अमेरिका की किस बात को लेकर पाकिस्तान में है नाराज़गी

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमेरिकी उप विदेश मंत्री वेंडी शरमन ने पाकिस्तान का दिवसीय दौरा पूरा कर लिया है.
पाकिस्तान में एक तरफ जहां वेंडी शरमन के दौरे की चर्चा है, वहीं दौरे से ठीक पहले दिए उनके एक बयान को लेकर नाराज़गी भी जताई जा रही है. पाकिस्तान दौरे से पहले वेंडी शरमन पांच और छह अक्टूबर को भारत के दौरे पर थीं.
इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान को लेकर एक बयान दिया था. वेंडी शरमन ने अपने दौरे के दूसरे दिन मुंबई में कहा, "हम अमेरिका और पाकिस्तान के बीच व्यापक संबंध नहीं देखते हैं और भारत और पाकिस्तान को जोड़कर देखने के पुराने दिनों में लौटने का हमारा कोई इरादा नहीं है. हम उस तरफ़ नहीं जा रहे हैं."
जबकि इससे पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि पाकिस्तान अमेरिका के साथ व्यापक और दूरदर्शी संबंध चाहता है जो केवल अफ़ग़ानिस्तान के मसले तक ही सीमित ना हों.
जबकि वेंडी शरमन ने ज़ोर दिया था कि अफ़ग़ानिस्तान उनकी मुख्य चिंता है. उन्होंने कहा, "अफ़ग़ानिस्तान में क्या चल रहा है ये हमें जानने की ज़रूरत है. तालिबान को लेकर हमारी सोच एक होनी चाहिए. हमें सभी की सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़रूरत है जिसमें भारत भी शामिल है. इसलिए मैं विदेश मंत्री एंटी ब्लिंकन की बातचीत को जारी रखते हुए कुछ बहुत विशिष्ट बातचीत करने जा रही हूं."
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पाकिस्तान में नाखुशी
मुलाक़ात के बाद वेंडी शरमन ने ट्वीट किया, "अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य और अमेरिका-पाकिस्तान के अहम और लंबे समय से चल रहे संबंधों पर चर्चा के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्री से मिली. हम क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहते हैं."
पाकिस्तान आने से पहले ही वेंडी शरमन की संबंधों को सीमित करने वाली बात को पाकिस्तान में ग़ैर-राजनयिक बताया जा रहा है और इसे लेकर नाराज़गी भी है. साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने जिस तरह अमेरिका को अहमियत दी, अमेरिका का व्यवहार उसके अनुरूप नहीं रहा.
पत्रकार नालिया इनायत ने वेंडी शरमन और पाकिस्तान के बयानों को ट्वीटर पर शेयर करते हुए दोनों की तुलना की है और लिखा है, "कोई टिप्पणी नहीं."
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भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने भी वेंडी शरमन के बयान पर आपत्ति जताई है.
अब्दुल बासित ने एक वीडियो में कहा, "वेंडी शरमन ने एक अजीब और ग़ैर-ज़रूरी बात कह दी कि पाकिस्तान से हमारे ताल्लुकात सतही किस्म के हैं, हम उन्हें बढ़ाना भी नहीं चाहते और ना वो बढ़ सकते. उनके साथ मामला अफ़ग़ानिस्तान की हद तक ही है. भारत और पाकिस्तान का कोई मुक़ाबला नहीं है."
"वो विदेश मंत्रालय की नंबर दो हैं तो उनसे पाकिस्तान आने से पहले ऐसे बयान देने की उम्मीद नहीं हैं. अगर ताल्लुकात में समस्या हो या उतने बेहतर ना हो तो भी उसे सरेआम नहीं कहते हैं. कोशिश तो यही होनी चाहिए कि ताल्लुकात में इजाफ़ा हो. इसे न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता.''
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अब्दुल बासित ने इसे लेकर पाकिस्तान की सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को थोड़ी मजबूत स्थिति में होना चाहिए था लेकिन हम दबाव में हैं. उसकी बुनियादी वजह हमारे अमेरिका के साथ ताल्लुकात भी हैं, साथ ही आर्थिक समस्या भी अपनी जगह एक हकीकत है.
इस सबके बीच सात और आठ अक्टूबर को वेंडी शरमन ने पाकिस्तान का दौरा पूरा किया. इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोइद युसुफ़ से मुलाक़ात की.
अमेरिका ने मुख्यतौर पर अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति और वहां समावेशी सरकार की ज़रूरत पर चर्चा की.

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एक तरफ़ा झुकाव का आरोप
लेकिन, इस दौरान प्रोटोकॉल तोड़े जाने को लेकर भी पाकिस्तान की सरकार निशाने पर आ गई.
अब्दुल बासित ने पाकिस्तान सरकार के अमेरिका के लिए एक तरफ़ा गर्मजोशी दिखाने पर आपत्ति जताई.
उन्होंने कहा, "भारत में वेंडी शरमन की आधिकारिक बातचीत विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला के साथ हुई. फिर उन्होंने भारतीय विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से फ़ोन पर बात की. लेकिन, पाकिस्तान में हमारी तरफ़ से मुलाक़ात का स्तर बढ़ जाता है. यहां विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अमेरिकी उप विदेश मंत्री से मुलाक़ात की. क्यों हम अपने आपको बिछा देते हैं? हमें प्रोटोकॉल का ध्यान रखना चाहिए."
"आपको अपने विदेश सचिव पर एतबार नहीं है या फिर आप क्रेडिट लेना चाहते हैं. हम नहीं जानते हैं कि अमेरिका ने ये अनुरोध किया था या हमने उन्हें खुश करने की कोशिश की. ये राजनयिक व्यवहार के लिहाज़ से बिल्कुल ठीक नहीं हुआ."

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मुलाक़ात के बाद वेंडी शरमन ने अफ़ग़ानिस्तान से लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने को लेकर पाकिस्तान की सराहना की और बातचीत का मुख्य मुद्दा अफ़ग़ानिस्तान रहा. पाकिस्तान ने भारत प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन का मसला उठाया लेकिन अमेरिका की तरफ से इस पर कोई बयान नहीं दिया गया.
वेंडी शरमन ने कहा, "मैं उप विदेश मंत्री पद संभालने के बाद पाकिस्तान में अपनी पहली यात्रा को लेकर खुश हूं. अमेरिका और पाकिस्तान के अहम और लंबे समय से द्विपक्षीय संबंध रहे हैं. हमने तालिबान की उसकी प्रतिबद्धताओं के लिए ज़िम्मेदारी तय करने को लेकर चर्चा की क्योंकि एक स्थिर और समावेशी अफ़ग़ानिस्तान हम सब के हित में है जो आतंकियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह ना बने. अमेरिका अफ़ग़ान शरणार्थियों को लेकर पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना करता है."
"अफ़ग़ानिस्तान हमारे एजेंडे में सबसे ऊपर था लेकिन हमने जलवायु संकट, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और कोरोना महामारी जैसे मसलों को लेकर भी बात की. अमेरिका इस साल एक करोड़ 60 लाख वैक्सीन पाकिस्तान को दे चुका है और 96 लाख देने वाला है. वैक्सीन केवल पाकिस्तान के लोगों की बीमारी से सुरक्षा के लिए दी गई हैं इससे कुछ और नहीं जुड़ा है. अमेरिका मानता है कि एक मजबूत, समृद्ध और लोकतांत्रिक पाकिस्तान क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर काफी महत्वपूर्ण है."

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अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में तनाव
अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में लंबे समय से तल्ख़ी बनी हुई है. अमेरिका की बेरुखी कई बार साफतौर पर सामने आती रही है.
ट्रंप प्रशासन के दौरान पाकिस्तान पर झूठ बोलने, धोखाधड़ी करने और चरमपंथियों को सुरक्षित पनाहगाह देने के आरोप लगे, जिनकी वजह से तत्कालीन राष्ट्रपति ने अरबों डालर की सुरक्षा मदद वापस ले ली थी.
जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद भी संबंधों में कुछ ख़ास सुधार नहीं हुआ है. अफ़ग़ान-तालिबान शांति वार्ता में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही लेकिन फिर भी तालिबान के साथ पाकिस्तान के संबंधों को लेकर अमेरिका में सवाल उठते रहे हैं.
ख़बरें ये भी थीं जो बाइडन के राष्ट्रपति पद संभालने के बाद उनकी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से कोई बातचीत नहीं हुई. नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र (एनएसए) मोइद युसूफ़ को यहां तक कहना पड़ा कि "सिगनल को हम समझ नहीं पा रहे हैं."
वहीं, इस बीच चीन से मिल रही चुनौती और अन्य समान हितों के चलते भारत और अमेरिका के संबंधों में मजबूती आई है. दोनों ही देश 'द क्वाड्रिलैटरल सिक्युरिटी डायलॉग' (क्वाड) में भी शामिल हैं जो चीन को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है.
ऐसे में उतार-चढ़ाव से गुजरते अमेरिका-पाकिस्तान के संबंध किस तरफ़ जा रहे हैं. पाकिस्तान अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान में हर संभव मदद की बात करता है, अमेरिका भी पाकिस्तान की भूमिका को अहम बताता है लेकिन फिर भी राजनयिक संबंधों में बेरुखी नज़र आती है.

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ज़रूरत भी और दूरी भी
इसे लेकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय के भारद्वाज कहते हैं कि नाराज़गी दोनों तरफ़ से है. पाकिस्तान में भी अमेरिका के रवैये पर सवाल उठते रहते हैं.
अमेरिका के संदर्भ में देखें तो उसके लिए पाकिस्तान ज़रूरी तो है लेकिन अमेरिकी सरकार तालिबान को लेकर पाकिस्तान पर दोहरी नीति अपनाने के आरोपों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती.
संजय के भारद्वाज कहते हैं, "इस समय क्षेत्रीय रिश्ते बदल गए हैं. भारत और अमेरिका के संदर्भ में देखें तो उनके बीच जो समझौते हुए हैं, वो भारत को अमेरिका का सहयोगी बना देते हैं. चीन से मिल रही चुनौती के बीच अमेरिका चाहता है कि दक्षिण एशिया में भारत की भागीदारी बढ़े. वहीं, कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद से अमेरिका की तरफ़ से भारत को असहज करती कोई बात नहीं की गई है. ये सब पाकिस्तान के लिए मुश्किल पैदा करती हैं. अमेरिका के इस रुख़ पर पाकिस्तान नाखुश है. लेकिन, सुपरपावार से बेहतर संबंधों की उसकी अपनी ज़रूरत है."
"अगर अमेरिका की बात करें तो पाकिस्तान के साथ उसके संबंध ख़राब हो सकते हैं लेकिन ख़त्म नहीं. तालिबान के संदर्भ में अमेरिका को पाकिस्तान की ज़रूरत है. अफ़ग़ानिस्तान की अमेरिका से वापसी के बाद चीन और रूस तालिबान से नज़दीकी बढ़ा रहे हैं. तालिबान सरकार के बीच अमेरिका की सीधी पहुंच नहीं है. ऐसे में इस इलाक़े में शक्ति संतुलन बनाने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान की ज़रूरत रहेगी."
लेकिन इस ज़रूरत के बावजूद भी अमेरिका पाकिस्तान का खुलकर सहयोग नहीं करता नहीं दिखता. वेंडी शरमन के बयान और जो बाइडन का उपेक्षित व्यवहार दिखाता है कि पाकिस्तान से दोस्ती में अमेरिका सहज नहीं है.
प्रोफ़ेसल संजय भारद्वाज कहते हैं, "अमेरिका में एक धड़ा मानता है कि पाकिस्तान ने तालिबान के मामले में पूरी तरह अमेरिका का सहयोग नहीं किया. चाहे ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान में पाया जाना हो या तालिबान की मज़बूती में पाकिस्तान के सहयोग का आरोप, अमेरिका में इसे पाकिस्तान की दोहरी नीति के तौर पर देखा जाता है. अमेरिकी सरकार इस पक्ष की उपेक्षा नहीं कर सकती. लेकिन, ये भी सच है कि पाकिस्तान अब भी उसकी मजबूरी है और आगे भी रहेगा."
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