग के बाद से तमिल इलाक़ों में भारतीय मदद क्रिटिकल रही है. भारत ने यहाँ घरों के निर्माण से लेकर बुनियादी ढाँचे को फिर से पैरों पर खड़ा करने में भरपूर मदद की है."

श्रीलंकाई तमिलों को सिर्फ़ आर्थिक मदद की ही ज़रूरत नहीं है, वो अब अपनी राजनीतिक समस्याओं का भी हल चाहते हैं और उन्हें मालूम है उसमें भारत एक अहम रोल अदा कर सकता है.

श्रीलंका

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जाफ़ना के कीरिमलाई में भारतीय मदद से बना ये घर. भारत ने 2009 में श्रीलंका में ख़त्म हुए गृहयुद्ध के बाद तमिल इलाकों में भरपूर मदद की है.

चीन-श्रीलंका में सब ठीक है?

बीते दो दशकों से चीन और श्रीलंका के बीच आर्थिक सहयोग कई गुना बढ़ा है. चीन ने श्रीलंका के बुनियादी ढाँचे में भारी निवेश किया है. लेकिन इन रिश्तों में बीच-बीच में तनाव भी देखा गया है.

हाल ही में चीन से खाद श्रीलंका पहुँची थी लेकिन उसकी क्वालिटी बहुत ख़राब थी इसलिए श्रीलंका ने उसे लेने से मना कर दिया था. चीन अब भी उस कंसाइमेंट को स्वीकार करने के लिए श्रीलंका पर दवाब डाल रहा है.

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउडेंशन में अपने एक लेख में असंग अबयगूनासेकारा लिखते हैं, "श्रीलंका ने इस वर्ष अक्तूबर में चीन की 20,000 टन खाद, हानिकारक बैक्टीरिया की मौजूदगी के कारण लौटा दी थी. चीनी अधिकारियों ने अपनी खाद की गुणवत्ता की दुहाई देते हुए, इसपर आपत्ति जताई थी."

अबयगूनासेकारा कहते हैं कि चीन नियमों और मानदंडों का इस्तेमाल अपनी सुविधा से कर रहा है ताकि वो श्रीलंका जैसे देशों में स्थानीय नीति निर्धारकों पर दवाब डाल सके. पिछले हफ्ते श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे भारत आए और ऐसी ख़बरें हैं कि उन्होंने यहाँ आकर इस मुद्दे पर बात भी की.

श्रीलंका के वित्त मंत्री बसिल राजपक्षे

इमेज स्रोत, ISHARA S. KODIKARA/Getty Images

इमेज कैप्शन, श्रीलंका के वित्त मंत्री बसिल राजपक्षे, प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के भाई हैं. श्रीलंका में इस वक्त राजपक्षे परिवार का दबदबा है. वित्त हाल ही में भारत के दौरे पर आए थे.

दक्षिण एशिया में चीन की चहलक़दमी

भारत के पड़ोस में चीन का दख़ल पिछले दो दशकों से बढ़ता आ रहा है. पाकिस्तान में तो उसका स्पॉन्सर किया गया सीपैक प्रोजेक्ट अरबों का डॉलर का है. पूर्वी म्यामांर से शुरू होकर, बीते 10 वर्षों में चीन श्रीलंका और मालदीव में पैर जमा चुका है.

एक अनुमान के अनुसार चीन ने श्रीलंका को 4.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर और मालदीव को 1.1 से 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज़ दे रखा है. इस सारे इलाक़े में एक ज़माने में भारत की तूती बोलती थी. अब वहीं चीन की ये आर्थिक गतिविधियां, दक्षिण एशिया में उसके प्रभाव को लगातार बढ़ा रही हैं.

इस क्षेत्र में बढ़ते चीनी क़द पर दुनिया भर की निगाहें हैं.

अमेरिकी थिंक टैंक द कार्निगी इंडॉउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में लिखा है कि इस क्षेत्र के देश और चीन, दोनों एक दूसरे के बारे में कुछ न कुछ सीख रहे हैं. दक्षिण एशिया के देश चीन के पैसे और पावर के प्रयोग के अनुभव से सीख रहे हैं और चीन इस बहुआयामी इलाक़े से संबंध स्थापित करने के हुनर को तराश रहा है.

ये भी पढ़ें:

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)